चुनाव आयोग का फैसला


मध्य प्रदेश के मन्त्री नरोत्तम मिश्र का विधानसभा चुनाव अवैध घोषित करके चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनावों में प्रत्याशियों को खर्च के मामले में पूरी पारदर्शिता, शुद्ध मन और अत:करण से बरतनी होगी। राज्य के दतिया क्षेत्र से विधायक श्री मिश्रा पर यह आऱोप सिद्ध हो गया है कि उन्होंने आयोग को 2008 में लड़े गये विधायक के चुनाव में ‘पेड न्यूज’ पर किये गये खर्च को दबाया या गलत आंकड़ा पेश किया। वास्तव में यह बहुत गंभीर मामला है जिसका सम्बन्ध देश में स्वतन्त्र व निष्पक्ष पत्रकारिता से भी जुड़ा हुआ है। पेड न्यूज की अवधारणा बहुत पुरानी नहीं है। यह पिछले दो दशकों में पनपी हुई विकृति है जिसने पत्रकारिता जगत को अपनी चपेट में लिया है। चुनावों के दौरान एकपक्षीय खबरें प्रकाशित कराने की यह परम्परा राजनीतिज्ञों को इतनी रास आई कि उन्होंने पत्रकारिता को ही दागदार बना डाला। विज्ञापन के स्थान पर ऐसी खबरें प्राय: पाठकों को भ्रम में डाल देती हैं, दूसरे चुनावी प्रत्याशी को अपने खर्च में चोरी करने को भी उकसाती हैं मगर चुनाव आयोग ने जिस तरह श्री मिश्रा के मामले पर कड़ा रुख अख्तियार किया है उससे आने वाले चुनावों में ऐसी प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी लेकिन भारत के चुनाव आयोग के पास असीमित अधिकार राजनैतिक दलों के मामले में हैं क्योकि केवल यही संस्थान राजनैतिक शुचिता के लिए सीधे जिम्मेदार संविधान के अन्तर्गत बनाया गया है।

सभी राजनैतिक दलों की जन्मपत्री की जांच पड़ताल का अधिकार आयोग के पास पूर्णत: सुरक्षित रहता है और सुनिश्चित पैमाने से इधर-उधर भटकने पर इसके पास किसी भी चुनाव को अवैध घोषित करने का हक भी है। ऐसा ही मामला दिल्ली विधानसभा के 20 विधायकों का है जिन्हें चुनाव जीतने पर मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने थोक के भाव में संसदीय सचिव सारी सरकारी सुख-सुविधाओं से नवाजते हुए बना दिया था, जबकि एक साधारण सदस्य किसी दूसरे लाभ के पद पर नहीं रह सकता है। दिल्ली राज्य कानून के तहत इस प्रकार थोक में संसदीय सचिवों की नियुक्ति नहीं की जा सकती। यह मामला जब चुनाव आयोग के पास गया तभी से इन सभी 20 विधायकों के सिर पर अपनी सदस्यता जाने की तलवार लटक रही है। यह भी बेवजह नहीं है कि इस मामले के आयोग की अदालत में पेश होने की वजह से केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग पर ऊल-जुलूल आरोपों की बरसात करनी शुरू कर दी जिससे उसके इस बारे में दिये जाने वाले फैसले को ही संशय के घेरे में डाला जा सके। मतदान की ईवीएम मशीनों पर छिड़े विवाद का ताल्लुक भी कहीं न कहीं इसी मामले पर जाकर अटकता है। इसकी संजीदगी देखते हुए अरविन्द केजरीवाल ने संसदीय सचिव सम्बन्धी कानून में संशोधन करने का प्रयास पिछले वर्ष किया था और उसे पिछले समय से लागू करने की चेष्टा की थी। मगर केजरीवाल का यह करतब बीच रास्ते में ही पकड़ लिया गया था।

केजरीवाल एंड पार्टी ऐसा करके अपने किये गये अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही थी और ऐसा कानून बनाना चाहती थी जिससे पिछले समय में किये गये अपराध को मामूली गलती के तौर पर देखा जा सके। जबकि संविधानत: विधानसभा ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती थी जो अपराध को क्षमा के दर्जे में डालकर आगे बढ़े क्योंकि चाहे जिस श्रेणी का भी अपराध हो वह अपराध ही होता है और उसे नया कानून बना कर माफ नहीं किया जा सकता। ऐसे सन्दर्भों में कानून यदि नया बनना भी होता है तो वह इसके पारित होने के बाद की तारीख से ही लागू हो सकता है। अत: बहुत स्पष्ट है कि अपने विधायकों को लाभ के पदों पर बिठाकर केजरीवाल ने कानून तोड़ा और अब इसकी सुनवाई चुनाव आयोग कर रहा है जिसकी सजा के तौर पर इन सभी विधायकों की विधायकी नरोत्तम मिश्रा की तर्ज पर ही खत्म हो सकती है। हालांकि दोनों के मामले अलग-अलग हैं मगर जनप्रतिनिधित्व कानून व तत्सम्बन्धी विभिन्न विधानों के दायरे में आते हैं जिन पर अन्तिम कार्रवाई करने का अधिकार आयोग को है।

बेशक आयोग के फैसले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है मगर इससे लाभ के पद की उस परिभाषा पर कोई अन्तर नहीं पड़ता जो कानूनी तौर पर मुकर्रर है। दुनिया जानती है कि आज से 42 वर्ष पूर्व आज के ही दिन 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी केवल इसलिए लागू कर दी गई थी कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी को लोकसभा चुनाव रायबरेली क्षेत्र से अवैध घोषित कर दिया था अत: आज का दिन कई मायनों में ऐतिहासिक है और भारत के लोकतन्त्र को मजबूत बनाने की ताईद करता है। इस सिलसिले में चुनाव आयोग का मजबूत रहना भी एक शर्त है। मगर आम आदमी पार्टी अपने जन्मकाल से ही लोकतन्त्र के सभी स्तम्भों पर बच्चों की तरह हमला बोलने की आदी रही है। अत: चुनाव आयोग के खिलाफ इसकी अनाप-शनाप बयानबाजी ‘चोर की दाड़ी में तिनके’ के अलावा और कुछ नहीं कही जा सकती। मध्य प्रदेश के सत्तारूढ़ दल के सबसे शक्तिशाली मन्त्री समझे जाने वाले व्यक्ति का चुनाव अवैध घोषित करके इसने अपनी निष्पक्षता बेदाग साबित कर दी है।

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