दलितों का धर्मपरिवर्तन!


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गुजरात के ऊना जिले के एक गांव में अगर आजादी के 70 साल बाद भी दलित समुदाय के लोगों को अपना धर्म परिवर्तन करने को मजबूर होना पड़ता है तो जाहिर है कि भारत आज भी उस मनुवादी प्रवृत्ति के शिकंजे में जकड़ा हुआ है जिसमें जन्म के आधार पर मनुष्य की ऊंच–नीच निर्धारित कर दी जाती है। दुनिया में भारतीय उपमहाद्वीप अकेला एेसा क्षेत्र है जिसमें जातिवाद की कुप्रथा जड़ें जमाये हुए है। अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाते समय यहां फैली जातिप्रथा का पूरा लाभ उठाया औऱ समस्त भारतीयों को दलित बनाकर उनका शोषण किया। ब्रिटिश सत्ता ने मनुस्मृति के सिद्धान्तों काेे जिस चतुरता के साथ भारतीयों पर लागू करके उन्हें आपस में लड़ाकर सामाजिक विद्वेश को जीवन्त बनाये रखा उसे समाप्त करने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने जीवन का सबसे कठिन संघर्ष करना पड़ा । 1932 में पूना में गांधी – अम्बेडकर में जो समझौता हुआ वह आजाद होने वाले भारत की एेसी आधारशिला रखी थी जिसमें हिन्दू सम्प्रदाय के दलितों को बराबरी के वे अधिकार मिलने तय थे जो किसी अन्य कथित ऊंची जाति के लोगों को मिलते। दलितों के लिए पृथक ‘मतदान मंडल’ की मांग डा. अम्बेडकर से छुड़वा कर गांधी जी ने यह तय कर दिया था कि मनुस्मृति के चार वर्णों में विभक्त हिन्दू समाज और भारत का भविष्य पोंगापंथी ब्राह्मणवादी विचारधारा के खात्मे से ही बांधा जायेगा। यही वजह थी कि महात्मा गांधी ने आजाद भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय ग्रंथ संविधान को डा. अम्बेडकर से लिखवाया और सिद्ध किया कि दलित के घर में पैदा हुआ बच्चा बड़े से बड़े विद्वान को अपनी बुद्धि के बल पर चुनौती दे सकता है। शिक्षा पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं हो सकता।

अतः मनुस्मृति को आजाद भारत में सिवाय फूंकने के दूसरा कोई काम नहीं हो सकता। बापू ने अन्तर्जातीय विवाह की वकालत इसीलिए की थी जिससे जाति का भ्रम भारतीय समाज से दूर हो सके। मगर अफसोस यह रहा कि आजाद भारत में जिस प्रकार साम्प्रदायिकता को राजनीतिक विचारधारा बनाने की होड़ शुरू हुई। उसी के समानान्तर जातिवाद को भी राजनीतिक विचार के रूप में आगे किया जाने लगा और इसने एेसे नये समीकरण गढ़ डाले जिनसे भारतीय समाज पुनः उसी स्थिति में आ गया जहां यह अंग्रेजों के भारत को कब्जाने के समय था। अंग्रेजों ने 19वीं सदी के अन्त में 1876 के करीब दलितों को विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने की छूट दी तो हिन्दू समाज में इसके विरुद्ध रोष फूट पड़ा और अंग्रेजों ने इसी का लाभ उठाते हुए दलितों को अपनी राजभक्ति के प्रति प्रेरित करना शुरू किया परन्तु यह अभियान दम तोड़ गया क्योंकि तब तक दलितों में यह चेतना जागृत हो चुकी थी कि अंग्रेज उनके देश में विदेशी हैं और वे एक तरफ कथित सवर्णों को उन पर जुल्म करने की छूट दे रहे हैं और दूसरी तरफ उन्हें पुचकार रहे हैं। अतः यह बेसबब नहीं था कि महात्मा गांधी ने आजादी के आन्दोलन से भी दलितों के साथ बराबरी के बर्ताव के आन्दोलन को ऊपर रखते हुए उन्हें हिन्दू समाज का अभिन्न अंग बताया और हरिजन की संज्ञा देकर ईश्वरीय सत्ता का भान कराया परन्तु संविधान में हरिजनों या अनुसूचित जातियों को दिये गये आरक्षण को लेकर कुछ विशेष राजनीतिक क्षेत्रों में यह भावना जागृत रखने की कोशिश की गई कि स्वतन्त्र भारत में यह परोपकार या दया भाव दूसरों के हक मार कर दिया गया, इसी वजह से बार– बार यह आवाज सुनाई पड़ती है कि आरक्षण आर्थिक आधार पर किया जाना चाहिए जो कि पूरी तरह गैर तार्किक और हकीकत के विरुद्ध है।

