बाढ़ पर सरकार गंभीर नहीं, सो रही कुंभकर्ण की नींद


नई दिल्ली, (वार्ता): देश के विभिन्न राज्यों में आई बाढ़ पर सरकार को घेरते हुये कांग्रेस के गौरव गोगोई ने कहा कि सरकार स्थिति पर गंभीर नहीं दिख रही और कुंभकर्ण की नींद सो रही है। श्री गोगाई ने लोकसभा में बाढ़ पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कहा कि बाढ़ से असम में 85 लोगों की मौत हो गई है और 17 लाख लोग प्रभावित हुये हैं।मणिपुर में भी 15 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुये हैं। उन्होंने मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, राजस्थान, गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी बाढ़ की स्थिति को भयावह बताते हुये सरकार से इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की।

उन्होंने कहा ”सरकार इसके बावजूद गंभीर संकल्प नहीं ले पा रही। वह कुंभकर्ण की तरह सोई हुई है। बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा का दर्जा देकर वह लंबा संकल्प कब लेगी?” कांग्रेस सदस्य ने बाढ़ के प्रति सरकार की गंभीरता और अच्छे दिन के दावों पर सवाल उठाते हुये कहा कि उसने बाढ़ प्रबंधन को सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की सूची से हटा दिया है। उन्होंने कहा कि पहले बाढ़ नियंत्रण की परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार 75 प्रतिशत वित्तपोषण देती थी।

पूर्वोत्तर और पर्वतीय राज्यों के लिए वह 90 प्रतिशत राशि देती थी। लेकिन, नीति आयोग के मुख्यमंत्रियों के उपसमूह की अनुशंसा पर सरकार ने अपनी हिस्सेदारी घटाकर 50 प्रतिशत और विशेष राज्यों के लिए 80 प्रतिशत कर दी है। उन्होंने कहा कि इसे निर्माणाधीन परियोजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। श्री गोगोई ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट का हवाला देते हुये कहा कि देश में बाढ़ प्रबंधन की स्थिति खराब हुई है।

असम में इस मद में केंद्र से मिलने वाली 60 प्रतिशत राशि समय से जारी नहीं की गई जिससे परियोजनाओं का काम विलंबित हो रहा है। उन्होंने हर साल आने वाली आपदाओं के लिए स्थायी राहत केंद्र बनाने की भी सरकार से मांग की, जहां सोने के लिए लोगों को बिस्तर मिले, महिलाओं और बच्चों के लिए अलग कमरे हों, दवाइयों और नर्स तथा चिकित्सा कर्मचारियों का प्रबंध हो।

श्री गोगोई ने कहा कि सरकार एक ओर तो गंगा की सफाई के लिए 20 हजार करोड़ रुपये दे रही है और दूसरी ओर पूरे पूर्वोत्तर के लिए सिर्फ दो हजार करोड़ रुपये दिये गये हैं। उन्होंने कहा कि इस राशि को बढ़ाकर कम से कम 10 हजार करोड़ रुपये किया जाना चाहिये। ब्रह्मपुत्र, बराक तथा देश की अन्य नदियों को भी उन्होंने समान महत्व व देने की मांग की।

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