रजनीगंधा ने छीनी खुशियां


ले ले यार, खा ले, कुछ नहीं होता। रजनीगंधा है ये रजनीगंधा, कोई ऐरा गैरा गुटका नहीं। इसे बड़े-बड़ेे लोग खाते हैं। टीवी और अखबार में प्रचार भी आता है। मैं खुद ही पांच साल से खा रहा हूं, अगर इससे बीमारी होती तो अभी तक मुझे नहीं हो जाती। संदीप को जब पहली बार उनके दोस्तों ने रजनीगंधा पकड़ाई थी, तब ऐसा ही कहा था और संदीप ने उसकी बात को सच मानते हुए शान से रजनीगंधा के पाउच को फाड़ कर मुंह में डाला था। लेकिन आज संदीप मानते हैं कि वह उनके जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। एक ऐसी गलती, जिसने उन्हें मुंह छुपा कर जीने को मजबूर कर दिया। दिल्ली राज्य कैंसर संस्थान में इलाज करा रहे संदीप का कहना है कि वह परिवार के इकलौते बेटे है। घर पर अच्छी खासी खेती है। पैदावार इतनी हो जाती है कि पेट के साथ ही रसूख के लिए भी पूरा पड़ जाता है।

इसके बाद भी बहुत कुछ बच ही जाता है। इसकी वजह से रहन सहन किसी जमींदार से कम नहीं रही। लेकिन जब वक्त बदला तो सब कुछ रहते हुए भी खाने को तरस कर रह गया हूं। करीब तीन साल पहले गन्ने की ट्रॉली से गिरने की वजह से उसके चेहरे में चोट लगी थी। इसे आम चोट मान कर इसका इलाज कराना चाहा। डॉक्टर ने कई तरह की दवा बदल कर देख ली, लेकिन चोट ठीक नहीं हुई। चोट के भरने में जब तीन महीने से ज्यादा का समय लग गया तो डॉक्टर ने उन्हें कैंसर की जांच की सलाह दी। जांच रिपोर्ट आई तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।

क्योंकि डॉक्टर ने उसे कैंसर की परेशानी बताई। इलाज के लिए गाल का ऑपरेशन करना पड़ा। इस ऑपरेशन के बाद उनका कैंसर तो चला गया, इसकी वजह से यार दोस्तों में ही रहने वाले संदीप का घर से बाहर निकलना तो लगभग छूट ही गया। मगर इसके बाद भी कैंसर ने पीछा नहीं छोड़ा। चार महीने पहले उन्हें बाएं गाल पर उसी जगह फिर से परेशानी होने लगी। इस बार दर्द ऐसा था कि कुछ बोलना और खाना भी मुहाल हो गया। घर में दो प्यारे बच्चे हैं, जिन्हें सीने से हटाने का जी नहीं करता था, लेकिन इस बीमारी की वजह से उनसे दो बात करना भी मुश्किल हो गया। अब तो बस बच्चों का मुंह देख कर ही संतोष करना पड़ता है।

संदीप अब उस दिन को कोस रहा है जब उसके दोस्त ने उसे पहली बार रजनीगंधा खाने को दिया था। उस दिन उसने उस दोस्त को मना क्यों नहीं किया, ये सोच कर दिमाग फटने लगता है। अब वह सभी को यही समझाता है कि रजनीगंधा या कोई और गुटका एक बार भी मुंह में नहीं डालना चाहिए। अन्यथा जो दर्द आज वह सह रहे हैं कल उसे सहने की बारी आपकी होगी।

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