हरिजनों या अनुसूचित जातियों के लोगों को आर्थिक विपन्नता की वजह से सदियों से दबा कर नहीं रखा गया बल्कि उनके जन्म के आधार की वजह से रखा गया और उनसे पशुवत व्यवहार किया गया। इसके चलते उनकी आर्थिक–सामाजिक व राजनैतिक स्थिति को रौंदकर हाशिये पर डाल दिया गया। उन्हें अस्पृश्य या अछूत बताकर पूरी मानवता औऱ भारतीय संस्कृति को कलंकित किया गया। समाज के निकृष्ठतम कार्यों के लिए उन्हें चिन्हित करके उनकी जाति की पहचान की गई और उन्हें समाज के ही समग्र दायरे से बाहर करने के उपाय किये गये। ये उपाय यदि आज के भारत में भी जारी हैं तो हमें अपने भारतीय होने पर गर्व किसलिए हो सकता है ? किसी दलित दूल्हे को घोड़े पर चढ़कर अपनी बारात ले जाने के लिए यदि समाज के दूसरे लोगों का कोपभाजन बनना पड़ता हो तो हमारी पहचान क्या एक सभ्य मानव के रूप में हो सकती है ? गुजरात में तो सारी हदें पार करते हुए दलित युवकों पर गाैरक्षा के बहाने जो जुल्म ढहाये गये वे अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार उल्लंघन के दायरे में आते हैं और भारत सरकार से जवाब-तलबी मांगते हैं कि उसका मानवीय विकास का पैमाना क्या है? मगर बेशर्मी की हद देखिये कि गुजरात विधानसभा का अध्यक्ष कह रहा है कि अम्बेडकर ब्राह्मण थे। उत्तर प्रदेश का राज्यपाल डा. अम्बेडकर के नाम में ‘राम’ जोड़ कर खुद को दलितों का खैरख्वाह दिखाना चाहता है। डा. अम्बेडकर ने तो बौद्ध धर्म स्वीकार करके घोषणा कर दी थी कि उनकी हिन्दू देवी– देवताओं में कोई आस्था नहीं है।

गुजरात के गांव के दलितों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार करके घोषणा की है कि वे केवल भगवान बुद्ध के मानवतावाद में विश्वास रखते हैं। जो लोग मानव को मानव मानने से पीछे हटते हैं वे भला राम और कृष्ण के रहस्य को क्या समझेंगे? भगवान राम ने तो स्वयं दलितों ( वानर व भालुओं व आदिवासियों) की सेना तैयार करके वेद शास्त्र के महान ज्ञानी रावण की लंका को जलाकर भस्म किया था। राम– रावण युद्ध में कहां थी मनुस्मृति जो जन्म से व्यक्ति की पहचान कर रही थी? मगर राजनीतिखोरों ने इस वैज्ञानिक दौर में जिस तरह जातिवाद को जिन्दा रखने की तजवीजें भिड़ा रखी हैं उसी का नतीजा है कि हम लगातार पाश्विकता की नई नजीरें पेश कर रहे हैं लेकिन यह तय है कि दलितों की स्थिति राष्ट्रीय राजनीति के अहंकार बनने पर ही सुधरेगी क्योंकि तब वे अखिल भारतीय स्तर पर अपनी राष्ट्रीय अहमियत के हकदार बनेंगे। पिछले बीस वर्ष से टुकड़ों में बंटे दलितों पर अत्याचार को एक राजनीतिक औजार बना दिया गया है ।

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