जस्टिस जोसेफ मुद्दे पर कांग्रेस और माकपा ने मोदी सरकार की तीखी आलोचना


कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसफ को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त नहीं करने पर सरकार की तीखी आलोचना की है और आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हनन किया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम तथा पार्टी के संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मोदी सरकार के इस फैसले को उसकी मनमानी करार देते हुए कहा है कि वह उन्हीं लोगों को न्यायपालिका में न्यायाधीश बनाना चाहती है जो उसके खास लोग हैं और उसके हितों के अनुकूल है।

इस बीच माकपा पोलित ब्यूरो ने भी एक बयान जारी कर इस मामले में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से हस्तक्षेप करने की मांग की है और कहा है कि न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में किसी तरह का सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

श्री सिब्बल ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कानून कहता है कि उन्हीं न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जाना चाहिए जिनके नाम की सिफारिश चयन मंडल यानी कॉलेजियम ने की है। कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश की थी और न्यायमूर्ति जोसेफ के बारे में जो टिप्पणी की थी उसे उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर इस साल 10 जनवरी को पोस्ट किया गया जिसमें न्यायमूर्ति जोसेफ को सबसे बेहतर जज बताया गया और उनकी जमकर तारीफ की गयी, लेकिन सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया। उल्टे उनका नाम कॉलेजियम को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया गया है।

श्री सिब्बल ने कहा कि जनहित में उसे न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए। उच्चतम न्यायालय में सिर्फ 24 न्यायाधीश हैं, जिनमें से छह इसी साल सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 410 पद रिक्त हैं। लोगों के मामलों पर जल्दी सुनवाई हो, इसलिए इन पदों पर नियुक्ति होनी चाहिए।

श्री सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद, मोदी बदले की राजनीति से काम कर रहे हैं और ‘न्यायपालिका को लेकर प्रधानमंत्री की बदले की भावना की राजनीति और उच्चतम न्यायालय का साजिश के तहत गला घोंटने का प्रयास बेनकाब हो गया है। न्यायमूर्ति जोसेफ वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश हैं इसके बावजूद मोदी सरकार ने उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने से इन्कार कर दिया।’

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार लगातार न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक संस्थाओं की सर्वोच्चता को ध्वस्त कर रही है। उन्होंने कहा, ‘क्या मोदी सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया कि न्यायमूर्ति जोसेफ की अदालत ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को रद्द कर दिया था।’ श्री चिदम्बरम ने सवाल किया क्या न्यायमूर्ति जोसेफ की प्रोन्नति को इसलिए रोका गया कि उन्होंने केंद, सरकार के उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय के विरुद्ध फैसला दिया था। उन्होंने कॉलेजियम की सिफारिश पर सुश्री इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति पर खुशी जतायी, लेकिन सवाल किया कि न्यायमूर्ति जोसेफ को नियुक्त करने की उसी कॉलेजियम की सिफारिश को किस आधार पर ठुकरा दिया गया है।

उन्होंने ट््वीट किया, ‘मैं खुश हूं कि सुश्री मल्होत्रा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगी, लेकिन इस बात से निराश हूं कि न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की नियुक्ति रोकी गई है। (न्यायमूर्ति) केएम जोसेफ की पदोन्नति आखिर क्यों रोकी गई है। कानून कहता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम की सिफारिश ही अंतिम है, लेकिन क्या मोदी सरकार कानून से ऊपर हो गई है।’

माकपा पार्टी पोलित ब्यूरो ने कहा कि न्यायमूर्ति जोसेफ की उच्चतम न्यायलय में न्यायमूर्ति के रूप में नियुक्त किये जाने के कॉलेजियम के फैसले को सरकार द्वारा न माने जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की और आरोप लगाया कि सरकार न्यायपालिका में हस्तक्षेप कर रही है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए नुकसानदेह है।

पार्टी का कहना है कि सरकार ने काफी विलम्ब के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा का नाम तो मंत्रूर कर लिया लेकिन अभी तक श्री जोसफ के नाम को मंजूरी नहीं दी और यह न्यायिक प्रक्रिया में सरासर हस्तक्षेप है तथा इसका असर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर पड़गा। पार्टी ने इस मामले में राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने की भी मांग की है।

माकपा ने इस मामले में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का पूरी तरह पालन होना चाहिए और न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम को मंजूरी दी जानी चाहिए।

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