चीन को सुधरना ही होगा?


मैं पहले ही लिख चुका हूं कि चीन के मामले में भारत की कूटनीति की अग्नि परीक्षा का समय आ सकता है। हमें अपने इस पड़ोसी देश के साथ अपने संबंधों को घनिष्ठ होते व्यापारिक संबंधों के पार देखना होगा और सामरिक मोर्चे पर चीन को ‘तटस्थता’ के निकट रखना होगा। ऐसा इसलिए जरूरी है कि अमरीका के साथ भारत के बढ़ते संबंधों की छाया भारत-चीन संबंधों पर न पडऩे दी जाए क्योंकि चीन ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से हमारा सबसे निकट का ऐसा पड़ोसी देश है जिसने 1962 में हमारी शांति और सौहार्द के साथ सह-अस्तित्व की नीति के परखचे उड़ा दिए थे मगर स्पष्ट है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है और न ही विश्व परिस्थितियां 1962 वाली हैं। पूरी दुनिया बदल चुकी है। स्वयं चीन भी ‘कम्युनिस्ट पूंजीवाद’ की राह पर चल पड़ा है और बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के चक्र का हिस्सा बन चुका है। अत: चीन के सामने भी भारत के साथ सहयोग के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचता है परन्तु वह अपनी ताकत के बूते पर अपनी शर्तों के मुताबिक शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व चाहता है जो किसी भी तौर पर वाजिब नहीं कहा जा सकता। यह हकीकत है कि भारत-चीन की सीमाएं छह तरफ से खुली हुई हैं और दोनों देशों के बीच अभी तक कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं है। इसके ऐतिहासिक कारण भी मैं कई बार लिख चुका हूं मगर फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि चीन ने अंग्रेजों द्वारा 1914 में खींची गई भारत-चीन-तिब्बत के बीच मैकमोहन रेखा को कभी स्वीकार नहीं किया लेकिन इससे भारत का पक्ष किसी भी तौर पर कमजोर नहीं होता है क्योंकि चीन से लगे सीमावर्ती इलाकों में भारतीय प्रशासन व सांस्कृतिक समरूपता का प्रभाव रहा है। यह बेवजह नहीं था कि जब चीन ने 1949 में अपने स्वतंत्र होने के बाद तिब्बत पर हमला किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बत से सटे पूरे ‘नेफा’ इलाके में भारतीय शासन को चुस्त-दुरुस्त कर दिया था। कालान्तर में यही नेफा अरुणाचल प्रदेश बना जिस पर चीन अपना अधिकार जताता रहता है। इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि चीन की सीमा से लगे सिक्किम व भूटान जैसे पहाड़ी स्वतंत्र देश भी उस समय थे और इनके साथ भारत के अटूट सांस्कृतिक सम्बन्ध होने के साथ ही अंग्रेजी शासन से विरासत में मिले पक्के रक्षा सम्बन्ध भी थे। ऐसा ही मामला नेपाल के साथ भी था मगर थोड़ा बदला हुआ था। सिक्किम को स्व. इदिरा गांधी ने 1972 में ही भारतीय संघ का हिस्सा बना दिया था। इसकी एक वजह चीन की बढ़ती भूमि भूख भी थी। इस राज्य की आज भी आबादी कुल दस लाख के लगभग है मगर सामरिक रूप से इसकी स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। चीन यह अच्छी तरह जानता है कि भारत-भूटान के बीच की रक्षा संधि उसे भूटान, चीन, भारत की छूती सीमाओं में अतिक्रमण करते ही सीधे भारत के सामने ले आएगी इसीलिए वह डोकलाम पठार में यह सीना जोरी कर रहा है। इसके साथ चीन यह भी जानता है कि वह अनाधिकार रूप से पाक अधिकृत क्षेत्र में सड़कों व अन्य परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है क्योंकि इस क्षेत्र का विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा है। इसके बावजूद वह पाकिस्तान को लगातार शह देकर भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है लेकिन चीन ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, द. अफ्रीका) संगठन में भारत के साथ सहयोग भी कर रहा है। यह विश्व की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का संगठन है। इससे पाकिस्तान का कोई लेना-देना नहीं है मगर भारतीय उपमहाद्वीप में भारत को दबाव में रखने के लिए चीन पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ कर रहा है और बंगलादेश से लेकर श्रीलंका आदि तक में अपना निवेश बढ़ा रहा है। जाहिर है कि चीन कूटनीतिक तौर पर भारत के समक्ष चुनौती पैदा करते हुए सामरिक स्तर पर भी भारत को दबाना चाहता है। वह दुनिया के पांच परमाणु शक्ति धारक देशों ‘पी-5’ का सदस्य है और राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद का भी स्थायी सदस्य है। इसके बावजूद एशिया व अफ्रीकी महाद्वीपों में उसकी ‘साख’ वह नहीं है जो भारत की है। चीन की एक चिन्ता यह भी है कि वह आर्थिक और सामरिक रूप से भारत से कई गुना शक्तिशाली हो सकता है मगर दुनिया के बाजार में उसकी साख ‘झपट्टामार मुल्क’ जैसी ही है। अत: भारत से झगड़ा मोल लेने से पहले उसे सौ बार सोचना होगा। दूसरी तरफ भारत को भी कूटनीतिक तौर पर यह चतुराई दिखानी होगी कि चीन के साथ उसके संबंधों पर अमरीकी साया इस तरह न पड़े कि अमरीका-चीन की स्पद्र्धा के बीच भारतीय उपमहाद्वीप जंग का अखाड़ा बनने की तरफ आगे चले। चीन ने पाकिस्तान को अपने साथ रखकर इसी तरफ इशारा करना शुरू कर दिया है। उसकी जितनी भी नई परियोजनाएं हैं वे हिन्द महासागर क्षेत्र और भारतीय उपमहाद्वीप से होकर ही गुजरती हैं मगर एक नया तमाशा खड़ा हो गया है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दिल्ली स्थित चीनी राजदूत से मिले। देश की सभी राजनीतिक पार्टियों का प्रथम कर्तव्य देशहित की सुरक्षा करना होता है मगर शुरू में कांग्रेस ने इस मुलाकात का खंडन कर दिया और बाद में इसे स्वीकार कर लिया। ऐसा क्यों किया गया, यह समझ से परे है जबकि विपक्षी नेता विदेशी राजनयिकों से मिलते रहते हैं। चीन के टेढ़े तेवरों को देखकर यदि कांग्रेस नेता चीनी राजदूत से मिले भी तो इसमें गलत कुछ भी नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मसलों के हल के लिए भारत में शुरू से ही सर्वसम्मति की परंपरा रही है मगर लगता है कांग्रेस के नेताओं का खुद पर ही यकीन समाप्त होता जा रहा है। देशहित से बड़ा कोई हित नहीं होता। इसी प्रकार वर्तमान केन्द्रीय मंत्रिमंडल के तीन सदस्यों की चीन यात्रा को छुपाने का क्या औचित्य है?

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