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हमारे देश में कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरती हुई राजनीति किस मुकाम पर खड़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भगवा चोला पहन कर भी बाबा लोग आज इसी राजनीति में उतरने को तैयार हैं। भीड़तंत्र के दम पर ऐसे लोग वोट तंत्र को अपने हक में बनाने के लिए तरह-तरह के आंदोलन भी करते हैं, लेकिन राजनीति में जब आप अपने हित सामने रखकर कोई काम करते हैं तो समाज खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। महान योग गुरु बाबा रामदेव के काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर चलाए गए आंदोलन का हम समर्थन करते हैं लेकिन आंदोलन की आड़ में राजनीतिक हितों के मामले में हम ऐसे लोगों को आंखें बंद कर अपना समर्थन नहीं दे सकते।
सच्चाई तो यह है कि भ्रष्टाचार व काले धन को लेकर आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए योग गुरु बाबा रामदेव ने महान गांधीवादी नेता अन्ना हजारे का सहारा लिया। लोग कहते हैं कि बाबा रामदेव ने जब रामलीला मैदान से भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ आंदोलन किया था तो पुलिस को सामने आता देखकर भाग क्यों खड़े हुए थे? नारी के वेश में भागने की जरूरत क्या थी? बाबा गिरफ्तारी से डर गए? बाबा ने केवल तीन दिन का प्रदर्शन व सभा की इजाजत ले रखी थी और वह जानते थे कि पुलिस अनुमति की अवधि का वक्त खत्म होते ही वहां से चलता कर देगी। लिहाजा विभिन्न चैनल इस प्रदर्शन या रैली की लाइव कवरेज दे रहे थे। बाबा को भारी पब्लिसिटी मिल रही थी, लेकिन बाद में बाबा अपने 'बिजनेस' का चिट्ठा खुल जाने के डर से नारी के वेश में भाग खड़े हुए। बाबा जिस उत्तराखंड से ताल्लुक रखते हैं, वहां के लोगों को पुलिसिया डंडों के हवाले छोड़कर अगर भाग खड़े हुए तो इसकी वजह उनकी बढ़ती महत्वाकांक्षा थी, जो राजनीति को लेकर केन्द्रबिन्दु थी। बाबा ने अन्ना के साथ आंदोलन शुरू किया था और पहले दो दिन तो इससे दूर रहे लेकिन जब देखा 'जय' हो गई तो जंतर-मंतर पहुंच गए।
अन्ना की सफलता देखकर बाबा ने उनसे अपनी दूरियां इसलिए बढ़ाईं क्योंकि वह इसे राजनीतिक रूप से कैश करना चाहते थे। अपनी महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाने की जल्दी में बाबा ने उन्हीं दिनों आनन-फानन में नई राजनीतिक पार्टी बनाने तक का ऐलान कर डाला। जब उनकी इस घोषणा को बल नहीं मिला तो वह शांत होकर बैठ गए। उधर अन्ना के आंदोलन को पूरे देश से समर्थन मिलने लगा। अन्ना आंदोलन का दूसरा एपिसोड होते-होते बाबा हाशिए पर जा पहुंचे थे। तब से वह अपनी मरती हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जीवित करने के लिए सहारा ढूंढ रहे थे। सरकार की मेहरबानी से लोकपाल विधेयक ठंडे बस्ते में जा चुका था। अब बाबा ने फिर वही भ्रष्टाचार व कालेधन का राग छेड़ा और अन्ना के साथ हाथ मिलाया तथा सामूहिक प्रेस कांफ्रैंस में उनसे सार्वजनिक रूप से दोस्ती की नुमाइश की। अगले ही दिन टीम अन्ना व बाबा के बीच दूरियां बढऩे लगीं। इसके बाद एक ही मंच पर बाबा व अन्ना साथ-साथ नजर आए। इसी दौरान बाबा केन्द्रीय मंत्री शरद पवार, सपा सुप्रीमो मुलायम से मिले तथा काले धन को लेकर समर्थन मांगा। बाबा भूल गए जिस मुलायम से उन्होंने काले धन के मामले पर समर्थन मांगा वही मुलायम आय से अधिक सम्पत्ति मामले में सीबीआई जांच से गुजर रहे हैं। यह बात अलग है कि पंजाब के सीएम प्रकाश ङ्क्षसह बादल भी इस मामले पर बाबा के साथ हैं तथा हम भी भ्रष्टाचार व काले धन के मामले पर बाबा के साथ हैं, लेकिन बाबा के राजनीतिक खेल का समर्थन करने को हम तैयार नहीं। बाबा खुद 'आयुर्वेदिक फैक्ट्री' चला रहे हैं तो इसमें भी सियासत है। यह बात अलग है कि योग विद्या को हम सलाम करते हैं, लेकिन बाबा राजनीतिक कारगुजारियों में बेनकाब हो चुके हैं।
बाबा! हम आपसे साफ कहना चाहते हैं कि एक बार आप खुलकर राजनीति में सामने आ जाओ और अपना एजैंडा सार्वजनिक रूप से सामने रख दो। हम आपका साथ देने को तैयार हैं, परन्तु आपको खुलकर सामने आना होगा। आप डबल गेम और दोहरा चरित्र मत दिखाओ।
इस कड़ी में सीपीआई ने रामदेव को समर्थन देने से इंकार कर दिया और कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कालाधन वापसी की लड़ाई में योग गुरु बाबा रामदेव का साथ देने से इंकार करते हुए कहा कि पार्टी इस मुद्दे पर अपने ढंग से आंदोलन चलाएगी।
