भयंकर टकराव की शुरूआत


ईरान की संसद पर हमला और आयतुल्ला खुमैनी की मजार पर आत्मघाती विस्फोटों की जिम्मेदारी दुनिया के सबसे दुर्दांत और क्रूर माने गए संगठन इस्लामिक स्टेट यानी आईएस ने ले ली है। वैसे तो मुस्लिम देशों का इतिहास काफी रक्त रंजित रहा है, खाड़ी युद्ध दुनिया ने देखा, ईरान-इराक युद्ध देखा, फिर इराक में सद्दाम हुसैन का शासन उखड़ते देखा लेकिन इस समय दुनिया में जिस तरह से शिया और सुन्नी विवाद बढ़ रहे हैं और जिस तरह से विचारधाराओं का द्वंद्व बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि भयंकर टकराव की शुरूआत हो चुकी है। आईएस और अलकायदा ईरान के खिलाफ हैं। ईरान का दबदबा इराक, यमन, सीरिया और लेबनान में हाल ही के वर्षों में काफी बढ़ चुका है, जिसे अन्य अरब देश सहन नहीं कर पा रहे। ईरान समर्थित हिजबुल्लाह खुले तौर पर सीरिया में लड़ रहा है और वहां उसने आईएस और अलकायदा से काफी क्षेत्र को मुक्त करा लिया है। सऊदी अरब और अन्य देशों को डर है कि इस क्षेत्र में ईरान समर्थित गुटों का प्रभाव बढ़ रहा है जो उनके लिए नुक्सानदेह साबित होगा।

मध्यपूर्व में सुन्नियों में दो तरह की विचारधाराएं हैं वहावी सलाफी और मुस्लिम ब्रदरहुड। सऊदी अरब ईरान की शिया सरकार को मान्यता नहीं देता। वह मानता है कि यह क्षेत्र सुन्नियों के प्रभाव वाला है। हमले के बाद ईरान ने कहा है कि तेहरान में हमला करने वाले ईरानी ही हैं जो आईएस में शामिल हो गए थे। यह तो जगजाहिर है कि आईएस अपनी कट्टरपंथी विचारधारा का विष फैला रहा है और दुनियाभर के युवा उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। अगर भारत के केरल राज्य से कुछ शिक्षित युवा आईएस में शामिल होने जा सकते हैं तो ईरान के लोगों का आईएस से जुडऩा कोई आश्चर्य नहीं है। ईरान के रेवाल्यूशनरी गाड्र्स ने हमले का मुंहतोड़ जवाब देने का प्रण लेते हुए अमेरिका और सऊदी अरब पर अंगुली उठाई है। इन आतंकी हमलों से पहले सऊदी अरब के विदेश मंत्री अब्देल जुबेर ने खुलेआम धमकी दी थी कि ईरान को खाड़ी क्षेत्र में दखल देने और आतंकी संगठनों का समर्थन करने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। शिया-सुन्नी टकराव के चलते सऊदी और ईरान में छत्तीस का आंकड़ा है। हाल ही में दोनों देशों ने एक-दूसरे से राजनयिक संबंध तक खत्म कर दिए थे। सऊदी समेत 7 देशों ने कतर से कूटनयिक रिश्ते दो दिन पहले ही तोड़े हैं। इसमें ईरान कतर के साथ खड़ा नजर आया। सीरिया और इराक में तेल के बड़े भंडार हैं। सऊदी को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि यमन की सीमा तक ईरान का प्रभाव बढ़ जाए।

इस समय खाड़ी क्षेत्र दो गुटों में पूरी तरह बंट गया है। सऊदी अरब आर्थिक तौर पर मजबूत है और उसके सैन्य गठबंधन में 50 मुस्लिम देश हैं। दूसरी तरफ ईरान मध्यपूर्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वह प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और खुद हथियार विकसित कर आत्मनिर्भर बना है। पैसा ईरान के पास भी कम नहीं और क्षेत्र में सबसे बड़ी सेना उसी की है। परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने के बाद से ही ईरान के यूरोपीय देशों से संबंध काफी बेहतर हो गए हैं। ईरान की दूसरी समस्या भी है, वह भी भारत की तरह पाकिस्तान से आने वाले आतंकवाद से पीडि़त है। आने वाले समय में आतंकवाद के मुद्दे पर ईरान, भारत और अफगानिस्तान का सहयोग बढ़ सकता है। ईरान ने पाकिस्तान को लगातार चेतावनी दी है कि अगर पाक ने आतंकी हमलावरों को नहीं रोका तो भारत की तरह सर्जिकल स्ट्राइक करके अपना बदला खुद लेगा।

दरअसल 2011 में शुरू हुई अरब क्रांति के बाद मध्य एशिया में संकट की स्थिति है। सीरिया अब तक सत्ता परिवर्तन के संघर्ष की आग में झुलस रहा है। सीरिया के संघर्ष को आईएस ने नया रूप दे दिया। इराक में भी आईएस ने काफी तबाही मचाई। विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के आह्वान पर रूस और ईरान ने उसका खुलकर साथ दिया। ईरान असद सरकार को बनाए रखने के लिए अरबों डालर खर्च कर रहा है। इराक से उखडऩे के बाद आईएस दूसरे देशों में अपना नैटवर्क स्थापित करना चाहता है। सऊदी और कतर टकराव और सऊदी-ईरान टकराव के चलते आईएस को विस्तार मिल सकता हैक्योंकि ऐसी स्थितियों का आतंकी संगठन फायदा उठा लेते हैं। संभावना यह भी है कि अगर कतर ईरान या चीन से रणनीतिक साझेदारी कर ले तो सऊदी और अमेरिका मिलकर भी कुछ नहीं कर सकते। जिस तरह के हालात बने हैं, अगर इन्हें सामान्य बनाने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए गए तो फिर टकराव निश्चित है। यह टकराव दुनिया को पता नहीं किस मुहाने तक ले जाएगा, यह भविष्य के गर्भ में है।

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