रणक्षेत्र में भी होंगी लड़ाकू महिलाएं


भारतीय सेना में महिलाओं की संख्या को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। वैसे सेना में महिलाएं 1991 से ही शामिल हैं लेकिन महिलाओं को लेकर सेना में हमेशा से ही हिचक रही है। सेना में महिलाओं को कौन-कौन से पद दिए जाएं और उनकी भूमिका पर भी निरंतर विचार-विमर्श होता रहा है। भारतीय सेना में कुल करीब 13 लाख जवान हैं, जिनमें 37 हजार पुरुष अधिकारी हैं, जबकि महिला अधिकारियों की कुल संख्या मात्र 1300 है। यानी सेना में प्रति 28 पुरुष अधिकारियों की तुलना में एक महिला अधिकारी है। इसी तरह वायुसेना में महिलाओं की संख्या लगभग 1400 है जिसका अनुपात है 1:8, पुरुषों की संख्या है 11 हजार यानी 8 अधिकारियों की तुलना में एक महिला अधिकारी। अगर नौसेना की बात करें तो महिलाओं की संख्या बहुत कम है लेकिन अब दृश्य बदल रहा है। सीमा सुरक्षा बल में तो पहले ही महिलाओं को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर भारतीय चौकियों की सुरक्षा में तैनात किया जा रहा है और वे सीमा पर पैट्रोलिंग भी कर रही हैं। भारतीय सेना में महिलाएं अब तक सहायक की भूमिका में हैं परन्तु काम्बैट भूमिका में नहीं हैं परन्तु सेना ने अब महिलाओं को लड़ाकू की भूमिका देने की तैयारी कर ली है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि महिलाओं को अब मिलिट्री पुलिस में तैनात किया जाएगा। यानी अब महिलाएं युद्ध के मैदान में भी अपना जौहर दिखा सकेंगी। अभी तक भारतीय सेना में महिलाओं की तैनाती चिकित्सा, शिक्षा, कानून, सिग्नल और इंजीनियरिंग जैसी इकाइयों में होती है।

महिलाओं को लड़ाई से दूर रखा जाता रहा है, लेकिन सेना के इस नए कदम से महिलाएं भी पुरुषों के साथ मोर्चे पर लड़ सकेंगी। मिलिट्री पुलिस छावनी और सेना के प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के साथ-साथ युद्ध के समय सैनिकों के आवागमन में मदद करती है। भारतीय वायुसेना में महिला फाइटर पायलटों की नियुक्ति का सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका है। पिछले वर्ष तीन महिलाओं को पायलट के रूप में तैनात किया गया था। इनकी नियुक्ति पायलट के रूप में की गई थी। अब भारतीय नौसेना में भी जंगी जहाजों पर महिलाओं को तैनात करने पर विचार किया जा रहा है। महिलाओं को जंग के मैदान में भेजना सही है या गलत? इस सवाल पर बहस होती रही है, तर्क दिया जाता है कि महिलाएं शारीरिक रूप से पुरुषों की तरह मजबूत नहीं होतीं जबकि जंग के समय कई-कई दिनों मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है।  पाठकों को याद होगा कि जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2015 में गणतंत्र दिवस पर राजकीय मेहमान के तौर पर भारत आए थे तो राष्ट्रपति भवन में उनके स्वागत समारोह में भारतीय वायुसेना की विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने गार्ड ऑफ आनर की अगुवाई कर इतिहास रच डाला था। इस्राइल में हर महिला के लिए जरूरी है कि वह अपनी जिन्दगी के कुछ वर्ष सेना को दे। वहां सेना के 88 से लेकर 92 पद महिला उम्मीदवारों के लिए खुले हैं। कनाडा और न्यूजीलैंड में सेना में महिलाओं की भूमिका को लेकर कोई रोक-टोक नहीं। कनाडा में महिलाओं के पनडुब्बी से जुड़े अभियानों में हिस्सा लेने पर रोक है। श्रीलंका सेना में भी महिलाओं की भूमिका अहम है लेकिन जंग के माहौल में दुश्मनों के सामने मोर्चा सम्भालने को लेकर कुछ सीमाएं भी हैं। ऐसे ही तुर्की, फ्रांस, अमेरिका, ब्राजील, जर्मनी, नार्वे सहित कई और देशों में यह व्यवस्था है कि महिलाएं दुश्मन के साथ मुठभेड़ के लिए मैदान में उतर सकती हैं।

2015 में सरकार ने 11 हजार महिलाओं की नियुक्ति केन्द्रीय सुरक्षा बल में करने की अनुमति भी दी थी। आज महिलाओं की शारीरिक क्षमता पर सवाल उठाना औचित्यहीन लगता है। 1997 की हालीवुड फिल्म जीआई जेन की फिल्म यूएस नेवी वारफेयर ग्रुप में चुनी गई महिला की कहानी पर आधारित थी। उस महिला का किरदार डेमी मूर ने निभाया था। पूरी फिल्म एक महिला की ट्रेनिंग और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाती है। फिर एक दृश्य ऐसा भी था जहां डेमी मूर अपने लम्बे बालों को खुद काट देती है और ट्रेनिंग पूरी करती है। भारत में तो वीरांगनाओं का इतिहास रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते अपनी जान दे दी थी। कैप्टन लक्ष्मी सहगल तो भारत की स्वतंत्रता सेनानी रहीं और आजाद हिन्द फौज की अधिकारी थीं। कनक लता बरुआ ने तो 17 साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने की कोशिश में अपना बलिदान दिया था। दुर्गा भाभी को कौन नहीं जानता जिन्होंने भगत सिंह को लाहौर जेल से छुड़ाने का प्रयास किया था। बेगम हजरत महल ने अंग्रेज फौज के छक्के छुड़ा दिए थे। भारत का इतिहास क्रांतिकारी वीरांगनाओं के शौर्य की गाथाओं से भरा पड़ा है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हैं तो उन्हें सेना में अपना करियर चुनने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए। उनको लड़ाकू की भूमिका देना गलत नहीं होगा।

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