राजनीतिक हिंसा का षड्यंत्रकारी खेल (5) त्रिपुरा : ईमानदार मुख्यमंत्री की भ्रष्ट सरकार


आज के सम्पादकीय में मैं बात करूंगा त्रिपुरा की। त्रिपुरा एक रियासत थी और 20वीं सदी की शुरूआत तक आदिवासी इसमें बहुसंख्यक थे, लेकिन आज वे राज्य की आबादी का महज एक तिहाई हैं। जनसांख्यिकी में यह बदलाव आजादी से पहले के दौर में हुआ जब यहां जंगलों को काटकर खेती को प्रोत्साहन दिया गया। बंटवारे और बंगलादेश युद्ध ने बंगालियों के यहां बसने की प्रक्रिया को तेज किया। राज्य बनने के बाद से त्रिपुरा की नीतियां ज्यादातर शहरों पर केन्द्रित रहीं। यह असंतुलन और इस पर आदिवासियों का असंतोष आजादी से पहले भी दिखता था लेकिन 1972 में राज्य बन जाने के बाद भी त्रिपुरा इस मसले को सुलझाने में विफल रहा।आपातकाल के बाद की गड़बडिय़ों का फायदा उठाकर नृपेन चक्रवर्ती राज्य के मुखिया बन गए और इसी के साथ ही त्रिपुरा का काला अध्याय भी शुरू हो गया।

दो वर्षों के भीतर ही राज्य को देश के सबसे बुरे दंगों में से एक का सामना करना पड़ा। 1980 के उस दंगे में सरकारी तौर पर लगभग 2000 लोग मारे गए। वास्तव में यह संख्या बहुत ज्यादा थी। आम जनमानस की आत्मा में एक स्थायी घाव बन गया और इसी के साथ ही 20 वर्षीय आतंकवाद की भी शुरूआत हो गई। इनमें से एटीटीएफ माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक था। अल्पसंख्यक ईसाइयों ने एनएलएफटी को प्रश्रय दिया और त्रिपुरा के बैपटिस्ट चर्च ने उसे आर्थिक सहायता पहुंचाई। हजारों लोग मारे गए, हजारों अगवा हुए और फिरौतियां शुरू हो गईं। महिलाओं से छेड़छाड़, बलात्कार और उत्पीडऩ आम बात हो गई। सैकड़ों गांव खाली हो गए और बंगाली हिन्दुओं और आदिवासी हिन्दुओं को अपूरणीय क्षति उठानी पड़ी।

1999 से लेकर 2009 के बीच आतंकवादियों के हाथों 3470 निर्दोषों की हत्या हुई। सन् 2000 का वर्ष आतंकवाद का चरम वर्ष था। उस साल 514 लोग मारे गए जिनमें से 453 आम नागरिक, 45 आतंकवादी थे। साथ ही सुरक्षा बलों के 16 जवान भी शहीद हुए। उस समय की 32 लाख की जनसंख्या को देखते हुए यह बहुत बड़ी संख्या कही जा सकती है। ज्यादातर घटनाओं में त्रिपुरा की सीपीआईएम सरकार की सहभागिता रही है लेकिन केन्द्रीय सरकारों ने राजनीतिक मजबूरियों के चलते हमेशा ही सबूतों की अनदेखी की है।1988 में यहां कांग्रेस की सरकार बनी परन्तु नरसिम्हा राव ने केन्द्र में समर्थन के बदले त्रिपुरा की सत्ता प्लेट में परोस कर सीपीआईएम को पेश कर दी। केन्द्र ने चुनाव से दो दिन पहले ही राष्ट्रपति शासन की घोषणा करते हुए चुनावों की तिथि आगे बढ़ा दी ताकि सीपीएम को चुनाव जीतने में सहूलियत हो सके।

तब से ही केन्द्र की सक्रिय सहभागिता द्वारा त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टी का निर्बाध शासन जारी है। 1990 में यहां उग्रवाद फैल गया और हथियारबन्द संगठन अलग राज्य की मांग करने लगे। फिर सत्ता ने उग्रवाद पर काबू पा लिया और परिणामस्वरूप 18 वर्ष बाद 2015 में अफस्पा हटा लिया गया। त्रिपुरा में टकराव तो कोकराभाषी मूल आबादी और बंगाली समुदाय के बीच रहा है और हिंसा  भी देखने को मिली है।दूसरा दु:खद पहलू त्रिपुरा की राजनीतिक हिंसा भी है। त्रिपुरा में भी वामपंथी सत्ता के तहत राजनीतिक हिंसा भयानक रूप ले चुकी है। राज्य की राजनीति में कई दशकों से माकपा का ही वर्चस्व रहा है, जहां पर लगभग 20 वर्षों से मुख्यमंत्री माणिक सरकार हैं और माकपा उसे अपने अंतिम बचे हुए गढ़ के रूप में देखती है।

माणिक सरकार को बहुत ही स्वच्छ छवि वाला बताया जाता है। उन्हें देश सबसे गरीब, सबसे ईमानदार और मितव्ययी मुख्यमंत्री के तौर पर जानता है। वे ज्यादातर रिक्शा में सफर करते हैं। अपनी 5 हजार रुपए तनख्वाह भी पार्टी को देते हैं, साधारण कपड़े पहनते हैं लेकिन पूरे शासन तंत्र में माकपा और नौकरशाही ने भ्रष्टाचार का ताना-बाना बुन रखा है। सरकार झूठे आंकड़े पेश करती है। सरकारी नौकरियों से लेकर जनसुविधा के क्षेत्रों पर पार्टी का कब्जा है और गैर कम्युनिस्ट विचारधारा का व्यक्ति वहां कुछ नहीं कर सकता। आपका बीपीएल कार्ड भी नहीं बन सकता।

लोग मैडिकल सीटें बेचे जाने की बात करते हैं परन्तु त्रिपुरा सरकार ने पूरे का पूरा मैडिकल कॉलेज ही बेच डाला।हैरानी की बात तो यह है कि त्रिपुरा के सरकारी कर्मचारी देश में सबसे कम वेतन पाते रहे हैं। वहां अंतिम बार 1979 में वेतन आयोग लागू हुआ था। उनके लिए विकल्प खुला है। लुटेरे बनो और धनी हो जाओ। वेतन की चिन्ता मत करो। केन्द्र का धन कहां जाता है, कोई हिसाब-किताब नहीं। प्रशासन ने समाज के व्यापक हिस्से को मानसिक और नैतिक तौर पर भ्रष्ट बना डाला। त्रिपुरा केरल मॉडल की गोपनीय प्रयोगशाला कैसे बना, इसकी चर्चा मैं कल के लेख में करूंगा। (क्रमश:)

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