डॉक्टर के पद खाली,कैसे हो समुचित उपचार?


श्योपुर: श्योपुर अस्पताल को भले ही जिला चिकित्सालय का दर्जा प्राप्त हो, लेकिन यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों सहित सहयोगी स्टॉफ की पूर्ति तमगा मिलने के बाद से लेकर आज तक नहीं हुई है। यही वजह है कि यहां आज भी विशेषज्ञ चिकित्सकों के 15 पद रिक्त पड़े हुए हैं, जबकि 22 नर्सों के पद खाली हैं। ऐसे में मरीजों को समुचित उपचार नहीं मिल पा रहा है।

खास बात यह है कि अस्पताल में स्टॉफ की पूर्ति की दिशा में न तो शासन-प्रशासन गंभीर है और न ही जनता की नुमाइंदगी करने वाले जनप्रतिनिधि। आलम यह है कि कार्यरत चिकित्सक मरीजों का इलाज करने के बजाय बला टालने के लिए उन्हें रैफर करना ज्यादा पसंद करते हैं,जिससे गरीब मरीज स्वास्थ्य सेवाएं पाने से महरूम हो रहे हैं। यूं तो जिला चिकित्सालय में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 23 पद स्वीकृत हैं,मगर विडंबना की बात यह है कि इन 23 में से वर्तमान में महज 8 ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि इलाज के लिए पूरे जिले से लोग आते हैं। इसी प्रकार नर्सिंग सिस्टर के 3 पदों में से 2 पद,नर्सिंग स्टॉफ के कुल 36 पदों में से 18 रिक्त बने हुए हैं।

वार्ड ब्वाय से लेकर भृत्य के 47 पद स्वीकृत हैं,मगर कार्यरत महज 26 ही हैं। जिस कारण मरीजों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऑपरेशन थियेटर अटेंड करने वाले वाला भी कोई कर्मचारी अस्पताल में मौजूद नहीं है।

अस्पताल में डायटीशियन का भी एक पद स्वीकृत है,किन्तु वो भी रिक्त पड़ा हुआ है। जिस कारण अस्पताल में भर्ती मरीजों को खाने के संबंध में कोई सलाह नहीं मिल पा रही है। इतना भारी भरकम स्टॉफ कम होने की वजह से यहां मरीजों को समुचित उपचार नहीं मिल पा रहा है और डॉक्टर भी अपने ऊपर बढ़ते लोड को देखते हुए मरीजों को रैफर ज्यादा कर रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि जिला अस्पताल पर पूरी जिले की जिम्मेदारी होती है,ऐसे में कम से कम स्वीकृत स्टॉफ तो पूरा होना चाहिए,मगर इस दिशा में शासन-प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है।

जनता की नुमाइंदगी करने वाले जनप्रतिनिधियों ने इस गंभीर मुद्दे को कभी अपनी प्राथमिकता में नहीं रखा। यही कारण रहा कि उन्होंने अस्पताल में स्वीकृत स्टॉफ की पूर्ति करने के लिए आज तक कोई ठोस पहल नहीं की है।

सीएमएचओ पर दोहरी जिम्मेदारी,व्यवस्थाएं बिगड़ीं : तत्कालीन जिला कलेक्टर अभिजीत अग्रवाल ने डॉ.एसके तिवारी को हटाकर डॉ.एनसी गुप्ता को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के साथ-साथ सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक की भी जिम्मेदारी सौंप रखी है,जिसके चलते उन पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी हैं। सीएमएचओ अस्पताल की व्यवस्थाएं सुधारने के चाहे लाख दावे करें।

लेकिन हकीकत यह है कि दोनों ही व्यवस्थाएं गड़बड़ाई हुई हैं। उनके समक्ष संकट यह है कि वे जिले की व्यवस्थाएं देखें या फिर अस्पताल की? दो-दो महत्वपूर्ण पदों के दायित्व का फायदा चिकित्सक सहित सहयोगी स्टॉफ खूब उठा रहा है। यही कारण है कि न तो डॉक्टर समय से अपनी सीटों पर बैठ रहे हैं हैं,और न ही सहयोगी स्टॉफ। यही हाल सीएमएचओ कार्यालय का है। यहां भी स्टॉफ मर्जी से आ रहा है और जा रहा है।

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