कांग्रेस पार्टी और नेशनल हेराल्ड !


जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को देशभर में इमरजेंसी लगाई तो कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र समझे जाने वाले अंग्रेजी अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ ने अपना यह आमुख वाक्य छापना बन्द कर दिया कि ”आजादी खतरे में है, पूरी ताकत के साथ इसकी रक्षा करो” (फ्रीडम इज इन पेरिल, डिफेंड इट विद आल योर माइट)। स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रमुख गवाह और प्रहरी रहे इस अखबार का प्रकाशन 90 के दशक में बहुत ही दयनीय परिस्थितियों में बन्द कर दिया गया। संयोग से आज वह दिन गुजरा है जब 1975 में श्रीमती इन्दिरा गांधी का रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश स्व. जगमोहन लाल सिन्हा ने अवैध घोषित किया था। अखबार का आमुख वाक्य भारतवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह लगातार इस देश के लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से लेकर लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति सचेत रखता था। बेशक इस अखबार का प्रकाशन देर से ही सही कांग्रेस पार्टी ने नेशनल हेराल्ड सम्पत्ति विवाद में फंस जाने के बाद बेंगलुरू से शुरू किया है।

मैं इसका स्वागत इसलिए करता हूं क्योंकि केन्द्र में भाजपा की सरकार है जिस पर आजकल प्रेस की आजादी को नियन्त्रित करने का आरोप लगाने का फैशन चला हुआ है। नेशनल हेराल्ड का पुन: प्रकाशन इन सब आरोपों का माकूल जवाब है जो घोषणा करता है कि भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता को किसी भी प्रकार का खतरा नहीं है मगर अवार्ड वापसी ब्रिगेड के कुछ सिपहसालार यह भ्रम फैला देना चाहते हैं कि पत्रकारों की स्वतन्त्रता सिकुड़ रही है। ऐसे लोगों को इस तथ्य का आभास होना चाहिए कि केन्द्र में मोदी सरकार आने से पहले ही 2014 में भारत की गणना दुनिया के ऐसे देशों में तीसरे नम्बर पर होती थी जहां पत्रकारों के लिए काम करना बहुत मुश्किल होता है। पहले नम्बर पर निश्चित तौर पर अफगानिस्तान का नाम था मगर भारत में इलैक्ट्रानिक मीडिया के प्रसार के बाद पत्रकारों की जिन्दगी ज्यादा जोखिम भरी हुई है इसमें किसी प्रकार के शक की गुंजाइश नहीं है। केवल दो दिन पहले ही जिस तरह चेन्नई में स्वयं जयललिता की सम्पत्ति पर दावा करने वाले उनके भतीजे और भतीजी में युद्ध छिड़ा उसका खामियाजा अंग्रेजी राष्टï्रीय न्यूज चैनल रिपब्लिक के पत्रकारों को भुगतना पड़ा। उनके साथ मार-पिटाई की गई। इससे पूर्व केन्द्र में मन्त्री रहे शशि थरूर के गुंडों ने तिरुवनन्तपुरम में उनकी पत्नी सुनन्दा की संदिग्ध मृत्यु से जुड़े सवाल पूछे जाने पर इसी चैनल के पत्रकारों की पिटाई कर दी थी। यदि और पीछे जाया जाये तो बिहार के राजनीतिक माफिया डान शहाबुद्दीन पर सीवान में एक अखबार के पत्रकार की हत्या कराने का मामला चल रहा है। यदि और पीछे चला जाये तो स्व. राजीव गांधी ने अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में आधिकारिक गोपनीय कानून में संशोधन के बहाने पत्रकारों पर नकेल कसने की असफल कोशिश की थी। और पीछे जायें तो बिहार की कांग्रेसी जगन्नाथ मिश्र सरकार ने प्रेस को पंगु बनाने के सारे इन्तजाम किये थे मगर इनमें से किसी भी व्यक्ति की एक भी चाल कामयाब नहीं हो पाई।

