असम के मूल निवासियों के लिए अलग भूमि नीति की जरूरत


असम के मूल निवासियों (खिलंजिया) लोगों के लिए अलग भूमि नीति की जरूरत है अगर मूल निवासियों के पास जमीन ही नहीं रहेगी, तो वे संवैधानिक रक्षा कवच लेकर क्या करेंगे। ये बातें विधानसभा में नियम 301 के तहत अगप विधायक रमेंद्र नारायण कलिता ने कही। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के निर्देश पर अवकाश प्राप्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त हरिशंकर ब्रह्म की अगुवाई में एक कमिटी गठित की गई थी, जिसने प्रस्तावित नई भूमि नीति के बारे में रिपोर्ट दाखिल की है।

कलिता ने बताया कि उनकी जानकारी के अनुसार उक्त कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के पहले आसू सहित राज्य के जातियतावादी संगठनों से परामर्श लिया था। मिली जानकारी के अनुसार आसू ने नई भूमि नीति तैयार करते वक्त वर्ष 1951 के जमीन के रिकॉर्ड, असम समझौते की धाराओं तथा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रणव गोगोई द्वारा खिलंजिया शब्द की व्याख्या के दृष्टिगत काम करने की सलाह समिति को दी थी। कलिता के अनुसार संभवत इन सभी सलाहों को प्रस्तावित भूमि नीति समाहित किया गया है।

उन्होंने कहा कि राज्य के वनांचलों से अवैध अतिक्रमण हटाया जाना चाहिए, पर जो लोग वर्षों से वनभूमि पर रह रहे हैं, उनके प्रति सरकार को सहानुभूतिपूर्वक रवैया अपनाते हुए उन्हें भूमि अधिकार दिया जाना चाहिए। इस पर राजस्व मंत्री पल्लव लोचन दास ने उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में भूमि प्रबंधन नीति की निहायत आवश्यकता है। अपनी बात को विस्तार देते हुए मंत्री ने कहा कि इसके लिए राज्य सरकार प्रत्येक ब्लॉक में सरकारी जमीनों का लेखा-जोखा तैयार कर रही है। यह कवायद पूरी होने के बाद सरकार के पास लैंड बैंक के रूप में राज्य भर के सरकारी जमीनों का सटीक रिकॉर्ड होगा। उन्होंने हरिशंकर ब्रह्म कमेटी की रिपोर्ट पर अगली कैबिनेट की बैठक में संज्ञान लेने की बात भी कही।

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