विशेष लेख
Date : 12-June-2012
जवाब दो चिदम्बरम पर मेहरबान क्यों है सरकार
आदित्य चोपड़ा
राजनीति का ऊंट कब किस करवट बैठता है, कहा नहीं जा सकता। भारत में राजनीतिक हिसाब-किताब कुछ खास और चहेतों को बहुत रास आता है। कांग्रेस का राजनीतिक हिसाब-किताब विशुद्ध रूप से तिकड़मों पर चलता है। पार्टी में आज की तारीख में तिकड़मतंत्र बहुत हावी है जिसका हाथ मजबूत है, जिसने अपने आकाओं के हाथ के लिए काम किया है तो कांग्रेस का हाथ उसके सिर पर रहेगा। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम तिकड़मतंत्र के किंग हैं और उन्हें कुछ भी करने की छूट है। तभी तो जनता पार्टी के सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उनके खिलाफ 2-जी स्पैक्ट्रम केस में आखिरी सांस तक लडऩे का संकल्प निभाते हुए भ्रष्टाचार केस में सुप्रीम कोर्ट तक उनके खिलाफ गुहार लगा रखी है। कोर्टों में फंसे चिदम्बरम की डायरी पेशी की तारीखों से भर गई होगी। और तो और शिवगंगा सीट पर उनकी लोकसभाई जीत पर भी अब कोर्ट में सवाल उठ खड़ा हुआ है। यहां तक कि भ्रष्टïाचार में उनके बेटे कार्ति चिदम्बरम का नाम भी उभर चुका है। लोग कहने लगे हैं कि कांग्रेस उन्हें कब तक बचाएगी? आइए सबसे पहले समझते हैं कि शिवगंगा की उलटी गंगा का पंगा क्या है? सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में चिदम्बरम तमिलनाडु की शिवगंगा सीट से जीते थे। उन्होंने अन्नाद्रमुक उम्मीदवार राजा कन्नपन को हराया था। मतगणना के दिन राजा शुरू से बढ़त बनाए हुए थे लेकिन अंत में चिदम्बरम ने 3,354 मतों से जीत दर्ज की थी। इसके बाद राजा ने आरोप लगाया था कि डाटा एंट्री आपरेटर ने उनके पक्ष में पड़े वोट चिदम्बरम के खाते में डाल दिए। उन्होंने 25 जून, 2009 को चिदम्बरम के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की। हालांकि जवाब में चिदम्बरम ने दलील दी कि राजा की याचिका में कई खामियां हैं। लिहाजा इसे खारिज किया जाए। अंतत: 4 अगस्त, 2011 को मद्रास हाईकोर्ट ने चिदम्बरम की याचिका खारिज कर दी और मामले की सुनवाई जारी रखी। चिदम्बरम ने फिर अर्जी दाखिल की थी।
शिवगंगा में चिदम्बरम के प्रतिद्वंद्वी की याचिका पर कोर्ट का निर्णय एकदम स्पष्ट है। न्यायमूर्ति के. वेंकटरमण ने कहा है कि चिदम्बरम को मद्रास में ही 27 आरोपों में अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। जब भी कोर्ट का निर्देश हो, उन्हें अदालत के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चिदम्बरम ने कहा कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। वह फरमाते हैं कि कोर्ट का यह फैसला उनके लिए नहीं बल्कि याचिकाकर्ता के लिए झटका है। चिदम्बरम ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता द्वारा उनका इस्तीफा मांगे जाने को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि वह दोनों नेताओं की भारी नादानी से चकित हैं। उन्होंने कहा कि यह एक चुनाव याचिका है। ऐसी 111 याचिकाएं 15वीं लोकसभा के सदस्यों के खिलाफ दायर हैं। चिदम्बरम ने कहा कि चुनाव याचिका में केवल आरोप लगाए गए हैं।
इस फैसले के बाद देश की राजनीति गरमा गई है और कांग्रेस को इसका राजनीतिक असर झेलना होगा। अब 2-जी घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस डील में गड़बड़ी के आरोप झेल रहे गृहमंत्री पर दबाव बढ़ेगा। इतना ही नहीं भाजपा, अन्ना द्रमुक और जनता पार्टी प्रमुख सुब्रह्मïण्यम स्वामी और आक्रामक होंगे। भाजपा अध्यक्ष ने बर्खास्त करने की मांग भी कर दी है। इधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने चिदम्बरम को यूपीए सरकार पर धब्बा बताया। पहले भी वह प्रधानमंत्री से मिलकर चिदम्बरम को हटाने की मांग कर चुकी हैं।
