गुरु और शिष्य का सम्बन्ध सबसे बड़ा: बडोनी


देहरादून: सम्पूर्ण समाज रक्षाबंधन का त्यौहार बड़े ही उल्लास से मना रहा है यह त्यौहार प्रतीक है भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को अमली जामा पहनाने का है। रिश्तों को नयी पहचान देने का। सम्पूर्ण समाज किसी न किसी रिश्तों की डोर से बंधा हुआ है। उनमें माता-पिता का रिश्ता, भाई-बहन का रिश्ता, भाई-भाई का रिश्ता, बहन-बहन का रिश्ता आदि। इनमें एक रिश्ता और होता वह गुरु शिष्य का रिश्ता। जो सम्पूर्ण जगत में सबसे बड़ा और अहम रिश्ता होता है। कुछ इसी तरह के विचार आज रैस्ट कैम्प पर सत्संग को सम्बोधित करते हुए ज्ञान प्रचारक रविन्द्र बडोनी ने व्यक्त किये। गुरु शिष्य का रिश्ता पुरातन काल से चला आ रहा है। आदि काल से इस समाज को गुरु, पीर, पैगम्बरों ने ब्रहमज्ञान की रोशनी से प्रज्जवलित करते आ रहे हैं।

उन्होंने कहा आगे कहा कि हमें ईश्वर, गुरु का शुक्रिया अदा करना चाहिये जिन्होंने हमें यह सुंदर शरीर प्रदान किया। दांत, आंख, कान, जिव्हा दी जिनका मोल अनमोल है। उन्होंने आगे फरमाया कि सन्त महापुरूष शुक्रराने का भाव रखते हैं कि मनुष्य विषय विकारों, भ्रमों में पड़कर जीवन के मकसद को भूलकर रास्ते में भटक जाता है, वे लोग अभागे हैं, जो परमात्मा को भूलकर विषय विकारों में फंस जाते हैं। मनुष्य भोग विलास, मोह माया में फंसकर सबकुछ देने वाले दातार को भूल जाता है।

उसका शुकराना करने के बजाय उसे मांगता ही रहता है। परन्तु जब जीवन में गुरु का आगमन होता है और उनके द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती तब मनुष्य को जीवन का उद्देश्य समझ में आता है। तभी मन में प्रेम नम्रता, सहनशीलता जैसे गुणों का वास होता है। तब मन विषय वासनाओं में न पड़कर भक्ति की ओट लेने लगता है। सत्संग समापन से पूर्व अनेकों सन्तों, भक्तों ने गीतों, प्रवचनों तथा गढ़वाली, पंजाबी, हिन्दी, कुमाऊंनी भाषा का सहारा लेकर संगत को निहाल किया। मंच संचालन युवा संत सचिन पंवार ने किया।

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