जीवन की संध्या में सिंघानिया का कैसा अनुभव…


kiran ji

पिछले लगभग 15 वर्षों से मैं बुजुर्गों के लिए काम कर रही हूं। इस उम्र के बारे में अनुभव न होते हुए भी बहुत से अनुभव हासिल कर लिए हैं। मेरा काम एक तरह का सामाजिक आन्दोलन भी है कि हमारे देश में ओल्ड होम्स नहीं होने चाहिएं। हमारा देश श्रीराम और श्रवण के संस्कारों वाला देश है। यहां घर के बड़े-बुजुर्गों को पूजा जाता है। सारी उम्र ये बच्चों और समाज के लिए काम करते हैं इसलिए इस उम्र में इन्हें पूरा हक है सम्मान से मर्यादा में रहकर हर पल, हर खुशी को जीयें। अमर शहीद लाला जगत नारायण जी का यह अधूरा सपना था जिसे मैं पूरा करने की कोशिश कर रही हूं। उन्होंने अपने जीवन की संध्या में जीवन की संध्या पर बहुत से लेख लिखे। अभी कि वह अपने घर के सशक्त मुखिया थे। घर में तीन पीढिय़ां उनकी छत्रछाया में प्यार से अनुशासन में रहती थीं। घर का पत्ता भी उनकी इच्छा के बिना नहीं हिलता था। बड़े रौबीले परन्तु अपने आप में आदर्शों और संस्कारों के उदाहरण थे इसीलिए उनके मुख से निकला और कलम से लिखा एक-एक शब्द जनता, समाज और परिवार में स्वीकार्य होता था। वह जनता के सेवक थे। लोगों से मिलते थे तो इस अवस्था के दर्द को समझते हुए लिखते थे।

असल में इस अवस्था में तन-मन-धन का दर्द होता है। तन यानि शरीर ढलने लगता है। कई बीमारियां लगनी शुरू हो जाती हैं और हिम्मत जवाब देना शुरू कर देती है। कभी घुटनों का दर्द, कभी शूगर, ब्लड प्रैशर, एलजाईमर सताता है इसलिए हैल्थ प्रोब्लम बहुत होती हैं। दूसरी समस्या है मन। इस अवस्था में या तो साथी चला जाता है या बच्चे काम के कारण या अन्य कारणों से चले जाते हैं या जिनकी बेटियां होती हैं विवाह के बाद ससुराल चली जाती हैं इसलिए मन उचाट रहता है और अकेलापन सताता है। तीसरी समस्या है धन जो बहुत बड़ी समस्या है। जिनके पास नहीं है उनके लिए मुसीबत और जिनके पास है उनके लिए भी मुसीबत। अगर अकेले हैं तो नौकर भैया ही मार जाते हैं। अगर बच्चे हैं (सभी नहीं, काफी लोगों के) या तो पैसों के लिए तंग करते हैं या केस करते हैं या अपने नाम पर करने के लिए प्रैशर करते हैं। अगर प्यार में आकर मां-बाप उनके नाम पर सब कुछ कर दें कि अब इन्होंने ही हमें सम्भालना है तो उनकी नजरें ही बदल जाती हैं (परन्तु कई सेवा की मिसालें भी मेरे पास हैं)।

