स्वच्छता अभियान पर रेलवे ने फेरा पानी


सासाराम/पटना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महात्वाकांक्षी ‘स्वच्छता अभियान’ कार्यक्रम के तमाम दावों को झुठलाते हुए रेलवे अपनी औपनिवेशिक मानसिकता के दबाव में आज भी देश की करीब 70 फीसदी आम आबादी के साथ ‘कैटल क्लास’ का बर्ताव करने की जिद्द पर अड़ा है, जिसका नतीजा है कि मंत्रालय से स्वीकृति मिलने के डेढ़ साल बाद भी रेलवे बोर्ड सामान्य और स्लीपर कोच के शौचालयों में यात्रियों की बुनियादी जरूरत का सामान ‘मग’ की व्यवस्था तक नहीं करना चाहता जबकि वातानुकूलित डिब्बों में यह सुविधा आम है।

इसके अलावा देश की आजादी के 70 साल बाद भी रेलवे सभी प्रकार के कोच में यात्रियों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुख-सुविधाओं का भी वर्गीकरण तक नहीं कर सका है। रेल मंत्रालय से इस विषय में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के जरिये पूछे गए सवालों के जवाब में यह खुलासा हुआ है कि रेल मंत्रालय ने 10 नवंबर 2015 को सभी ट्रेनों के वातानुकूलित एवं गैर वातानुकूलित डिब्बों के शौचालयों में चैन लगा स्टील का मग रखने का आदेश दिया था।

आदेश पारित होने के डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी रेलवे इस पर अमल करने के मूड में नहीं है। रेल मंत्रालय ने इसके अलावा इस संदर्भ में वर्ष 1997 में रेलवे बोर्ड के एक प्रस्ताव का उल्लेख करते हुये रेलवे के सभी महाप्रबंधकों के साथ ही यात्रियों की मांग को पूरा करने के उद्देश्य से आधुनिक, सुरक्षित एवं किफायती प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने वाले संगठन शोध डिजाइन एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) को निर्देश दिया था। इसके बावजूद ट्रेन के गैर वातानुकूलित डिब्बों के शौचालयों में आज भी स्वच्छता से जुड़ी बुनियादी वस्तु मग उपलब्ध नहीं कराया जा सका है।

हालांकि आश्चर्य तो यह है कि इस संगठन ने वर्ष 2014 से स्वच्छ भारत अभियान के तहत कई बार विशेष स्वच्छता कार्यक्रम चलाए लेकिन उसे शौचालयों में मग जैसी तुच्छ वस्तु उपलब्ध कराने की अनिवार्यता आजतक समझ में नहीं आई। पूर्व-मध्य रेलवे के मुख्य जन संपर्क अधिकारी अरविंद कुमार रजक ने कहा अभी तक ट्रेन के सामान्य और स्लीपर डिब्बों के शौचालयों में मग की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है लेकिन कुछ ट्रेनों के गैर वातानुकूलित नये कोचों में यह सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बड़ी संख्या में स्टील मग की जरूरत होने के कारण अभी तक वर्ष 2015 के मंत्रालय के आदेश पर अमल नहीं किया जा सका है।

आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि रेलवे बोर्ड से ट्रन के सभी कोच में स्टील का मग उपलब्ध कराने के बारे में समय -समय पर प्रजेंटेशन मिलने के बाद रेल मंत्रालय ने यह आदेश जारी किया था। वित्त मंत्रालय की सहमति से वर्ष 2015 में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। रेलवे बोर्ड के निदेशक (मैकेनिकल) ब्रिजेश दीक्षित ने आरटीआई के जवाब में दावा किया है कि रेलवे द्वारा ट्रेन के डिब्बों में शौचालय, वाशबेसिन, कूड़ादान, शीशा, स्नैक टेबल, पानी का बोतल रखने वाला होल्डर, सामान रखने वाला छोटा रैक के साथ ही मोबाइल और लैपटॉप की बैटरी चार्ज करने के लिए सॉकेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है लेकिन वातानुकूलित और गैर वातानुकूलित कोच में यात्रियों को मिल वाली सुविधाओं का वर्गीकरण अभी तक नहीं किया गया है।

रेलवे की अनदेखी पर हमेशा यात्रा करने वाले यात्रियों का कहना है कि भारतीय रेलवे केवल वातानुकूलित कोच में सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं का ही ध्यान रखता है। इतना है नहीं इन डिब्बों के यात्रियों को शौचालय में टिशू पेपर भी उपलब्ध कराता है जबकि गैर वातानुकूलित कोच के यात्री मग के लिए भी तरस जाते हैं। वहीं महीने में दो बार दिल्ली की यात्रा करने वाले एक कारोबारी ने बताया कि वह यात्रा तो स्लीपर क्लास में करते है लेकिन शौचालय वातानुकूलित कोच का इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अंग्रेजों के शासनकाल में स्थापित रेलवे आज भी औपनिवेशिक मानसिकता के दबाव में है।

भारतीय रेल नेटवर्क वैसे लोगों का बनाया हुआ है जिन्होंने आम और खास वर्ग का भेद बताने के लिए दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को ट्रेन के डिब्बे से धक्का दे दिया था। वहीं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में एक विद्वान मंत्री ने आम यात्रियों को ‘कैटल क्लास’ की उपाधि तक दे दी थी। एक विशेषज्ञ तो पटना से दिल्ली तक के सफर में एक सुपर फास्ट ट्रेन के किराया संग्रह का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बों में यात्रा कर रहे यात्रियों से रेलवे को करीब साढ़े सात लाख रुपये का किराया प्राप्त होता है जबकि सामान्य और स्लीपर क्लास के यात्रियों से करीब छह लाख रुपये का किराया आता है। ऐसे में रेलवे इन डिब्बों के यात्रियों के मुकाबले वातानुकूलित कोच के यात्रियों से अधिक किराया मिलने की भी दुहाई नहीं दे सकता।

– वार्ता

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