जीएसटी : अभी चुनौतियां सामने हैं


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जीएसटी लागू होने के बाद देश एक नई व्यवस्था पर चलने लगा है। एक तरफ देशभर में जीएसटी के जश्न की तस्वीरें आ रही हैं तो कहीं-कहीं व्यापारी विरोध, भूख हड़ताल, प्रदर्शन और बाजार बन्द भी कर रहे हैं। हमारे देश में लार्ज स्केल इंडस्ट्री के अलावा मंझोले और लघु उद्योग भी हैं, इसी के साथ कुटीर उद्योग भी हैं। इन सभी सैक्टर्स की जरूरतें अलग-अलग हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां लोगों के हितों में भी भारी विविधता है, इसलिए कोई इसका समर्थन कर रहा है तो कोई इसका विरोध। बड़े उद्योगों को इससे फायदा होने वाला है तो वह इसका समर्थन कर रहे हैं। मंझोले, छोटे और कुटीर उद्योगों को लगता है कि इससे उन्हें नुकसान होने वाला है, इसलिए वह इसका विरोध कर रहे हैं। सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। नोटबंदी के बाद 4-5 महीने छोटे उद्योग प्रभावित हुए, जिन्हें उभरने के लिए उन्हें अभी भी और वक्त की जरूरत है। दिहाड़ी मजदूर भी प्रभावित हुए। नकदी न होने से किसान भी प्रभावित हुए और कृषि मजदूर भी। छोटे कारखाने वालों ने कारीगरों को 2-3 महीने के लिए घर भेज दिया था। अब जाकर स्थिति सामान्य होने लगी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कालेधन की समानांतर व्यवस्था को खत्म करने के लिए उठाए गए कदमों का देशभर में स्वागत हुआ और लोगों ने पीड़ा सह कर भी उनका साथ दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के स्थापना दिवस समारोह को सम्बोधित करते हुए नोटबंदी के फायदे गिनाये। एक लाख फर्जी कम्पनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है, 3 लाख कम्पनियां राडार पर हैं जिन पर संदिग्ध लेन-देन में लिप्त होने का संदेह है और 37,000 से अधिक कम्पनियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। सरकार कालेधन के धंधे में लिप्त कम्पनियों पर कार्रवाई कर रही है। इससे आम आदमी संतुष्ट है। आम लोगों का मानना है कि पहली बार देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो तेजी से निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने में सक्षम है। मोदी शासन में नीतिगत विकलांगता तो बिल्कुल नहीं है। प्रधानमंत्री ने चार्टेड अकाउंटेंटों को बहलाया-फुसलाया और फिर हड़काया भी। साथ ही उन्हें कालेधन के धंधे में लिप्त कम्पनियों को छोडऩे की सलाह भी दी। सरकार के सामने नोटबंदी से भी ज्यादा चुनौतियां जीएसटी के बाद आ खड़ी हुई हैं। जीएसटी अब ट्रायल मोड से जमीन पर उतर आई है। छोटे उद्यमी, फैक्टरी वाले, दुकानदार, उद्योग से जुड़े अन्य सैक्टर आतंकित इस बात से हैं कि कहीं नोटबंदी के बाद उनके काम-धंधे ठप्प हो गए थे, उसी तरह कहीं अब भी 4-5 महीने कामकाज में मंदा रहा तो वह बर्बाद हो जाएंगे।

अब देखना होगा कि जीएसटी लागू होने के बाद तकनीकी समस्याएं आएंगी या नहीं, आएगी भी तो कितनी आएगी। 3-4 महीने काम करने के बाद ही पता चलेगा कि चीजें किस तरह से काम कर रही हैं। जीएसटी का लागू होना स्वतंत्र भारत के उन फैसलों में से है जो भविष्य में ऐतिहासिक फैसला माना जाएगा। अगर कोई समस्या आती है तो उस पर सरकार को भी जवाबदेह होना होगा। जीएसटी में कम्प्यूटर और तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है। अगर यह कम्प्यूटराइज्ड नहीं होता तो यह लागू ही नहीं हो सकता है। कम्प्यूटराइजेशन में कई तरह की दिक्कतें हैं जो सामने आ रही हैं। राजस्थान और पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में सारा कामकाज बही-खातों से ही होता है। उन्हें कम्प्यूटर पर कामकाज करने में अभी समय लगेगा। पुरानी टैक्स व्यवस्था में हर राज्य के लिए यह मौका था कि वे अपनी जरूरतों के मुताबिक टैक्स का फैसला कर सकते थे। नई व्यवस्था में स्थानीय निकायों की आमदनी का रास्ता क्या होगा? इस सवाल का जवाब आना बाकी है। ऐसे बहुत से सवालों के जवाब समय के साथ आने शुरू हो जाएंगे। देखना यह है कि देश के छोटे उद्योग इससे प्रभावित नहीं हों। यदि लघु, कुटीर और मंझोले उद्योग प्रभावित होते हैं तो बेरोजगारी का संकट और गहरा जाएगा।

जीएसटी लागू होने के बाद कई सैक्टरों ने माल भेजना और मंगवाना बन्द कर दिया है क्योंकि वे अभी जीएसटी के प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। निश्चित रूप से इसका प्रभाव बाजार पर पड़ेगा, इसलिए सरकार को बहुत चौकन्ना रहना पड़ेगा। 1984 में जब राजीव गांधी कम्प्यूटर ला रहे थे तो लगभग हर विपक्षी दल और श्रमिक संगठन विरोध कर रहा था और कहा जा रहा था कि कम्प्यूटर आने से बेरोजगारी फैल जाएगी। आज कम्प्यूटर लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है। व्यापारी कम्प्यूटर रिकार्ड में नहीं आना चाहते। वे चाहते हैं कि सब कुछ ऐसे ही चलता रहे लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि जीएसटी के लाभ वह रिकार्ड में आये बिना हासिल नहीं कर सकते। सभी को चाहिए कि वह सहनशीलता से इसे समझें और आगे बढ़ें। सरकार को भी उद्योग और बाजार पर पैनी नजर रखनी होगी।