महिलाओं द्वारा पुरूषों के खिलाफ धोखाधड़ी के मामले


हमारे समाज में महिलाओं को अल्पसंख्यक और कमजोर माना जाता है। हर दिन महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध देखने को मिलते हैं। हमारे संविधान और भारतीय दंड संहिता में महिलाओं के लिए विशेष कानूनी और मौलिक अधिकार हैं। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए हमारे अपराध कानून को संशोधित किया गया था। विद्यायिकाए प्रशासनिक और न्यायपालिका महिलाओं के लिए नम्र रूख रखते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कानून जो महिलाओं के हितों की रक्षा करता हैंए उसी ने किसी तरह से पुरूषों के मूलभूत और कानूनी अधिकारों का हनन भी किया है। यह बीतों दिनों की बात हो गई है जब भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 ए तथा 1995 के हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 1995 के तहत पत्नियों द्वारा झूठी गवाही के कारण पतियों को पीडि़त होना पड़ता था तथा अन्य विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के तहत आरोप तथा मुकदमेबाजी झेलते थे। अब कानून लागू करने वाले अधिकारी तथा न्यायाधीश पत्नियों के दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं जो अनावश्यकरूप से अपने पतियों को कई झूठे मुकदमों में फंसा देती हैं।

 यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों ने न्यायाधीन पड़े मामलों की सत्यता की व्याख्या करते हुए गुमराह पत्नियोंए महिला सहकर्मियों और महिला मित्रों की प्रकृति के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की है। कई झूठे आरोपों के चलतेए कई पुरूष अभी भी सलाखों के पीछे हैं। अपराधों की प्रकृतिए अपराधों की घटनाओंए पुलिस अधिकारियों द्वारा मामलों के निष्पादन और उनके क्रियांवयन से सम्बन्धित न्यायापालिका द्वारा व्यावहारिक दृष्टिकोण पुरूषों और उनके परिवारों को लक्षित करते हैं। इससे न केवल उनका चरित्र खराब होता है बल्कि उनके परिवार की सामाजिक स्थिति भी एक बड़े खतरे में आ जाती है। इसी तरहए पत्नी को तलाक के आदेश के मामले में पुरूषों के पक्ष में डिक्री दी गई है। झूठे मामलों में महिलाओं को दण्ड भी दिया गया है। एक नये प्रतिमान में बदलाव आया है जो पुरूषों को उनके मानवीयए नागरिक एवं कानूनी अधिकारों की रक्षा में सक्षम बनाता है।

डीसीडव्ल्यु का कहना है कि अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच 53ण्2 प्रतिशत बलात्कार के केस दर्ज किये गये हैं। रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल 2013 और जुलाई 2014 के बीचए 2753 बलात्कार की शिकायतों में से केवल 1287 मामले सही पाये गये जबकि बाकी के 1464 मामले झूठे पाये गये।  वर्ष 2012 में दिल्ली की एक बस में एक छात्रा के साथ हुए कुख्यात गैंग रैप के बादए भारत में पुलिस को की जाने वाली बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट में इजाफा हुआ है। लेकिन एक सर्वेक्षण बताता है कि दिल्ली में वर्ष 2013.14 में आधे से भी ज्यादा मामले झूठे थे। पुरूष कार्यकर्ताओं ने यह दावा किया है कि महिलाएं पुरूषों से पैसा उगाहने के लिए बलात्कार का आरोप लगाती हैं। पुरूषों को बदनाम करने तथा उनसे धन उगाहने के लिए उन पर जो मामले दर्ज किये गये हैं वे नीचे दिए गए हैं बलात्कार के मामले, यौन उत्पीडऩ के मामले, घरेलू हिंसा के मामले, दहेज के मामले, ब्लैकमेलिंग के मामले, बलात्कार के मामले, कार्यस्थल मामलों में यौन उत्पीडऩ, छेडख़ानी ऐसे मामलों पर भारत के माननीय न्यायालयों के फैसलेरेवारी अदालत ने ष्बलात्कार का झूठा मामलाष् दर्ज करने वाली चार महिलाओं पर मुकदमा दायर किया रोहतक अदालत ने हाल ही में अलग.अलग मामलों में चार महिलाओं के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के आदेश दिए थेए जहां पुलिस जांच तथा अदालत में सुनवाई के दौरान उनके द्वारा लगाये गये बलात्कार के आरोप झूठे साबित हुए थे।

