जामिया में तीन दिवसीय संगोष्ठी की शुरुआत


दक्षिणी दिल्ली: भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में विश्वास करता है और आजादी के बाद राष्ट्रीय नेताओं की इच्छा थी कि एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा बने जो कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक सब बोल सकें। लेकिन आजादी के 70 वर्ष हो गए और ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि सब अपनी जुबान को अहमियत देते हैं। बता दें यह बात जामिया मिलिया इस्लामिया की कुलपति नजमा हेपतुल्ला ने तीन दिवसीय वैज्ञानिक एंव तकनीकी शब्दावली कार्यशाला कल, आज और कल के उद्घाटन के दौरान कही।

इस तीन दिवसीय कार्यशाला और संगोष्ठी का आयोजन जामिया के वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययन विभाग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत कार्यरत वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा किया जा रहा है। वहीं जामिया की कुलपति नजमा हेपतुल्ला ने कहा कि उनके नाना और देश के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद चाहते थे कि भारत में ज्ञान की शब्दावली में एकरूपता बने जिससे कि सभी भाषा भाषी उसका लाभ उठा सकें। इसके अतिरिक्त उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों का भारतीय भाषाओं में इतना सरल शब्द खोजा जाना चाहिए जिसे सुनते ही यह पता चल जाए कि यह किस बारे में है। इसके अलावा जिन शब्दों का विकल्प संभव नहीं लगे उसे जबर्दस्ती बदलने का प्रयास नहीं होना चाहिए।

उधर, जामिया के वाइस चांसलर प्रो तलत अहमद ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग से कहा कि विदेशी भाषाओं के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों का भारतीय भाषाओं में अनुसरण करने के प्रयास में उन्हें इतना मुश्किल नहीं बना दिया जाए कि वह किसी की समझ में नहीं आए। इसके अलावा उन्होंने सुझाव दिया कि हिन्दी में ऐसे शब्दों को गढ़ने में ‘हिन्दुस्तानी’ का प्रयोग किया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा। भाषा की शुद्धतता जरूरी है लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि हिन्दी में बनाया गया कोई वैज्ञानिक या तकनीकी शब्द इतना आसान हो कि उसे सुनते ही छात्र संबंधित विषय से उसे जोड़ सकें।

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