रामदेव सीपीआई के मुख्यालय गये और उन्होंने पार्टी के महासचिव सुधाकर रेड्डी एवं वरिष्ठ नेता ए.बी. वर्धन से मुलाकात कर आंदोलन के विषय में बातचीत की थी।
बैठक के बाद वर्धन ने कहा कि वह रामदेव द्वारा उठाये गये अनेक मुद्दों से सहमत हैं लेकिन इन्हीं मसलों पर उनकी पार्टी की राय और कार्यक्रम अलग है। उन्होंने कहा, ''रामदेव अपने ढंग से काले धन के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे। वह अपने आंदोलन का नेतृत्व खुद करेंगे और हम अपना आंदोलन अपने तरीके से करेंगे।'' जहां रामदेव इस आंदोलन में समर्थन पाने के लिए सीपीआई के नेताओं से मिले वहीं माकपा ने उन्हें ज्यादा महत्व नहीं दिया।
उल्लेखनीय है कि रामदेव आंदोलन के समर्थन के लिए विभिन्न पार्टियों से बातचीत कर रहे हैं। माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने इससे पिछले सप्ताह कहा था, '' यह उनका (रामदेव का) आंदोलन है। हम इस आंदोलन में शामिल नहीं हैं।
हालांकि हमें उनके आंदोलन से कोई दिक्कत नहीं है और कालाधन के मसले पर हमारा रुख स्पष्ट है।'' बाबा को इन नेताओं के सही स्टैंड से करारा झटका लगा होगा।
हम अन्ना के आंदोलन के बारे में यही कहना चाहेंगे कि इस आंदोलन से देश में एक आस जगी थी। जनसाधारण को लगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन उन्हें एक लक्ष्य की ओर ले जाएगा और राहत मिलेगी। छोटे-बड़े शहरों में लोग खुलकर आंदोलन के समर्थन में आए, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आंदोलन अपने लक्ष्य से भटक गया है और इसके नेतृत्व में भी अन्तर्विरोध उत्पन्न हो गए हैं। किसी राजनीतिक आंदोलन की सफलता के लिए तीन बातें आवश्यक होती हैं। पहली यह कि इसके प्रमुख व्यक्ति जनता की नब्ज पर हाथ रखते हुए सही मुद्दों को उठाएं। दूसरे यह कि सही रणनीति अपनाई जाए और तीसरे, आंदोलन के समर्थन के स्रोत किसी विशेष वर्ग तक सीमित न हों और इसके निशाने पर भी किसी एक वर्ग या पार्टी के लोग नहीं होने चाहिएं। अन्ना आंदोलन ने जनता की नब्ज तो पकड़ी, जनलोकपाल बिल का मुद्दा उठाया, परन्तु उसे 2014 तक ठंडे बस्ते में डाल दिया है। ऐसा किस कारण से किया स्पष्ट नहीं है, परन्तु जनसाधारण में इसको लेकर निराशा अवश्य है। रणनीति शुरू में तो ठीक रही परन्तु पिछले कुछ महीनों से पटरी से उतर गई है।
हमारा सवाल है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन को किसी के विरुद्ध आरोप लगाकर एसआईटी की मांग करने का संवैधानिक अधिकार किसने दिया है? देश में हजारों समाजसेवी संस्थाएं हैं। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि 10 समाजसेवी संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग 15 लोगों के विरुद्ध आरोप लगाती हैं और एसआईटी के गठन की मांग करती हैं तो क्या सब मामलों में 150 व्यक्तियों के विरुद्ध जांच के लिए 10 एसआईटी गठित की जाएंगी? आज की तारीख में अन्ना आंदोलन अपने मूल लक्ष्य से भटक गया है। लोकपाल बिल पारित कराने की कोई बात ही नहीं कर रहा है। रणनीति में ऐसी खामियां हैं कि जनता का आंशिक समर्थन ही प्राप्त होगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि अन्ना आंदोलन एकपक्षीय हो गया है।
कड़वा सच यह है कि आज देश के हर कोने में भ्रष्टाचार के भस्मासुर पैदा हो गए हैं। एक जमाना था जब रामनाम की लूट की बात कही जाती थी। आज तो देश की सम्पदा को लूटने में क्या नेता, क्या अधिकारी, क्या व्यापारी सभी लिप्त हैं। आवश्यकता है इन भस्मासुरों को ठिकाने लगाने की। इसके लिए देश का जनमानस सड़क पर उतरने के लिए तैयार है, परन्तु उसे कोई सही नेतृत्व तो दिखे। एक ऐसी संस्था या एक ऐसा व्यक्तित्व तो सामने आए जो दूरदर्शी हो और जनता के दर्द को समझते हुए भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करे।
बात आंदोलन की नीति को लेकर नहीं, बल्कि बाबा रामदेव की नीयत की है। जहां अन्ना हजारे की नीयत सही है वहीं बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ जंग को लेकर अब खुद राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के मामले में उजागर हो चुके हैं, उन्हें खुद आर-पार का फैसला करना होगा कि वह या तो जनहित में आंदोलन करें या फिर राजनीति के प्लेटफार्म पर खुलकर सामने आ जाएं तथा डबल गेम बंद करें। अगर उनकी नीति और नीयत सही है तो हम बाबा के साथ हैं। अगर बाबा रामदेव सियासत कर रहे हैं और केवल निजी तौर पर अपने लिए राजनीति की जमीन तैयार कर रहे हैं तो उनके तरीके का विरोध हर कोई करेगा, यह बात बाबा रामदेव को समझ लेनी चाहिए। |