बड़ा परिवर्तन अहम परीक्षा


आज से देश में एक कर एक बाजार यानी जीएसटी लागू होने से भारत उन देशों में शुमार हो गया है जिन देशों में यह व्यवस्था लागू है। दुनिया के करीब 165 देशों में जीएसटी लागू है। न्यूजीलैंड में 15 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 10 प्रतिशत, फ्रांस में 19.6 प्रतिशत, जर्मनी में 19 प्रतिशत, स्वीडन और डेनमार्क में 25 प्रतिशत और यहां तक कि पाकिस्तान में भी 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी लागू है। जीएसटी की अवधारणा कोई नई नहीं लेकिन लागू होने में 17 वर्ष लग गए। एक देश एक कर की मंशा से सबसे पहले राजीव गांधी की सरकार में वित्तमंत्री रहे स्वर्गीय वी.पी. ङ्क्षसह ने फरवरी 1986 में मॉडिफाइड वैट (MODVAT) पेश किया था। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसकी नींव रखी और जीएसटी को चर्चा के लिए पेश करने की मंजूरी दी। जीएसटी लागू करने के लिए तत्कालीन पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री असीम दास गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया था। 2007 में यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने बजट में 2010 से जीएसटी लागू करने का प्रस्ताव दिया था। विपक्ष द्वारा जीएसटी समारोह का विरोध औचित्यहीन है क्योंकि उनके समर्थन में ही बिल पास हुआ है और सभी राज्य इसे पारित कर चुके हैं।

सैद्धांतिक रूप से भाजपा और कांग्रेस दोनों जीएसटी का समर्थन करते रहे हैं लेकिन कुछ बिन्दु ऐसे थे जिसकी वजह से इस बिल को राज्यसभा में कांग्रेस का समर्थन नहीं मिल रहा था। कांग्रेस केन्द्र द्वारा सभी सेवाओं और वस्तुओं पर एक प्रतिशत से ज्यादा कर लगाए जाने के फैसले के विरोध में थी जिसे सरकार ने बिल से हटा दिया। कांग्रेस चाहती थी कि जीएसटी पर 18 प्रतिशत का ष्ट्रक्क तय करे यानी जीएसटी के तहत टैक्स की दर हमेशा 18 प्रतिशत ही हो, जिसे आगे सरकार अपनी मर्जी से न बढ़ा पाए। मुद्दों पर मतभेदों के चलते वक्त बीतता गया और अंतत: सरकार इस बिल को राज्यसभा में पारित कराने में सफल रही। यह संविधान में 122वां संशोधन था और कर सुधारों को लेकर आजादी के बाद से अब तक सबसे महत्वपूर्ण संशोधन माना जा रहा है। जीएसटी से पहले भारत के कर ढांचे के सिस्टम में सबसे बड़ा बदलाव 2005 में किया गया था जब सेल्स टैक्स यानी बिक्रीकर को वैट  (VAT) में बदला गया था। वैट की मदद से अलग-अलग चरणों में करों को कम करने की कोशिश की गई थी लेकिन वैट उन वस्तुओं पर भी लगता था जिनके लिए एक्साईज ड्यूटी चुकाई जा चुकी थी। यानी आम लोगों को टैक्स पर टैक्स देना पड़ता था। भारत में कर व्यवस्था के तहत देश में निर्मित होने वाली वस्तुओं की मैन्युफैक्चरिंग पर एक्साईज ड्यूटी देनी पड़ती थी जबकि यह सामान जब बिक्री के लिए जाता था तो इस पर सेल्स टैक्स और वैट लग जाता था। इसी तरह सेवाओं पर यह लोगों को टैक्स देना पड़ता था लेकिन जीएसटी लागू होने पर सामान या सेवा पर एक ही टैक्स देना होगा।

जीएसटी के फायदे और नुकसान पर कई दिनों से चर्चा चल रही है। छोटे व्यापारी, कारोबारी, बड़े उद्यमी और कार्पोरेट घराने सब अपना-अपना आकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। कई सैक्टरों ने जीएसटी का विरोध किया है तो कई सैक्टर समर्थन में खड़े हैं। कर विशेषज्ञ इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी कदम मान रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को राहत मिलेगी या उन पर बोझ बढ़ेगा। आस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, मलेशिया और सिंगापुर ने 1991-2000 के बीच अपने-अपने यहां जीएसटी व्यवस्था को लागू किया था उस साल जीडीपी के आंकड़ों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी। महंगाई बढ़ गई थी। सिंगापुर में 1994 में जीएसटी लागू किया गया था, जिसके बाद वहां की विकास दर 5.6 फीसदी से घटकर 3 फीसदी पहुंच गई थी। इस देश को महंगाई की मार सहनी पड़ी थी। कनाडा ने 1991 में जीएसटी लागू किया था लेकिन लागू करने के बाद वहां नियमों में लम्बे समय तक परिवर्तन किया जाता रहा। स्वयं वित्त मंत्री अरुण जेतली कह चुके हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद कुछ दिनों तक अर्थव्यवस्था के सामने कड़ी चुनौतियां होंगी लेकिन लम्बी अवधि में इससे देश को फायदा होगा। परिवर्तन संसार का नियम है। परिवर्तन गतिशीलता की निशानी है। देश में बड़ा बदलाव हो चुका है। असली बड़ी परीक्षा की घड़ी तो अब है। देखना है कि जीएसटी के परिणाम क्या निकलते हैं, देश में जब भी नई व्यवस्थाएं लागू होती हैं तो कुछ अवरोधक तो सामने आते ही हैं और देश को चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हर क्षण तैयार रहना होगा। नियमों में परिवर्तन किए जाते रहे हैं और परेशानियों को दूर करने के लिए नियमों में परिवर्तन होते रहेंगे।

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