सड़कों पर किसानों का गुस्सा


अब से लगभग 80 वर्ष पूर्व महात्मा गांधी ने अपने अखबार ‘हरिजन’ में भारत के किसानों की दुर्दशा के बारे में लिखते हुए साफ कर दिया था कि लोकतन्त्र में जो सरकार धरती का सीना चीर कर आम लोगों की भूख मिटाने वाले अन्नदाता को न्याय नहीं दे सकती वह किसी भी कीमत पर सरकार नहीं होती बल्कि कुछ अराजक तत्वों का समूह होती है। गांधी के इसी वचन को भारत के आजाद होने पर महान समाजवादी चिन्तक डा. राममनोहर लोहिया ने दोहराते हुए कहा कि जिस देश में किसान भूखा रहेगा उस देश की सुरक्षा बड़ी से बड़ी फौज भी करने में असमर्थ रहेगी। डा. लोहिया ऐसे नेता थे जो समाजवाद के सिद्धान्त को भारतीय परिस्थितियों में लागू करके आंकते थे। अत: यह बेसबब नहीं था कि 1965 में जब भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध कश्मीर मुद्दे पर ही निर्णायक युद्ध लड़ा तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा देकर पूरे भारत को खड़ा कर दिया मगर मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान का क्या किया जाये जो किसानों की जायज मांगों का जवाब पुलिस की गोलियों से दे रहे हैं। यह सत्ता के अभिमान में चूर शासन के मगरूर होने का पुख्ता प्रमाण है। सवाल यह नहीं है कि किसानों का आन्दोलन अहिंसा के मार्ग से भटक गया बल्कि असली सवाल यह है कि उसे हिंसा का रास्ता अख्तियार करने के लिए किसने मजबूर किया? किसान न तो कांग्रेसी होता है और न जनसंघी, वह केवल अपनी मेहनत के बूते पर पसीना बहाकर अपना पेट पालने वाला सच्चा इंसान होता है। सदियों से उसके पसीने के बूते पर ही राजा- महाराजाओं की अट्टालिकाएं स्वर्ण पत्रों से मढ़ती रही हैं और उसके बच्चे मिट्टी में ही खेलकर पलते-बढ़ते रहे हैं।

भारत को जब अंग्रेजों ने अपना गुलाम बनाने की पहली प्रक्रिया बंगाल के नवाब सिरोजुद्दौला को हराकर शुरू की तो लार्ड क्लाइव ने किसानों से उगाहे जाने वाले लगान राजस्व में एक रुपये में केवल एक आना हिस्सा मांग कर इसे अंजाम दिया परन्तु भारत के आजाद होने पर किसानों को जमींदारी प्रथा से मुक्ति मिली और कई राज्यों में ब्रिटिश शासन के दौरान ही 1936 में पहले प्रान्तीय एसेम्बलियों के चुनाव होने के बाद से भूमि सुधार के कार्य शुरू किये गये, परन्तु स्वतन्त्र लोकतान्त्रिक भारत में किसानों को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए सरकारी नीतियों के तहत कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देने का प्रचलन शुरू किया गया और उसकी फसल का न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने की प्रक्रिया शुरू की गई। धीरे-धीरे हम अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर देश बन गये। यह सब किसानों की मेहनत और सरकार की प्रेरक नीतियों की वजह से संभव हुआ किन्तु आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने पर कृषि क्षेत्र को लावारिस बनाकर छोड़ दिया गया और इसमें सार्वजनिक निवेश नाममात्र का होता चला गया। बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में किसान को हाशिये पर डाल कर हमने विकास की सीढिय़ां चढऩे का सपना संजोया जिसने लगातार खेती-किसानी को नुकसान दायक बनाने का काम किया। उदार वित्तीय व्यवस्था में कृषि ऋणों की बरसात करके हमने सोच लिया कि इससे किसान की आर्थिक स्थिति सुधर जायेगी मगर वह कर्ज के बोझ में इस कदर दबने लगा कि आत्महत्या करने के लिए मजबूर होने लगा। उसकी फसल के भाव तय करने का पैमाना पुराना ही रहा जबकि उसके उत्पादन के बाजार पर कब्जा उन आढ़तियों का ही रहा जो मांग और सप्लाई का अनुपात देखकर कीमतें तय करते थे। यही वजह है कि आज मध्य प्रदेश में प्याज का भाव आठ रुपए प्रति किलो तय हो जाने के बावजूद किसानों को पड़ता नहीं खा रहा है क्योंकि उनकी पूरी फसल की खरीद की जिम्मेदारी उठाने को राज्य सरकार तैयार नहीं है।

महाराष्ट्र में भी ऐसी ही स्थिति है। इसके साथ ही सूखे और बाढ़ से फसल के मर जाने पर किसानों की बदहाल स्थिति को ठीक करने के लिए राज्य सरकारें तैयार नहीं हैं। किसान ऋण माफी की गुहार लगा रहे हैं तो उन पर लाठी-डंडों और गोलियों की बौछार हो रही है। यह सरासर जुल्म की इन्तेहा है क्योंकि राज्य सरकार का पहला काम किसानों के जायज नुकसान की भरपाई करना है। इसकी वजह यह है कि उसकी फसल के चौपट होने में उसका कोई हाथ नहीं होता जबकि किसी भी राज्य के सर्वांगीण विकास में किसान की भूमि की ही मुख्य भूमिका होती है मगर मध्य प्रदेश में गजब का विकास हो रहा है जो केवल कार्पोरेट कम्पनियों को ही पसन्द आ रहा है। गांव से लेकर कस्बों और शहरों में आम आदमी प्रशासन की अक्षमता से बुरी तरह त्रस्त है और रह-रह कर व्यापमं घोटाले के भूत से ग्रस्त है। नहीं भूला जाना चाहिए कि इस घोटाले में शिवराज सिंह का मन्त्रिमंडल तक शामिल था। ऐसी सरकार अगर पहले यह कहती है कि किसानों पर गोलियां पुलिस ने नहीं चलाई और बाद में मान जाती है तो इसका इकबाल हवा में काफूर हो चुका है। दरअसल 2005 से राज्य के मुख्यमन्त्री की गद्दी की शोभा बने शिवराज सिंह भूल चुके हैं कि जनता नाम की भी कोई चीज होती है। राज्य की सड़कों पर जो गुस्सा आम जनता का उतर रहा है वह ऐसे निरंकुश और बेपरवाह शासन के खिलाफ है जो आम आदमी के दर्द पर भी राजनीति करना चाहता है। मध्य प्रदेश जैसे शान्त और भाजपा के गढ़ माने जाने वाले राज्य की जनता जब सड़कों पर उतर रही है तो इसका सबब जानने में केन्द्र सरकार को किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। वह भी तब जबकि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों के लाभ के लिए ही एक नहीं बल्कि दर्जन भर योजनाएं चला रखी हैं।

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