कांग्रेस और प्रणव मुखर्जी


पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अपनी मूल पार्टी कांग्रेस के बारे में बहुत ही स्पष्ट शब्दाें में बिना लाग–लपेट के दिशा नियामक सिद्धान्त बताया है कि अपनी पहचान और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए इसे विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ केवल सत्ता में आने के उद्देश्य से गठबंधन करने से बचना चाहिए। हालांकि श्री मुखर्जी ने पुनः दलीय सक्रिय राजनीति में आने से इंकार कर दिया और कहा कि किसी राजनीतिक दल के दायरे में बंधना उनके लिए संभव नहीं है और वह इस मामले में परंपरावादी हैं क्योंकि एेसा कोई भी उदाहरण नहीं है जबकि किसी पूर्व राष्ट्रपति ने सक्रिय राजनीति में पदार्पण किया हो। जाहिर तौर पर श्री मुखर्जी ने कांग्रेस के बारे में जो विचार व्यक्त किये हैं वे एक राजनीतिक चिन्तक और अपनी सक्रिय राजनीति की लम्बी पारी के अनुभव के आधार पर व्यक्त किए हैं अतः इन्हें अत्यन्त गंभीरता के साथ लिए जाने की जरूरत है।

हालांकि 2003 में जब केन्द्र में वाजपेयी सरकार थी और कांग्रेस विपक्ष में थी तो इसके शिमला में हुए सम्मेलन में भाजपा से मुकाबला करने के लिए अन्य दलों के साथ सहयोग करने का प्रस्ताव पारित किया गया था जो कि इसके पिछले पंचवटी सम्मेलन में पारित उस प्रस्ताव के उलट था जिसमें कहा गया था कि ‘कांग्रेस एकला चलो रे’ की राह अपनाएगी। बिना शक यह कांग्रेस का रास्ता बदल था मगर श्री मुखर्जी ने खुलासा किया कि वह अकेले कांग्रेसी नेता थे जिन्होंने इस परिवर्तन का विरोध किया था मगर पार्टी के अन्य सभी नेताओं की राय गठबन्धन की राह पर चलने की थी लेकिन इसके बावजूद हिमाचल की राजधानी में हुए इस सम्मेलन में गठबन्धन का प्रस्ताव श्री मुखर्जी से ही कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने रखवाया था जिसे ‘शिमला संकल्प’ का नाम दिया गया था। श्री मुखर्जी ने आज के दौर के राजनी​तिज्ञों की आंखें खोलने के लिए एक नीति सूत्र भी बताया है कि चुनावी हार से कभी पार्टी का जनसमर्थन का आधार समाप्त नहीं होता है। वह सुप्तप्रायः तो हो सकता है मगर मृतप्रायः नहीं हो सकता क्योकि राजनीतिक दल अंततः अपने जीवंत रहने की शक्ति आम जनता से ही प्राप्त करते हैं।

अतः जरूरी यह होता है कि किसी भी राजनी​तिक दल का लोगों से लगातार सम्बन्ध बना रहे और वह उनकी अपेक्षाओं को समझता रहे। यह कोई आश्चर्य नहीं था कि 1984 में भाजपा के लोकसभा में दो सदस्य रह जाने के बावजूद केवल 15 वर्षों के भीतर ही यह केन्द्र में साझा सरकार बनाने में सफल हो गई। अतः किसी राजनीतिक दल के भविष्य का पांच वर्षों के भीतर हुई चुनावी हार-जीत के आधार पर आकलन करना उचित नहीं कहा जा सकता। सबसे अधिक महत्व जनता से सम्पर्क बनाये रखने की प्रक्रिया होती है क्योंकि लोकतन्त्र में मजबूत विपक्ष होना भी इसकी सफलता के लिए जरूरी होता है। एक तथ्य श्री प्रणव मुखर्जी ने बहुत चतुरता के साथ रेखांकित किया है कि देश में कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक महत्ता अन्य सभी दलों के मुकाबले अलग श्रेणी में रखी जानी चाहिए। हालांकि उन्होंने इस बारे में प्रत्यक्षतः कोई शब्द नहीं कहे मगर अपने उद्गाराें की गूढ़ता में इसे वह छिपा भी नहीं पाए। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि कांग्रेस भारत को स्वतन्त्रता दिलाने वाली एेतिहासिक पार्टी है, दूसरा कारण यह है कि भारत में लोकतन्त्र की स्थापना करने वाली भी यही पार्टी है और तीसरा प्रमुख कारण यह है कि आजादी के बाद आधुनिक विकास का सौपान भी इसी पार्टी के नेतृत्व में भारत ने चढ़ा है। इस मामले में प्रणव दा का नजरिया शुरू से ही बहुत साफ रहा है।

जब वह 2012 में राष्ट्रपति बने थे तो गणतन्त्र दिवस के अपने सन्देश में उन्हाेंने प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू का वह लेख उद्धृत किया था जो उन्होंने स्वतन्त्रता मिलने से कुछ समय पहले ही लन्दन से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार में लिखा था। इस लेख में पं. नेहरू ने भारत की एेतिहासिक विरासत का हवाला देते हुए साफ किया था कि ‘‘भारत कभी भी गरीब मुल्क नहीं रहा। यह प्रारम्भ से ही समृद्धशाली राष्ट्र रहा क्योकि किसी गरीब मुल्क पर विदेशी ताकतें एक हजार साल तक राज नहीं करतीं और उसकी गरीबी को अपने गले में नहीं डालतीं।’’ इसी वजह से उन्हाेंने कहा कि कांग्रेस मेरे जन्म से पहले भी इस देश में थी और मेरे बाद भी रहेगी और मेरे इसमें रहने या न रहने से भी इस पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अतः सर्वप्रथम कांग्रेसियों को ही इस बारे में भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि उनकी पार्टी का पुनरुत्थान या पुनर्जीवन गठबन्धन की राह पकड़ कर ही हो सकता है।

इसके लिए उन्हें अपने आप पर ही सबसे पहले भरोसा होना चाहिए और अपनी विरासत की धरोहर पर भी। यह हकीकत है कि दुनिया में बहुत कम एेसे देश हैं जिन्हें एेसी राजनीतिक विरासत नसीब है मगर मौजूदा दौर में इस पार्टी के राजनीतिक नेतृत्व का दिवालियापन तब उजागर हुआ था जब इसने पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से गठबंधन केवल इसलिए कर लिया था कि यह भाजपा को सत्ता में आने से रोक सके मगर एेसा करके इसने समाजवादी के पार्टी वे सारे पाप अपने सिर पर ढो लिए जो इसने पांच साल तक सत्ता में रहते किये थे। इसीलिए प्रणव दा ने बहुत साफ तरीके से कहा कि केवल सत्ता के लिए गठबन्धन करना अपनी पहचान खोना है। बेहतर तो तब होता है जब पांच साल विपक्ष में बैठने पर भी अपनी पहचान को सुरक्षित रखा जाए। गौर से देखा जाये तो गठबन्धन केवल सत्ता की अवसरवादिता है।

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