चुनाव आयोग और गुजरात


चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा का चुनावी कार्यक्रम घोषित करने के साथ ही गुजरात राज्य की चुनावी तारीखें घोषित नहीं की हैं मगर यह कहा है कि गुजरात में भी चुनाव दिसम्बर महीने में कराये जायेंगे। इससे अनावश्यक विवाद पैदा हो सकता है। आयोग ने घोषणा की है कि हिमाचल में 9 नवम्बर को मतदान होगा और परिणाम 18 दिसम्बर को घोषित किये जायेंगे। इससे यह अपेक्षा जरूर है कि गुजरात में इस अवधि के बीच ही चुनाव होने चाहिएं। इसकी वजह यह भी है कि आयोग कई राज्यों के चुनाव एक साथ कराने का पक्षधर रहा है जिससे प्रशासनिक आसानी हो सके और चुनाव आचार संहिता के अनुपालन में भी एकरूपता बनी रहे किन्तु गुजरात के चुनावों की तारीख न घोषित करके उसने राजनीतिक बहस को जन्म तो दे ही दिया है।

ऐसी बहस को भारत के लोकतन्त्र के हित में किसी भी तरीके से नहीं कहा जा सकता क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र, निष्पक्ष व संवैधानिक संस्था है। इसका प्रमुख कार्य निष्पक्ष माहौल तैयार करके मतदाता को निडर होकर अपने मत का प्रयोग करने की प्रेरणा देने का है। इस कार्य में स्वतन्त्रता के बाद से चुनाव आयोग पूरी तरह सफल कहा जा सकता है क्योंकि हर बार यह समय की कसौटी पर खरा उतरा है और इसने अपनी निष्पक्षता बनाये रखी है लेकिन कुछ लोगों को हैरानी जरूर हो सकती है कि गुजरात विधानसभा का चुनावी कार्यक्रम हिमाचल के साथ घोषित न करने की असली वजह क्या हो सकती है।

गुजरात विधानसभा का कार्यकाल 22 जनवरी को समाप्त हो रहा है और इससे पहले यहां नई विधानसभा गठित हो जानी चाहिए। इसके साथ ही दो विधानसभा सत्रों के बीच छह माह से अधिक का अन्तराल भी नहीं रहना चाहिए। जाहिर है ये सभी तकनीकी पहलू चुनाव आयोग के ध्यान में होंगे जिन्हें देखते हुए आज मुख्य चुनाव आयुक्त ए.के. जोती ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि गुजरात में भी चुनाव दिसम्बर महीने में होंगे और सभी परिणाम 18 दिसम्बर को ही घोषित किये जायेंगे। मोटे आकलन व राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि गुजरात के चुनावों का महत्व इसलिए सबसे अधिक है क्योंकि यह प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी का गृह राज्य है। यहां पिछले लगभग 20 वर्ष से भाजपा सत्ता पर काबिज है परन्तु हाल ही में पिछले दिनों राज्य से हुए राज्यसभा चुनावों में जो घटनाक्रम घटा उससे राजनीतिक जोड़-तोड़ का ऐसा सिलसिला बना था जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा पर शक की अंगुली उठनी शुरू हुई थी परन्तु चुनाव आयोग ने जिस प्रकार इस सारे मामले को निपटाया उससे आयोग की प्रतिष्ठा में चार चांद लगने में कोई कसर नहीं रही।

अतः विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम को लेकर भी जो रहस्य गहराया है उसका अन्त भी सुखद ही होना चाहिए, क्योंकि तारीखें आज घोषित न करने का तकनीकी कारण यह भी हो सकता है कि आयोग मतदान कराने के लिए व्यावहारिक जरूरतों का आकलन कर रहा हो और हिसाब-किताब लगा रहा हो कि राजनीतिक गर्माहट को देखते हुए मतदान कितने चरणों में कराना उचित होगा। यह तो जाहिर ही है कि चुनावों के चलते इस राज्य की राजनीति का पारा बहुत चढ़ा हुआ है विशेष रूप से कांग्रेस व भाजपा दोनों ने ही अपनी पूरी ताकत यहां झोंक रखी है। इन पार्टियों की तरफ से क्रमशः राहुल गांधी व प्रधानमन्त्री चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। अतः चुनाव आयोग पर निरपेक्ष भाव से अपने दायित्व को अंजाम देने का भाव मनो​वैज्ञानिक रूप से रहेगा। उसे आज नहीं तो कल यह खुलासा करना ही पड़ेगा कि किन कारणों से उसने हिमाचल के साथ गुजरात के चुनावों की तारीख घोषित नहीं की थी। क्योंकि जो चुनाव आयोग पूरे देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ तक कराने की हिम्मत रखता है उसे केवल दो राज्यों के चुनाव एक साथ कराने के काम को तो बायें हाथ का खेल समझना चाहिए। इसके साथ ही आयोग अपने संवैधानिक दायित्व से बन्धा हुआ है जो संविधान उसे देता है।

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