‘अयूब पंडित’ से ‘जुनैद’ तक


वाजिब सवाल उठना लाजिमी है कि कश्मीर के श्रीनगर में मीरवाइज मौलवी उमर फारूक की निजी सुरक्षा में लगे उप-पुलिस कप्तान अयूब पंडित की पत्थरबाजों द्वारा की गई हत्या और हरियाणा के फरीदाबाद के युवक जुनैद की कुछ लोगों द्वारा चलती रेलगाड़ी में की गई हत्या में क्या अन्तर है। कश्मीर में जहां मुस्लिम अलगाववादियों ने जुम्मे के दिन ही श्रीनगर की जामिया मस्जिद के बाहर श्री अयूब पंडित की हत्या केवल इसलिए कर दी कि वह अपने उस राष्ट्र धर्म को निभा रहे थे जिसके तहत घाटी में अमन-चैन बरकरार रखना उनका पहला कत्र्तव्य था वहीं हरियाणा में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या इसलिए कर दी गई कि वह अपने दो भाइयों के साथ जायज तौर पर ट्रेन में सफर कर रहा था। उसने सिर पर पहनी हुई मुस्लिम टोपी ने उसका किरदार इस तरह बदल डाला कि कुछ गुंडों ने उस पर गौमांस रखने का आरोप लगाकर उसे चाकुओं से गोद ‘चाक’ कर डाला। जिस तरह पुलिस अफसर की हत्या करके कुछ सिरफिरे कश्मीरी लोगों ने सारे कश्मीरियों को देश विरोधी बनाने का काम किया है उसी तरह हरियाणा में कुछ बद-दिमाग हिन्दुओं के गुंडा तबकों ने पूरे हिन्दू समुदाय को मुस्लिम विरोधी बनाने का दुष्कर्म किया है।

जुनैद का अपराध क्या यह था कि वह ईद मुबारक के जश्न से पहले दिल्ली से खरीदारी करके खुशी-खुशी अपने परिवार और भाइयों के साथ ट्रेन में लूडो का खेल खेलते हुए जा रहा था और उसके हुलिये को देखकर खुद को हिन्दुओं के ठेकेदार समझने वाले कुछ गुंडा तबकों ने उससे सीट मांगने के नाम पर उसके धर्म और उसके ईमान को ही निशाने पर लेकर उसकी हत्या कर डाली। दूसरी तरफ कश्मीर में मीरवाइज की हिफाजत के लिए जिम्मेदार पुलिस अफसर अयूब पंडित को पत्थरबाजों ने सिर्फ इसलिए मार डाला कि वह जम्मू-कश्मीर पुलिस के अफसर थे। पत्थरबाज भूल गये कि वह रमजान के मुबारक महीने में मस्जिद के बाहर ऐसे मुसलमान अफसर की हत्या कर रहे हैं जो अपनी ड्यूटी के ईमान का पाबन्द है और ऐसे लीडर की हिफाजत का जिम्मा उसके कन्धों पर है जो भारत के खिलाफ ही जहर उगलता रहता है। श्री पंडित को पुलिस में रहते हुए भी इस बात से मतलब नहीं था कि मौलवी फारूक कश्मीरियों को भारत के खिलाफ भड़काने के लिए क्या-क्या बयानबाजी करते रहते हैं। उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब था कि मौलवी फारूक की जान हर हालत में महफूज रहनी चाहिए। यही उनका ईमान था। यही उनकी ड्यूटी थी। उनका गुनाह क्या पुलिस की नौकरी करना हो गया जबकि वह रोजेदार मुसलमान थे।

दूसरी तरफ 19 वर्षीय जुनैद का गुनाह क्या यह हो गया कि वह अपने समुदाय के त्यौहार ईद को मनाने की खुशी में था। उसे उसकी मजहबी पहचान की बिना पर कत्ल किया जाना इन्सानियत का खून करने से कमतर करके नहीं देखा जा सकता। कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर दहशतगर्दों के लबादे में कुछ कश्मीरी रोजाना इन्सानियत का कत्ल कर रहे हैं। इससे पहले भी रमजान के महीने में ही 6 पुलिस वालों को मौत के घाट बहुत बेदर्दी के साथ उतारा गया था मगर अयूब पंडित की हत्या ने तो हैवानियत को भी शर्मसार करते हुए ऐलान किया कि पूरी वादी में अब ‘दोजख’ का कानून लागू होगा मगर हरियाणा में भी इससे कमतर मंजर पेश नहीं किया गया और सबूत छोड़ा गया कि हिन्द के बाशिन्दों के साथ किस तरह का सलूक किया जाये, इसका फैसला उनके सिर पर लगी हुई टोपी करेगी। यह किसी और को चुनौती नहीं बल्कि इस मुल्क के वजीरे आजम नरेन्द्र मोदी को चुनौती है जिनका ऐलानिया अहद है कि सबका साथ लेकर ही सबका विकास होगा। इस मुल्क का हर नागरिक सबसे पहले हिन्दोस्तानी है। वह न हिन्दू है न मुसलमान। उसका मजहब सबसे पहले हिन्दोस्तानियत है मगर क्या कयामत है कि हम अंग्रेजों के बताये उस रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर भारत को दो टुकड़ों में बांटने के लिए उन्होंने अमल किया। कुछ लोगों को भड़का कर अंग्रेजों ने पाकिस्तान का निर्माण उसी मुहम्मद अली जिन्ना के हाथों करवा डाला जिसने कभी आजादी के परवाने बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ चले राजद्रोह के मुकद्दमे में उनकी पुरजोर पैरवी की थी। इसलिए चाहे मौलवी फारूक हों या हुर्रियत का कोई दूसरा नेता, हमें हमेशा ध्यान रखना होगा कि ऐसे लोगों को सुरक्षा देकर हम अपने लिए ही मुसीबतों को मजबूत कर रहे हैं। जहां तक जुनैद का सवाल है तो उसका लहू यही पुकारता रहेगा :
न मारा जानकर बेजुर्म गाफिल तेरी गर्दन पर।
रहा मानिन्दे खूने बेगुनाह हक आशनाई का॥

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