इतिहास अंधियारा, भविष्य अंधकारमय


पाकिस्तान में नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने अपने विश्वस्त यानी अपने हाथों की कठपुतली शाहिद खकान अब्बासी को प्रधानमंत्री बना दिया। अब्बासी केवल 45 दिनों के लिए अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए हैं। नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) का प्लान यह है कि 45 दिन के भीतर नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ एक उपचुनाव के जरिये सांसद चुने जाएंगे तब वह पीएम पद पर नियुक्त किए जाएंगे। अब्बासी का मनोनीत प्रधानमंत्री बनना ठीक वैसा ही है जैसे कि लालू प्रसाद का फंसने के बाद राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना या जयललिता के जेल जाने के बाद उनके द्वारा अपने अतिविश्वस्त पनीर सेल्वम को मुख्यमंत्री बनाना।

तमिलनाडु में अम्मा जयललिता की मौत के बाद अन्नाद्रमुक की सर्वेसर्वा बन गई शशिकला ने भी भ्रष्टाचार के मामले में सजा भुगतने के लिए जेल जाने से पहले अपने अतिविश्वस्त पलानी स्वामी को मुख्यमंत्री बनवा डाला ताकि सत्ता की नकेल उनके हाथों में रहे। सियासत में अतिविश्वस्त साथियों को शीर्ष पद पर बैठाने की परम्परा नई नहीं है। भारत की तरह ही पाकिस्तान का विपक्ष भी बंटा हुआ है इसलिए विपक्ष सांझा प्रत्याशी पर सहमत नहीं हो सका। इसके बाद इमरान खान के नेतृत्व वाली तहरीक-ए-इन्साफ ने अवामी लीग के शेख रशीद को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उन्हें महज 33 वोट ही मिले। पाकिस्तान में अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने की व्यवस्था का यह पहला उदाहरण नहीं है। जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान भी चौधरी शुजात हुसैन को शौकत अजीज की नियुक्ति तक प्रधानमंत्री पद सम्भालने को कहा गया था। खैर, अब्बासी 45 दिन का प्रधानमंत्री बनने से खुश होंगे क्योंकि पाक के प्रधानमंत्रियों की सूची में उनका नाम दर्ज हो चुका है।

नवाज शरीफ की सरकार में पैट्रोलियम मंत्री रहे अब्बासी के खिलाफ भी राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो 22 हजार करोड़ के घोटाले की जांच कर रहा है। अब्बासी लिक्विड नेचुरल गैस आयात का कान्ट्रेक्ट देने के मामले में बुरी तरह घिरे हैं। आरोप है कि यह ठेका देने के सभी नियमों और कानूनों को ताक पर रख दिया गया था। इस पूरे मामले में पाक में पैट्रोलियम सचिव, इंटर स्टेट गैस सिस्टम के एमडी, एग्रो कम्पनी के अधिकारी और सुई सदर्न गैस कम्पनी के पूर्व एमडी भी चपेट में हैं। जिस तरह से पाक सुप्रीम कोर्ट तेजी से फैसले सुना रहा है उससे लगता है कि कहीं अब्बासी का हाल भी नवाज जैसा न हो। सवाल यह है कि पाक की सियासत की तस्वीर क्या होगी? पाक संसद का कार्यकाल खत्म होने में अब केवल 10 माह ही शेष रह गए हैं।

नवाज शरीफ और उनकी पार्टी के लिए ये 10 माह काफी अहम हैं। नवाज को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने पर अपनी जीत का जश्न मना रहे इमरान खान कितने मजबूत होते हैं यह देखना अभी बाकी है। इसी बीच यह आशंकाएं जोर पकड़ रही हैं कि कहीं सेना फिर बैरकों से निकलकर सत्ता पर काबिज न हो जाए। पाक के इतिहास पर नजर डालें तो जब-जब भी वहां लोकतांत्रिक हुकूमत कमजोर हुई है, पाक सेना ने अपने बूटों के तले लोकतंत्र को कुचल दिया। फिलहाल ऐसी कोई उम्मीद तो नजर नहीं आती लेकिन पाक के जरनैल किस समय क्या कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। पाक सेना अपने हुक्मरानों को बार-बार हटाती रही है।

अगर सेना वहां सत्ता में आती है तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहले ही बेनकाब हो चुके पाकिस्तान के लिए मुश्किल होगी। वैश्विक स्तर पर उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अमेरिका ने भी पाक को आर्थिक सहायता देना रोक दिया है। पाक को 2000 करोड़ की मदद तभी मिलेगी जब वह साबित करेगा कि वह आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई कर रहा है। नवाज के समय भी सेना हावी रही और अब्बासी पर भी सेना काफी हावी रहेगी। सेना की हुकूमत भारत के लिए खतरे का संकेत होगी लेकिन चीन भी नहीं चाहता कि वहां फौजी हुकूमत आए क्योंकि नवाज शरीफ तो उसकी गोद में बैठे हैं।

नवाज शरीफ की पार्टी जनता में मजबूत रहेगी या कमजोर होगी, इसे देखने के लिए इन्तजार करना होगा। वैसे नवाज शरीफ उन बदकिस्मत नेताओं में शामिल हैं जो देश के सर्वोच्च पद पर तीन बार पहुंचे लेकिन कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। मुशर्रफ ने जब उनका तख्ता पलटा था तो ऐसा लगता था कि कहीं उनका हश्र भी जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह ही न हो जाए लेकिन सऊदी अरब की मध्यस्थता से उनकी जान बच गई और जेद्दाह में उन्होंने निर्वासित जीवन भी जिया। इस समय पाक की आर्थिक हालत, आतंकवाद से उपजी स्थितियां काफी खराब हैं। एक भी गलती पाक को खण्ड-खण्ड बिखेर सकती है। पाक का लोकतंत्र एक अबूझ पहेली है, इतिहास अंधियारा, भविष्य अंधकारमय।

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