MRI मशीन में चिपकी UP मंत्री के गनर की पिस्टल


कभी कभी मंत्रियो का रसूक भी बन जाता है जनता क लिए मुसीबत ऐसा कुछ वाकया लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में  देखने को मिला  जहाँ करीब पांच करोड़ रुपए की कीमत वाली एमआरआई मशीन खराब हो गई। इसका कारण राज्य के ही एक मंत्री सत्यदेव पचौरी का गार्ड है। दरअसल मंत्री जी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे थे। इस दौरान वे एमआरआई करने गए और उनके पीछे उनका सुरक्षा गार्ड भी घुस गया। एमआरआई कक्ष के मैग्नेटिक फील्ड के दायरे में आते ही मशीन ने गार्ड की कमर में लगी भरी हुई पिस्टल खींच ली। इस मशीन की कीमत 2 करोड़ रुपए बताई जाती है। मंत्री ने जैसे ही यह नजारा देखा वह एमआरआई रूम से बाहर भाग आए। अब खराब हो गई इस एमआरआई मशीन को ठीक कराने में करीब 25 लाख रुपये लग सकते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कम से कम सात दिनों तक अब इस पर कोई जांच भी नहीं हो सकेगी। पांच करोड़ से भी अधिक लागत की एमआरआई मशीन 3 टेस्ला पावर की है, यह काफी शक्तिशाली चुंबकीय शक्ति वाली है। मंत्री सत्यदेव पचौरी कल एक बजे डा. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की इमरजेंसी पहुंचे। उन्हें चक्कर आने की समस्या थी तो एमआरआई कराने की सलाह दी गई। रेडियोलॉजी स्टाफ दूसरे मरीजों को रोककर मंत्री को मशीन कक्ष में ले गया जहां अत्याधुनिक एमआरआई मशीन से फुल पावर मैग्नेट रेज प्रवाहित हो रही थीं। इसी बीच पचौरी का गार्ड मुकेश भी कमरे के अंदर जाने लगा। कर्मचारी ने गार्ड को रोका लेकिन वह मंत्री का हवाला देकर जांच कक्ष में चला गया। मैग्नेट फील्ड (चुंबकीय क्षेत्र) के दायरे में आते ही गार्ड की कमर में लगी भरी हुई पिस्टल को मशीन ने इतनी तेजी से खींचा कि वह कमर से निकल कर मशीन के भीतर जा चिपकी।

कक्ष से बाहर भागे मंत्री : पिस्टल को मशीन में चिपकता देख मंत्री घबरा गए। वह बाहर भागे और उनकी एमआरआई जांच भी नहीं हो पाई। उधर गार्ड मशीन से पिस्टल निकालने पर अड़ा रहा लेकिन टेक्नीशियन ने उसे रोक दिया। तब तक अधिकारी मौके पर पहुंच गए। उन्होंने बताया कि अब इंजीनियर ही मशीन खोलकर पिस्टल निकाल सकता है। तब कहीं जाकर गार्ड वापस गया।

चल सकती थी गोली : पिस्टल लोडेड थी। यह भी संभव था कि पिस्टल चल जाती और यह भी हो सकता था कि गोलियां दगने से मशीन में भी धमाका हो जाता। ऐसा होता तो वहां पर आंकोलॉजी भवन को भारी नुकसान होता। लोगों को भी चोट लग सकती थी।

लाखों खर्च, जांचें रहेंगी ठप्प : विशेषज्ञों के अनुसार मशीन से पिस्टल निकालने के लिए उसकी मैग्नेटिक फील्ड डिफ्यूज करनी पड़ेगी। कारण, मशीन बंद होने के बाद भी उसमें पोलेराइज्ड मैग्नेटिक फील्ड बनी रहती है। इसके बाद उसमें भरी 2500 लीटर से अधिक हीलियम गैस को भी निकालकर दोबारा डालनी पड़ेगी। इस सब पर 25 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस काम में कम से कम सात दिन लगेंगे। ऐसे में सभी जांचें ठप रहेंगी। रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष व संस्थान प्रशासन ने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया।

मरीजों की आफत : एमआरआई मशीन के बंद होने से रोजाना 20-25 मरीजों की जांच प्रभावित होगी। यह जांच लगभग 3500 से 5000 रुपये की होती है। जिस समय मंत्री के स्टाफ की गलती से हादसा हुआ उस वक्त 10 से अधिक मरीज जांच के लिए बैठे थे। इन सभी को आगे की तारीख दिए बिना लौटा दिया गया। आगे की सूचना मोबाइल फोन पर देने की बात कही गई। संस्थान में पहले आईएमआरआई जांच के लिए सबसे अधिक मरीजों को एक से डेढ़ महीने की वेटिंग है। अचानक मशीन बंद हो जाने से एक सप्ताह जहां मरीजों की जांच प्रभावित हो गई है वहीं इससे बड़ी मुश्किल लोहिया अस्पताल के लिए मशीन को दोबारा चलने लायक बनाना है।

पीजीआई में भी हो चुका ऐसा हादसा : एसजीपीजीआई में भी लोहिया इंस्टीट्यूट की तरह 20 सितंबर 2012 को ऐसा हादसा हो चुका है। वहां तो एमआरआई मशीन के अंदर ऑक्सीजन सिलेंडर फंस गया था। तीमारदार की गलती से हुई इस घटना के कारण किसी की जान नहीं गई थी, लेकिन 5 करोड़ रुपए की मशीन क्षतिग्रस्त हो गई थी। इस हादसे में तीमारदार ऑक्सीजन सिलेंडर सहित एमआरआई कमरे में घुस गया था। वह जैसे ही कमरे में घुसा था वैसे ही मशीन के चुम्बक ने पलक झपकते ही उसे अपनी ओर खींच लिया। अचानक सिलेंडर मशीन में फंस जाने से अफरा-तफरी मच गई थी। मरीजों को हल्की-फुल्की चोटें आई थीं। करीब 10 दिन में मशीन की मरम्मत की जा सकी थी।

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