लाखों श्रद्धालुओं ने किया गंगा स्नान


हरिद्वार: बुद्ध पूर्णिमा पर्व पर श्रद्धालुओं ने हरकी पैड़ी सहित अन्य गंगा घाटों पर आस्था की डुबकी लगाई। स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने भगवान सूर्य को अर्ध्य देकर सुख समृद्धि की कामना की। इस दौरान लोगों ने दान आदि भी किया। शास्त्रों में पूरे बैशाख माह में गंगा स्नान को अधिक फलदायी बताया गया है। क्योंकि बैसाख माह की पूर्णिमा को ही भगवान बुद्ध का जन्म भी हुआ था। इसलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी के चलते श्रद्धालुओं ने हरकी पैड़ी, सुभाष घाट, राम घाट, बिरला घाट, प्रेमनगर घाट सहित अन्य गंगा घाटों पर सुबह से ही स्नान करना आरंभ कर दिया था। हरकी पैड़ी पर सुबह गंगा आरती में भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह की आरती में सैंकडो श्रद्धालुओं ने गंगा आरती में भाग लेकर मां गंगा के जयकारे लगाने के साथ ही मां गंगा की अविरलता, पवित्रता का सकंल्प भी लिया। हरकी पैड़ी सहित अन्य गंगा घाटों पर स्नान के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद रही। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े प्रबंध किया गए थे। जगह जगह तैनात पुलिसकर्मी संदिग्धों पर नजर गढ़ाए रहे।

मां जगदीशिला की डोली ने किया गंगा स्नान: टिहरी गढ़वाल से हरिद्वार पहुंची भगवान विश्वनाथ मां जगदीशिला डोली को श्रद्धालुओं ने हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान कराया। स्नान के बाद यात्रा ऋषिकेश के लिए रवाना हुई। इस यात्रा का समापन गंगा दशहरा के दिन भगवान विश्वनाथ मां जगदीशिला तीर्थ स्थल पर होगा। बता दें कि टिहरी गढ़वाल के विशोन पर्वत पर स्थित भगवान विश्वनाथ मां जगदीशिला तीर्थ स्थल से प्रतिवर्ष डोली यात्रा का आयोजन पूर्व कैबिनेट मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी के नेतृत्व में वर्ष 2000 से निरंतर होता चला आ रहा है। इसी श्रृंखला में 18वीं बार मंत्रीप्रसाद नैथानी डोली यात्रा लेकर हरकी पैड़ी हरिद्वार पहुंचे।

जहां पर स्थानीय डोली यात्रा के संयोजक भारत माता मन्दिर के श्रीमहंत ललितानंद महाराज, आमेश शर्मा, पं. जगदीश अत्री, मुकेश शर्मा, अंकुर पालीवाल, हरिओम पटुवर, एडवोकेट वरूनेश सहित तीर्थ पुरोहितों ने पं. श्रीकांत वशिष्ठ के साथ मिलकर डोली यात्रा का भव्य स्वागत किया। इस मौके पर पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रसाद नैथानी ने कहा कि वर्ष 2000 से प्रारंभ डोली यात्रा का हरिद्वार में आगमन एक परंपरा बन गया है, जो भगवान विश्वनाथ और मां जगदीशिला की कृपा से ही संभव हो पाया है।  यात्रा का उद्देश्य विश्व शांति की कामना, देव संस्कृतियों को जिंदा रखना है। बताया कि शुरू के वर्षों में डोली यात्रा हरिद्वार से विशोन पर्वत टिहरी गढ़वाल तक ही सीमित रहती थी, लेकिन विगत कई वर्षों से इस यात्रा का विस्तार कुमाऊं मंडल में भी हो चुका है।

– संजय चौहान

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