इसकी वजह यह थी कि बिहार जैसे गरीब राज्य का आम नागरिक बिना रोटी के तो एक वक्त रह सकता है मगर वह बिना अखबार पढ़े अपना दिन शुरू नहीं कर सकता। लोकतन्त्र उसकी शिराओं में खून बनकर दौड़ता है इन्दिरा गांधी ने इमरजेंसी में सबसे बड़ा पाप यही किया था कि उन्होंने अखबारों और मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दी थी। वरना सोचिये इमरजेंसी में सरकारी दफ्तरों में काम समय पर शुरू होता था। महंगाई की घड़ी उल्टी घूमने लगी थी। हर छोटे से छोटा दुकानदार सामान के भाव लिखकर टांगे रखता था। रेलगाड़ी और बसें समय पर आती थीं और जाती थीं। अपराधी तत्व पुलिस से भय खाते थे और हद यह थी कि हर साधारण नागरिक भी जुबान खोलने से डरता था। जुबान का यही बन्द होना श्रीमती इन्दिरा गांधी के लिए इतना महंगा साबित हुआ कि वह 1977 में अपना लोकसभा चुनाव तक हार गईं मगर सरकारी जुबान बने कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड ने अपना आमुख वाक्य हटा दिया। दरअसल लोकतन्त्र में जब डा. राम मनोहर लोहिया ने प्रेस को चौथा खम्भा कहा तो उनके सामने भारत की हकीकत स्पष्ट थी कि जिस व्यक्ति को तीनों खम्भों विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका से भी न्याय नहीं मिल पाता वह चौथे खम्भ प्रेस की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखता है। यही वजह है कि मनमोहन शासनकाल में कई वित्तीय घोटालों का पर्दाफाश प्रेस या मीडिया के साहस की वजह से ही हुआ। मुझे अच्छी तरह याद है कि तब स्वयं प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा था कि मीडिया की आदत स्पिट एंड रन (आरोप लगाओ और भागो) को ताकत देने की नहीं होनी चाहिए बल्कि उसे किसी समस्या की गहराई तक पड़ताल करके उसकी असली वजह को ढूंढना चाहिए। इसके साथ डा. सिंह ने एक और बात मीडिया के बारे में कही थी जो हर लोकतन्त्र के लिए हमेशा खरे सिक्के की तरह रहेगी कि विश्वसनीयता मीडिया की मुद्रा (इंटीग्रिटी इज दि करेंसी आफ मीडिया) होती है।

अत: कांग्रेस पार्टी ने जिस अखबार को पुन: प्रकाशित करने की ठानी है उसका उद्देश्य लोकतन्त्र को मजबूत बनाना और विश्वसनीयता को हर हालत में कायम रखना होना चाहिए। राहुल गांधी ने इसका उद्घाटन करते हुए कहा कि सच को छापने में डर नहीं होना चाहिए। भारत का मीडिया यही कार्य पिछले सत्तर साल से कर रहा है बेशक कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं मगर इसका मतलब यह नहीं है कि अखबार राजनीति के ढिंढोरची बन जायें। लोकतन्त्र में हर उस राजनीतिक दल की हिस्सेदारी है जिसका विश्वास अहिंसा में है। इसमें कम्युनिस्टों से लेकर कांग्रेस व भाजपा तक शामिल हैं मगर कांग्रेस को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह पहली बार विपक्ष में नहीं बैठ रही है अत: उसे किसी अखबार या चैनल का बहिष्कार करने का अधिकार लोकतन्त्र नहीं देता है। किसी भी पत्रकार या चैनल के सवाल असुविधापूर्ण हो सकते हैं, कभी-कभी गलत धारणा तक पर आधारित भी हो सकते हैं मगर कोई भी राजनीतिक दल उनके सवालों को यदि गोल करने की कोशिश करता है तो वह पहली ही नजर में खुद गलत साबित हो जाता है। यह मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने 3 दिसम्बर, 1950 को सम्पादकों के सम्मेलन में कहा था कि ”मीडिया पर शर्तें लगाकर आप कुछ नहीं बदल सकते बल्कि केवल उन बातों को ही हवा दे सकते हैं जो जनता के दिमाग में घूम रही होती हैं।”

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