दार्जिलिंग आंदोलन ने ममता की गति रोकी


नई दिल्ली : राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर दार्जिलिंग आंदोलन ने ममता बनर्जी की विपक्षी महागठबंधन की मुहिम की गति को रोकने का काम किया है। चर्चा गर्म है कि कांग्रेस व अन्य विरोधी दलों के साथ चर्चा करके विपक्षी महागठबंधन का जो फार्मूला तैयार किया था उसे अमलीजामा पहनाने की मुहिम के मध्य ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के लिए दार्जिलिंग में सुलग रही आग को प्राथमिकता देना जरूरी है।

यदि ममता बनर्जी राज्य की समस्या के निदान में समय खर्च करती रही तो मोदी सरकार के मिशन-2019 के रथ को रोकने के लिए प्रस्तावित महागठबंधन की व्यूहरचना कागजों तक सीमित रह जाएगी। समझा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को उम्मीद थी कि ममता की पैंतरेबाजी से विपक्षी मोर्चा आक्रामक होगा जबकि अब बिसात उलटती नज़र आ रही है। मोदी पर कटाक्ष करती रही ममता को अब केन्द्र की मदद भी दरकरार है। कहा जा रहा है कि अनेकों बार मोर्चे बांधकर आंदोलनों की सूत्रधार रही ममता बनर्जी के लिए दार्जिलिंग का आंदोलन महंगा साबित हो रहा है।

सत्तारूढ़ होने के बाद सख्ती से विरोधियों को दबाने की ममता की शैली धारे-धीरे राज्य में उनकी पकड़ी ढीली कर रही है। ताज्जुब यह भी है कि दार्जिलिंग सुलग रहा है जबकि सीएम ममता बनर्जी आज विदेश कूच कर गई। बताया जाता है कि तीन साल पहले मोर्चे के अध्यक्ष विमल गुरुंग व राज्य सरकार के मध्य शीतयुद्ध शुरू हुआ जिसने आज हिंसा का रूप धारण कर लिया। स्कूलों में बांग्ला भाषा की पढ़ाई अनिवार्य करके ममता बनर्जी सरकार ने गोरखालैंड की पिछली चिंगारियों को हवा देने की भूल की। सीएम की शैली के खिलाफ इलाके के 1000 से ज्यादा स्कूलों तथा कालेजों को बंद रखा गया।

इसी गुस्से के बीच ममता बनर्जी ने जब दौरा किया तब दार्जिलिंग में एक रैली आयोजित करके ममता गो बैक के नारे लगाए गए थे। मोर्चे के नेताओं का आरोप है कि सरकार इलाके के नेपाली भाषी लोगों पर जबरन बांग्ला थोपने का प्रयास कर रही है। हालांकि स्थानीय लोगों की भावनाओं को देखकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बाद में ऐलान करना पड़ा कि पर्वतीय क्षेत्र में बांग्ला की पढ़ाई ऐच्छिक होगी अनिवार्य नहीं। जब तक ममता बनर्जी को समझ आया तब तक आंदोलन की आग भड़क चुकी थी।

इसी दौरान ममता बनर्जी ने 45 साल बाद पहली बार दार्जिलिंग को कैबिनेट की बैठक करने का फैसला किया किन्तु उस बैठक के दौरान ही गोरखालैंड मोर्चे के हजारों कार्यकर्ताओं ने रैली निकाल राजभवन तक जाने का प्रयास किया। पुलिस द्वारा रोकने पर मार्चे के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। केन्द्र की मोदी सरकार ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। केन्द्र ने अद्र्धसैनिक बल के जवान भेजे हैं। ममता बनर्जी के लिए संकट का संकेत यह भी है कि राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व महागठबंधन के गठन की मुहिम में बाधाएं पड़ रही हैं। केन्द्र को धमकाने की उनकी शैली में भी रुकावट आई है जबकि दार्जिलिंग की हिंसा से उनकी प्रशासनिक शैली भी दागदार हो रही है।

– दिनेश शर्मा

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