पिछले दिनों अखबारों और टी.वी. चैनलों पर देश की नामी-गिरामी हस्ती सिंघानिया के बारे में सुना और पढ़ा तो मेरे लिए यह नई बात नहीं थी। मैं आये दिन ऐसे केस देखती हूं। लोगों के आंसू भी पोंछती हूं क्योंकि उनके वकील के अनुसार ”जहां डा. सिंघानिया ने अपनी सारी सम्पत्ति अपने बेटे को दे दी है वहीं गौतम अब उन्हें हर चीज से वंचित करता जा रहा है और डा. सिंघानिया के अनुसार वह अपने बेटे के प्यार में अंधे हो गए जिस कारण उन्होंने अपना सब कुछ उनके नाम कर दिया। उफ! जीवन की इस संध्या में इतना बड़ा धक्का इमोशनली, फाइनेंशियली आहत जो मैं आये दिन देखती हूं। हमारे वकील विनीत जिन्दल पंजाब केसरी में टी.एस. राजपूत मॉडल टाउन, महेन्द्र गुप्ता ईस्ट दिल्ली में लोगों को नि:शुल्क राय देकर उनके केस निपटाते भी हैं और सलाह भी देते हैं और कहीं-कहीं काउंसलिंग करके परिवारों को जोड़ते भी हैं क्योंकि हमारा मकसद परिवारों को जोडऩा है, तोडऩा या झगड़ा पैदा करना नहीं क्योंकि इस उम्र में जो दर्द होता है उसे महसूस और समझने की जरूरत है। यह उम्र सबको आनी है। ईश्वर करे किसी को भी अकेलेपन या औलाद या अपनों का नजर बदलने का अनुभव न हो क्योंकि इस उम्र में जो दिल से आह और दुआ निकलती है वह बच्चों को और आने वाली पीढिय़ों को समझनी चाहिए और मेरा मानना है कि ‘हिस्ट्री आलवेज रिपीट्स’ और जो बोओगे वो काटोगे।

कई बार बुजुर्गों और बच्चों की छोटी सी बात पर ‘अहं’ भी टकरा जाता है। जैसे मेरे पास बहुत बड़े-बड़े नामी-गिरामी उद्योगपति के बच्चे अपने पिता की शिकायत लेकर आये कि पिताजी ने इतनी बड़ी कोठी के आगे फलों की रेहड़ी लगा ली है। पिताजी से बात कर समझ लगी कि पिताजी ने सारी उम्र की मेहनत अपने बच्चों के नाम कर दी। अब उन्हें समय पर उनकी पसन्द का खाना और दूध नहीं मिलता तो उन्होंने ऐसा किया। इससे बच्चों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गलती सुधारी। अब बहुत खुश हैं। इसीलिए मुझे जो भी अनुभव होते हैं मैंने अपनी पुस्तकों में उतारे हैं जो वास्तविक हैं। आशीर्वाद, जीवन संध्या, जिन्दगी का सफर, आज और कल, इंग्लिश में ब्लैसिंग्स और अब एक और पुस्तक जो एक अक्तूबर को रिलीज होगी ‘अनुभव’ जिसमें सभी अपने इस उम्र के अनुभव लिख रहे हैं। अगर पाठकों में से कोई बुजुर्ग अपनी उम्र का अनुभव मुझे भेजना चाहे तो अपनी फोटो साथ भेज सकता है जो आने वाली पीढिय़ों के लिए मार्गदर्शक हो।

मुझे व्हाट्सएप पर मैसेज आया कि अगर बेटे संस्कारी हों तो वृद्ध आश्रम कम हो जाएं और अगर सारी बेटियां (बहुएं भी बेटियां हैं किसी की) संस्कारी हों तो वृद्ध आश्रम समाप्त ही हो जाएं। आओ सब मिलकर इस सामाजिक आन्दोलन में आहुति डालें। बेटे-बेटियों को संस्कार दें। खुद उदाहरण बनें, कोई भी इस जीवन की संध्या में दु:खी न हो। बुजुर्गों को भी मैं कहूंगी कि व्यस्त रहो, मस्त रहो और नोन (प्रशंसा करो बच्चों की), मौन (कम से कम बोलो या सलाह दो), कौन (हस्तक्षेप मत करो क्यों, कौन, कब) का सिद्धांत अपनाएं। यह जिन्दगी उसी की है जो प्यार में खो गया और किसी का हो गया (यहां बच्चों और माता-पिता का प्यार और सम्मान है जिसमें आत्मिक सुख है)। हे ईश्वर, इस जिन्दगी में, इस उम्र में कोई भी सिंघानिया जैसे आहत न हो। हाथ जोड़कर उन बच्चों और माता-पिता और उन्हीं रिश्तेदारों को जिन्होंने जायदाद के लिए आपस में केस किए हुए हैं। एक-दूसरे का हक देते हुए केस समाप्त करें। जिन्दगी बहुत छोटी है कि पल दा भरोसा यार पल आवे न आवे।

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