आश्वासन के बाद भी नहीं हटा शराब ठेका


श्योपुर : मछली मार्केट स्थित देशी शराब ठेके को हटाने की मांग को लेकर वार्ड पार्षद समेत मोहल्लेवासी अपने काम धंधे को छोड़कर नपा के सामने तंबू गाड़कर विगत 24 दिन से बेमियादी हड़ताल पर बैठे हैं। लेकिन विडंबना की बात यह है कि जिला प्रशासन अब तक इस ठेके को हटाने में नाकाम साबित हुआ है। नाकामी इसलिए कही जा रही है कि जिला कलेक्टर खुद तीन दिन में शराब ठेका हटाने का आश्वासन आंदोलनकारियों को दे चुके थे। इसके बाद भी ठेका टस से मस नहीं हो रहा है। खास बात यह है कि शराब ठेके को हटाने की मांग को भाजपा जिलाध्यक्ष सहित विभिन्न दलों, यहां तक कि पूरी नपा का समर्थन प्राप्त है।

धरने की अगुवाई कर रहे पार्षद दीपचंद रेगर की मानें तो धरने से पहले इस ठेके को हटाने के लिए न केवल नपा में ठहराव हुआ, बल्कि नपाध्यक्ष स्वयं इस मामले को लेकर कलेक्टर से मिले। तब कलेक्टर ने ठेका हटाने का आश्वासन दिया था। 31 मार्च तक के मिले आश्वासन के 16 दिन बाद भी जब ठेका हटाने की दिशा में प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया तो 17 अप्रेल से बेमियादी धरना शुरू कर दिया गया, जो अब तक बदस्तूर जारी है। पिछले दिनों जब कलेक्टर सूबात कचहरी जा रहे थे,तब धरने पर बैठी महिलाओं ने उनका घेराव करते हुए शराब ठेका हटाने की मांग की थी।

उस वक्त डीएम ने नपाध्यक्ष की मौजूदगी में आंदोलनकारियों को आश्वस्त किया था कि तीन दिन में ठेका हटा दिया जाएगा। इसके लिए उन्होंने तहसीलदार को जगह चिन्हित करने के भी निर्देश दिए थे। लेकिन तब से लेकर अब तक 19 दिन गुजर चुके हैं,लेकिन ठेका हटने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बडी बात तो यह है कि इस आंदोलन को भाजपा जिलाध्यक्ष अशोक गर्ग सहित नपाध्यक्ष श्री गुप्ता, जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बृजराज सिंह चौहान, मंडी अध्यक्ष काशीराम सेंगर सहित कई दलों के नेता धरने पर पहुंचकर अपना समर्थन दे चुके हैं। बावजूद इसके ठेका नहीं हटा है और न ही हटने के कोई आसार फिलहाल नजर आ रहे हैं।

राजस्व घाटा बन रहा रोडा, बताया जाता है कि मछली मार्केट स्थित शराब ठेका साढे तीन करोड का है और यदि ठेका वहां से हटा तो ठेकेदार को भारी घाटा होना तय है। इससे आबकारी विभाग को भी रिवेन्यू का नुकशान होगा और यही संभावित राजस्व घाटा शराब ठेके के हटने में सबसे बडी बाधा बन रहा है! चूंकि प्रदेश सरकार को शराब से ही सबसे ज्यादा राजस्व मिलता है इसलिए उच्च स्तर पर भी इस मामले को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। लेकिन ठेका नहीं हटने का सबसे ज्यादा नुकसान धरने पर बैठे उन गरीब महिला-पुरुषों को हो रहा है, जो अपने काम-धंधे छोड़कर धरने पर बैठे हुए हैं।

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