चुनाव प्रचार का गिरता स्तर


गुजरात में विधानसभा चुनाव का प्रथम चरण पूरा हो गया है जिसमें 68 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया। जाहिर तौर पर 18 दिसम्बर को जब मतगणना होगी तो पता चलेगा कि मतदाताओं ने किसे सत्ता की कुर्सी पर बैठाने का जनादेश दिया है मगर इस राज्य में चुनाव प्रचार जिस तरह निम्न स्तर को छूने का रिकार्ड बना रहा है उससे देश के अन्य राज्यों के मतदाताओं को आश्चर्य हो रहा है और वे सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि गुजरात में चुनाव नई सरकार बनाने के लिए हो रहे हैं या शीर्षस्थ राजनीतिज्ञों को चरित्र प्रमाण पत्र देने के लिए? चुनाव प्रचार का जो अन्दाज उभर रहा है उसमें राजनीति के ‘वैचारिक पक्ष’ को पूरी तरह तिलांजलि यह मानकर दी जा रही है कि बाजारू बोलियां लगाकर मतदाताओं के एक वोट के अधिकार को इनकी प्रतिध्वनी में बांधा जा सकता है। यह उस मतदाता की तौहीन करने से कम नहीं है जो इस देश के लोकतन्त्र को अपने कन्धे पर कठिन से कठिन समय में भी उठाये रहा है। उसकी इसी सूझ-बूझ से भारत के लोकतन्त्र को पूरी दुनिया के लोग विस्मय की दृष्टि से देखते हैं और सोचते हैं कि ‘गांधी बाबा’ एेसी कौन-सी घुट्टी भारत के मुफलिस और अनपढ़ कहे जाने वाले लोगों को पिला कर गये हैं कि ये एेसे मोड़ पर खुद राजनीतिज्ञों को दिशा ज्ञान देने लगते हैं जब राजनीतिज्ञ दिशाविहीन होने लगता है। यह कार्य भारत के किसी भी राज्य के मतदाता इतनी शाइस्तगी से करते हैं कि हर राजनीतिक दल उनके चेहरों में अपना अक्स देखने की गलतफहमी में पड़ जाता है।

इसका नजारा हमने सबसे पहले दिल्ली विधानसभा के हुए चुनावों में देखा था, उसके बाद बिहार के लोगों ने भी एेसा ही चमत्कार किया और इसी साल उत्तर प्रदेश व पंजाब की जनता ने भी यही करामात दिखाई मगर इन सभी राज्यों की जनता ने एक साझा सन्देश राजनीतिज्ञों को दिया कि लोकतन्त्र में उन्हें किसी भी राजनीतिक दल की निरंकुशता स्वीकार्य नहीं है। पहले दिल्ली में उन्होंने भाजपा के भारत विजय के खुमार को उतारा, उसके बाद बिहार में कथित राष्ट्रवाद के ज्वार-भाटे को शान्त किया और फिर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी के जातिवाद के साये में चल रहे अराजकतावाद और गुंडाराज को ढेर किया। इसके साथ ही पंजाब में इन्होंने अकाली-भाजपा गठजोड़ के लूटतन्त्र को चारों खाने चित्त करते हुए हुंकार लगाई कि पंजाब की राजनीतिक विरासत कुर्बानियां करके अपनी दौलत आम जनता पर न्यौछावर करने की रही है न कि जनता का धन लूट कर अपना घर भरने और अपने परिवार को सोने के ताज पहनाने की। इस राज्य के लोगों की परंपरा ‘दीनदयाल भरोसे तेरे-सब परिवार चढ़ाया बेड़े’ को जिस तरह सत्ता में काबिज दलों की सरकारों ने पिछले दस सालों में मिट्टी में मिलाया था, उन्हें ही जमीन में लिटा कर मिट्टी की सूंघ दिलाने में यहां के मतदाताओं ने किसी प्रकार की कमी नहीं रखी।

अतः गुजरात के मतदाताओं के मिजाज को लेकर जो दावे और पलट दावे किये जा रहे हैं वे यहां की मिट्टी की सूंघ से ही साफ होंगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि चुनावों में कौन-कौन से नये शगूफे छोड़े जा रहे हैं और कभी राहुल गांधी व कभी नरेन्द्र मोदी के व्यक्तिगत जीवन को निशाना बनाया जा रहा है बल्कि फर्क इस बात से पड़ेगा कि मतदाता इन सवालों को किस चश्में से देख रहे हैं और चुनावी मैदानों की उड़ती धूल में किस खुशबू को महसूस कर रहे हैं मगर गुजरात के संजीदा मतदाता इतना जरूर महसूस कर रहे हैं कि इस बार वे जिस पार्टी को भी जितायेंगे उसकी प्रतिध्वनी से पूरा भारत गूंजेगा और इस कदर गूंजेगा कि उसका असर 2019 के लोकसभा चुनावों तक बना रहेगा। बेशक 2019 से पहले कई और राज्यों में भी चुनाव होने हैं जिनमें सबसे प्रमुख कर्नाटक है मगर वहां केन्द्र की सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगी होगी, परन्तु मूल प्रश्न यही रहता है कि किस प्रकार चुनाव प्रचार से राजनीति के वैचारिक पक्ष को अलग रखा जा सकता है, जबकि चुनाव लोकतन्त्र में आम जनता को राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने की सबसे बड़ी पाठशाला होते हैं, जो भी दल अपनी इस जिम्मेदारी से भागने की कोशिश करता है उसे भारत के मतदाता राजनीति से ही भगाने में भी पीछे नहीं रहे हैं। इसका प्रमाण चुनावी इतिहास ही है। बिना शक समय-समय पर राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहती हैं, परन्तु राजनीतिक दलों का धर्म इन्हीं बदली परिस्थितियों के भीतर राजनीतिक विचारों की प्रेरणा से आम जनता को रोशनी देने का होता है, परन्तु गुजरात में जो माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है उसका आलम यह है कि लोग पूछ रहे हैं कि उनके ‘खेतों’ की हालत कैसी है तो उन्हें जवाब दिया जा रहा है कि ‘खलिहान’ में चूहे घुसकर अनाज खा गए।

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