एशिया का बाहुबली


ब्रह्मपुत्र और अरुणाचल को लेकर हमेशा आंखें दिखाने वाले चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बने सबसे लम्बे पुल ‘ढोला सादिया महासेतु’ पर बड़ा बयान दिया है। आशंका तो यही थी कि चीन इस महासेतु पर तीखी प्रतिक्रिया देगा लेकिन आशंकाओं के विपरीत चीनी मीडिया ने इसकी जमकर सराहना की है। चीनी अखबार ने लिखा है कि भारत ने एशिया का सबसे लम्बा पुल बनाकर साबित कर दिया है कि वह एशिया का बाहुबली है। अखबार ने यह भी लिखा है कि चीन के इंजीनियरों को भारत से कुछ सीखना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर असम और अरुणाचल को जोडऩे वाले इस महासेतु को राष्ट्र को समर्पित किया। साथ ही इस पुल का नामकरण असम के लाल जन-जन में लोकप्रिय गायक स्वर्गीय भूपेन हजारिका के नाम पर किया। यह महासेतु पूर्वोत्तर में नई आर्थिक क्रांति का आगाज तो करेगा ही बल्कि इससे विकास में भी काफी मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया है कि यह क्षेत्र भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोडऩे में बड़ी भूमिका निभा सकता है। 29 मई, 2003 को असम के तिनसुकिया जिला के एक विधायक जगदीश भुइयां ने इस पुल के निर्माण के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखा था।

अटल जी इस परियोजना के लिए तैयार थे लेकिन अटल जी सत्ता में नहीं लौटे। अगर इस पुल का निर्माण तब शुरू हो गया होता तो यह पुल दस वर्ष पहले लोगों को मिल गया होता। आजादी के बाद से ही केन्द्र की सरकारों ने विभिन्न कारणों से पूर्वोत्तर के क्षेत्र की उपेक्षा की। अगर पूर्वोत्तर राज्यों की ओर विशेष ध्यान दिया होता तो उससे एक तो वहां के लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में वर्षों पहले लाया जा सकता था और अलगाववादी विचारधारा को समाप्त किया जा सकता था। पूर्वोत्तर के राज्यों ने विद्रोह बहुत देखा लेकिन विकास नहीं देखा। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्वोत्तर क्षेत्र को अपने प्राथमिक एजैंडे में रखा और वहां रेल लाइनों के विस्तार, बुनियादी ढांचे और इस क्षेत्र को टूरिस्ट हब बनाने के लिए तेजी से कदम उठाए। यह सही है कि इस पुल निर्माण की परियोजना को यूपीए सरकार ने 2009 में मंजूरी दी थी लेकिन इसका निर्माण कार्य अब जाकर पूरा हुआ।

जब भी देश में नए पुल, फ्लाईओवर, सड़कें बनती हैं तो लोगों का सम्पर्क बढ़ता है। दूरियां कम होने से व्यापार बढ़ता है, परिवहन बढ़ता है। किसी भी देश के विकास के सूचक पुल, फ्लाईओवर और सड़कें ही होती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों को आपस में जोडऩे के लिए कोई पुल नहीं था। पहले परशुराम कुंड ब्रिज से ढोला गांव से सादिया, इस्लामपुर, तिनिभाली के बीच 8 घंटे लगते थे। अब असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच 165 किलोमीटर की दूरी कम हो गई है। अब असम से अरुणाचल जाने में 4 घंटे कम लगेंगे। अगर सामरिक दृष्टि से देखा जाए तो इस महासेतु का काफी महत्व है। भगवान श्रीराम ने लंका तक अपनी सेनाएं ले जाने के लिए नल-नील की देखरेख में समुद्र में सेतु बना डाला था, जिसे श्रीराम सेतु कहा जाता है। इस सेतु को नल और नील की अभियांत्रिकी का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। शांतिकाल में भी सेतु जनता के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन युद्धकाल में भी सेतु देश की सेना के बहुत काम आते हैं। इस पुल से भारत को चीन के खिलाफ काफी सामरिक लाभ होगा।

चीन लगातार भारत से सटे अपने इलाकों में सामरिक रणनीति के तहत बुनियादी ढांचा खड़ा कर चुका है। भारतीय सीमाओं से लगते क्षेत्रों में सड़कों और रेललाइनों का संजाल बिछा चुका है जबकि भारत ने सीमांत क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत बनाने का काम बहुत देरी से शुरू किया। इस सेतु से भारत-चीन सीमा पर सैनिकों के लिए आवश्यक सामग्री जल्द पहुंचाई जा सकती है। अभी तक अरुणाचल प्रदेश तक सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए सेना को पश्चिमी असम के तेजपुर का रास्ता अपनाना पड़ता था। चीन लगातार अरुणाचल के कुछ हिस्सों पर अपना दावा जताता रहा है। 1962 की जंग में चीनी फौजें असम में घुसी थीं। यह पुल 60 टन वजनी युद्धक टैंक का वजन भी उठा सकता है। यह पुल भूकम्प के झटके भी सहन कर सकता है। इस पुल से चीन सीमा की हवाई दूरी महज सौ किलामीटर है। यानी सीमा पर हमारी स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी। चीन पर सतत् निगरानी रखी जा सकती है। मोदी सरकार के तीन वर्ष के शासनकाल में जिस ढंग से सड़कों, पुलों का निर्माण हो रहा है उससे स्पष्ट है कि देश का स्वरूप बदल रहा है। इस देश में पुल बनेंगे तो लोगों के आपसी रिश्ते बनेंगे और देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार बनेंगे।

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