मामला नम्बर 1 एक 70 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति के खिलाफ झूठा मामलामामला नम्बर 2 नाबालिग के घर से भागने परए अपहरण का मामला दर्जमामला नम्बर 3  निजी दुश्मनी का निपटारा करने के लिए झूठा सामूहिक बलात्कार का मामलामामला नम्बर 4  अपहरणए परीक्षण के दौरान बलात्कार का दावा खारिज रेवारी की एसपी संगीता कालिया ने कहा कि अदालत द्वारा हाल ही में लिये गये फैसले ये स्पष्ट संकेत देते हैं कि झूठे मामलों से कड़ाई से निपटा जायेगा। उन्होंने आगे कहाए ष्ष्पुलिस तथा न्यायपालिका ऐसी शिकायतों पर गंभीर नज़रिया रखती है। आईपीसी की धारा 211 सुनिश्चित करती है कि झूठी शिकायतों पर उपयुक्त जुर्माना लगाया जाए और दण्ड दिया जाए।बलात्कार का झूठा आरोप लगाने पर महिला को करना पड़ा मुकदमे का सामना एक झूठा मुकदमा दायर कर न्यायिक व्यवस्था का ष्ष्मजाकष्ष् बनाने के लिए महिला पर मुकदमा चलाया गया है। इस महिला ने अपने डांस टीचर पर कई मौकों पर बलात्कार करने का आरोप लगाया था। न्यायाधीश जैन ने कहा कि महिला ने पुलिस को झूठी सूचना दी तथा आरोपी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए पुलिस को अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया। इस झूठे मामले में अदालत का कीमती समय बर्बाद हुआ है।

इसीलिए मैं वाद दायर करने वाले के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करना उपयुक्त समझता हूं। ष्ष्घरों में महिलाओं पर घरेलु हिंसा शिकायत का आदेश में उत्तरदाता की परिभाषा में ष्ष्वयस्क पुरूष की जरूरत नहीं . सर्वोच्च न्यायालय का आदेश अक्टूबरए 2016 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिए गये एक आदेश ने वर्ष 2005 के पीडव्ल्युडीवीए ;घरेलु हिंसा अधिनियम से महिलाओं की सुरक्षाद्ध के बुनियादी तरीके को बदल दिया। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश तकए घरेलु हिंसा अधिनियम के तहत केवल घर के वयस्क पुरूष के खिलाफ ही शिकायत दर्ज की जा सकती थीए और वयस्क पुरूष के साथ क्या किन्हीं अन्य महिलाओं को भी उत्तरदाताओं के रूप में शामिल किया जा सकता हैए के बारे में विभिन्न आदेशों में विभिन्न व्याख्याएं दी गईंए क्योंकि इस अधिनियम की धारा 2 ;क्यूद्ध के तहत केवल वयस्क पुरूषों को ही उत्तरदाताओं के रूप में शामिल किया जाना इस शब्द की बुनियादी परिभाषा है। बुनियादीतौर परए घरेलु हिंसा अधिनियम नस्लीय लॉबी के इशारे पर बीटा पुरूषों और गुण संकेतों केा दबाने के लिए बनाया गया था।

 दिल्ली की मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने घरेलु हिंसा अधिनियम के तहत ब्यूटीशियन के तौर पर कार्य करने में सक्षम पत्नी का अंतरिम मेंटीनेंस नकारा चैन्नई उच्च न्यायालय का मानना है कि घरेलु हिंसा अधिनियम पूर्वाग्रहित है और अदालत इसे लिंग तटस्थ बनाने की सिफारिश करती है। घरेलु हिंसा अधिनियम के तहत पत्नी को मिलने वाले मेंटीनेंस को पुणे कोर्ट ने खारिज किया क्योंकि पहले वह काम कर रही थीए और अब वह फेसबुक और जीमेल पर चैटिंग कर समय व्यतीत करती है।कोर्ट ने महिला द्वारा उसके पति व ससुरालियों के खिलाफ तुच्छ व दुर्भावना के तौर पर घरेलु हिंसा की शिकायत को खारिज किया और रूण् 1 लाख का जुर्माना लगाया।मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट शिवानी चैहान ने कहा किए दक्षिण दिल्ली निवासी एक महिला पर अपने पति को परेशान करने और उससे पैसे उगाहने का आरोप लगा है। टिप्पणी की गई कि ष्ष्शिकायताकर्ता ;महिलाद्ध की गवाही शिकायतकर्ता के आचरण पर उस सीमा तक प्रकाश डालती है कि उसने उत्तरदाताओं ;पति व ससुरालियों कोद्ध परेशान करने के लिए विभिन्न आरापे लगाए और महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाया तथा घरेलु हिंसा अधिनियम से महिला सुरक्षा का एक साधन के तौर पर गलत इस्तेमाल किया जिससे कि उतरदाता नम्बर 1 ;पतिद्ध से व्यक्तिगत लाभ के लिए अनुचित धन उगाह सके।

यह एक उपयुक्त मामला है जो शिकायतकर्ता पर अनुकरणीय जुर्माना थोपने की मांग करता हैए जिससे कि इसे प्रवृत्ति के लोगों को ऐसी दुर्भावनापूर्ण प्रथाओं का सहारा लेने से रोका जा सके।अदालत ने महिला को ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन के खाते मे दण्ड राशि जमा करने के आदेश दिए। जुर्माना थोपना इस सिद्धांत को प्रोत्साहित करता है कि गलत कृत्य करने वालों को झूठी मुकदमेबाजी से लाभ नहीं मिलना चाहिए। क्या महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ पुरूषों के अधिकारों को छांटना सही है क्योंकि कानून तो सभी के लिए है। महिलाओं के लिए विशेष कानून बनाते समयए कानून निर्माताओं को समाज के पीडि़त खण्ड अर्थात पुरूषों के बारे में भी अवश्य सोचना चाहिए।

अनुजा कपूर