हमारी समझ में यह बात नहीं आ रही कि आखिरकार कांग्रेस विशेष रूप से जैसा कि कहा जाता है कि 10 जनपथ श्री चिदम्बरम पर अपनी मेहरबानियों का खजाना क्यों लुटा रहा है? कहने वाले कहते हैं कि देश की सियासत कांग्रेस मुख्यालय से नहीं बल्कि 10 जनपथ से शुरू होती है और सत्ता के गलियारों से होती हुई वहीं जाकर खत्म होती है। चिदम्बरम के बारे में भी राजनीतिक विशेषज्ञ कुछ ऐसी ही राय रखते हैं। चिदम्बरम की सियासत भी 10 जनपथ से शुरू होकर घोटालों के विभिन्न खुले अहातों से होकर वहीं पर जाकर खत्म होती है। आखिरकार उन पर 10 जनपथ की मेहरबानियों की वजह क्या है? यह सवाल भी सत्ता के गलियारों में अक्सर लोग पूछा करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस मनमोहन सरकार ने मुम्बई अटैक के बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल को केवल जिम्मेवारी तय करने के मामले में हटा दिया था। अगर देश में कोई नरसंहार होता है तो इसके लिए देश का गृहमंत्री जिम्मेदार है तो फिर चिदम्बरम की जिम्मेवारी कौन, कब और कैसे तय करेगा। क्या चिदम्बरम को गृहमंत्री के रूप में कुछ भी करने की खुली छूट ऐसे दे दी गई है जैसी उन्हें वित्त मंत्री होने के दौरान प्रदान की गई थी। यह चिदम्बरम के वित्त मंत्री का चार्ज सम्भालने के दौरान का ही समय था जब अन्दर ही अन्दर टू-जी स्पैक्ट्रम का घोटाला सुलग रहा था। बाद में पता चला कि चिदम्बरम ने ही इस स्पैक्ट्रम आवंटन में कैबिनेट को अंधेरे में रखा और सब कुछ तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा से करवाया। राजा जेल चले गए और वक्त बदला तो राजा बाहर आ गए, लेकिन चिदम्बरम का किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा क्योंकि सरकार इस बात पर अड़ी है कि चिदम्बरम का कुछ भी बिगडऩे नहीं देना है लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बाकायदा लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दस्तावेजों से भरी फाइलें जमा करवा रखी हैं जिनमें स्पैक्ट्रम घोटाले की परतें सिलसिलेवार प्रस्तुत की गई हैं। समय आएगा जब न्याय के मंदिर में दूध का दूध और पानी का पानी होगा।
आखिरकार क्या यह सरकार बताना चाहेगी कि चिदम्बरम का वित्त मंत्रालय से गृहमंत्रालय में तबादला क्यों किया गया। यह सब इसलिए किया गया ताकि टू-जी स्पैक्ट्रम का घोटाला अन्दर ही अन्दर दब जाता लेकिन यह सुब्रह्मण्यम स्वामी ही थे जिन्होंने प्रमाणित कर दिया कि देश के राजस्व को चूना लगाया गया है और कौडिय़ों के भाव स्पैक्ट्रम चहेती कम्पनियों को दिए गए हैं। जिन कम्पनियों को यह स्पैक्ट्रम दिए गए उन्होंने आगे विदेशी कम्पनियों को 100-100, 200-200 गुणा कीमत पर बेच दिए। आखिरकार अब जब फैसले की घड़ी आई है तो सरकार हर सूरत में चिदम्बरम को बचाना ही चाहती है तो फिर कांग्रेस के कर्णधारों को यानि कि 10 जनपथ पर उंगलियां उठनी स्वाभाविक ही हैं।
यह बात हम अपनी तरफ से नहीं कह रहे बल्कि सारे मामले पर जिस तरह से चिदम्बरम की भूमिका रही है और जिस प्रकार से उन्हें बचाने वालों की भूमिका रही है, उस पर अलग-अलग लोग तथा अलग-अलग संगठन इसी तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।
देश का गृहमंत्री अगर कमजोर होगा तो आतंकी संगठनों को कुछ भी करने का मौका मिलेगा। अगर कश्मीर से कन्याकुमारी तक आतंकवाद ने अपनी जड़ें मजबूत की हैं तो इसी आतंकवाद को आगे बढ़ाने में माओवादियों ने देश के कमजोर गृहमंत्री की उपस्थिति का लाभ उठाकर पूरे आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल को खून से लाल कर दिया है। इतना ही नहीं महाराष्ट्र के एक खास इलाके गढ़चिरोली के जंगलों में जब चाहा सीआरपीएफ के जवानों से दर्जनों बार खून की होली खेली। माओवादियों ने जब चाहा ट्रेनें उड़ा दीं, जब चाहा सरकारी शस्त्रागार लूट लिए, जब चाहा सरकारी अफसरों का अपहरण कर लिया और गृहमंत्री एकदम मूकदर्शक बने रहे। यह चिदम्बरम ही थे जिन्होंने इतना बड़ा खूनी खेल अपनी छाती पर होता हुआ देखकर भी माओवादियों से बातचीत की शर्त रखी। जब माओवादियों को पता है कि वह बंदूक के दम पर अपनी हर बात मनवा लेते हैं तो फिर सरकार बातचीत की शर्त क्यों रखती है। माफ करना जब सरकार बातचीत की शर्तें रखती है तो यह सरकारी गिड़गिड़ाहट ही कहलाती है जिससे माओवादी मजबूत होते चले गए। उनकी मजबूती के लिए गृहमंत्री चिदम्बरम ही जिम्मेवार हैं, क्या कांग्रेस सरकार ने इस बारे में कभी कोई संज्ञान लिया।
आखिर में यही कहना चाहते हैं कि देश में घोटाले और अराजकता इसी कांग्रेस सरकार की देन है जिसमें सबसे बड़ी भूमिका खुद चिदम्बरम की रही है। सरदार पटेल से लेकर चिदम्बरम तक जितने भी गृहमंत्री हुए उनमें सबसे लचर चिदम्बरम ही सिद्ध हुए हैं। देश की आन-बान-शान दाव पर लगी हुई है और सरकार के कर्णधार रोम के जलने पर नीरो की तरह बांसुरी बजा रहे हैं। हे भगवान इस देश को बचा लो।
 
Visitor No. Free Counters