भारत-चीन और अमरीका


भारत-चीन के सम्बन्धों की समीक्षा हमें वर्तमान भारतीय उपमहाद्वीप की राजनैतिक व भौगोलिक परिस्थितियों के सापेक्ष करनी होगी। हम इस वास्तविकता से मुंह नहीं मोड़ सकते कि चीन हमारा सबसे निकट का ऐसा पड़ोसी है जिसकी सीमाएं भारत से छह स्थानों पर खुलती हैं। इसके साथ ही हमें सोवियत संघ के विघटन के बाद एकल ध्रुवीय विश्व को भी संज्ञान में लेते हुए चीन के साथ अपने सम्बन्धों को बराबरी के स्तर पर विकसित करने की दिशा में इस तरह आगे बढऩा होगा कि दोनों संप्रभु देशों की भौगोलिक वास्तविकताओं को सम्मान प्राप्त हो, मगर ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। चीन को यह समझना होगा कि भारत को अपनी भौगोलिक सीमाओं की सुरक्षा का उतना ही अधिकार है जितना कि उसे। इस सिलसिले में दोनों देशों के बीच एक वार्ता तन्त्र 2003 में केन्द्र में वाजपेयी सरकार के काबिज रहते स्थापित किया गया था जिसकी अभी तक 19 बैठकें हो चुकी हैं। इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि वार्ता तन्त्र किसी व्यक्ति ने नहीं बल्कि भारत की स्वयंभू सरकार ने स्थापित किया था, यही वजह रही कि 2004 में केन्द्र में सत्ता में बदलाव होने पर गठित मनमोहन सरकार ने चीन के साथ अपने पुराने समझौतों को लागू करना जारी रखा।

मोदी सरकार भी विदेशी मामलों में पिछली मनमोहन सरकार द्वारा किये गये सभी समझौतों से बन्धी हुई है परन्तु मनमोहन सरकार के समय भी चीन आदतन तरीके से भारतीय सीमाओं में अतिक्रमण करता रहता था और आज भी मोदी सरकार के चलते वह अपनी ऐसी हरकतों से बाज नहीं आया है। सिक्किम में नाथूला सीमा पर उसने पुन: अपनी इस फितरत का परिचय देते हुए अतिक्रमण ही नहीं किया बल्कि कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों को भी अपनी सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया। चीन इसकी वजह बता रहा है कि भारत अपनी भूलों को पहले सुधारे उसके बाद वह आगे सोचेगा। इसकी जड़ में नाथूला सीमा से 40 हवाई किमी. दूर चीन के नियन्त्रण में वह चुम्बी वादी है जहां वह सड़क बना रहा है मगर यह सड़क भारत के उस मार्ग के बहुत करीब है जो सिलीगुड़ी से सिक्किम को जोड़ती है। भारत को डर है कि चीन चुम्बी वादी में सड़क बनाकर असहज या संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने पर सभी उत्तर पूर्वी प्रदेशों का सारे भारत से नाता तोड़ सकता है, यह सड़क भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके दोनों ओर हमारे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान हैं। इसे भारत में संकरी गली या ‘चिकन नर्क कहा जाता है। अत: भारत का चिन्तित होना स्वाभाविक है परन्तु चीन के बिगडऩे की असली वजह भारत और अमरीका के बीच बढ़ता सैनिक सहयोग है।

प्रशान्त सागर व हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत, जापान, अमरीका व आस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते नौसैनिक सहयोग को चीन अपने लिए चुनौती मान रहा है। यह जगजाहिर है कि चीन दोनों ही समुद्री क्षेत्रों में लगातार अपनी ताकत में इजाफा कर रहा है और पाकिस्तान को उसने अपने कन्धे पर बिठाया हुआ है। इस वजह से इस पूरे क्षेत्र में सैनिक प्रतियोगिता के बढऩे का भारी खतरा कभी भी पैदा हो सकता है। 90 के दशक तक भारत की यह स्थायी सोच थी कि हिन्द महासागर क्षेत्र को शान्ति क्षेत्र घोषित किया जाये। साठ-सत्तर के दशक में स्व.इन्दिरा गांधी ने इस बारे में पूरे विश्व में अभियान चलाया था और दियेगो गार्शिया में अमरीका द्वारा परमाणु अड्डा बनाये जाने की सख्त मुखालफत की थी, परन्तु वह रूस व अमरीका की ताकतों के द्विध्रुवीय विश्व का दौर था जिसे शीत युद्ध का काल भी कहा जाता है परन्तु 90 के बाद परिस्थितियों ने ऐसी करवट लेना शुरू किया कि खुद चीन भी उससे नहीं बच पाया और उसने नियन्त्रित कम्युनिस्ट अर्थव्यवस्था का घेरा तोड़कर विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनना ज्यादा मुफीद समझा, विश्व सामरिक होड़ से आर्थिक होड़ की तरफ बढ़ गया मगर सैनिक ताकत का विस्तार भी इसके कन्धे पर बैठ कर साथ-साथ होता रहा। भारत हिन्द महासागर में इसके चलते सन्तुलक की भूमिका में ज्यादा दिन तक नहीं रह सका और उसने मनमोहन सिंह के जमाने में ही अमरीका के साथ सैनिक रणनीतिक सहयोग बढ़ाना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ चीन ने हाल ही में एक क्षेत्र एक सङ़क ‘वन बेल्ट वन रोड-अबोर’ का नया सिद्धान्त देकर अपनी सामरिक व आर्थिक ताकत का इजहार करने का बीड़ा उठाया जिसका भारत ने विरोध किया क्योंकि इससे दूसरे देशों की भौगोलिक संप्रभुता सीधे प्रभावित होने का खतरा पैदा होता है।

भारत के इस रुख का समर्थन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ वाशिंगटन में हुई अपनी मुलाकात में खुलकर किया मगर इससे भारत को फूल कर कुप्पा हो जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारी मुल्क है और उसके हर फैसले में मुनाफे की नीयत रहती है। भारत किसी भी तौर पर दक्षिण एशिया में अमरीका की हथियारों की तिजारत का जरिया नहीं बन सकता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका में हथियारों का उत्पादन करने वाली ऐसी कम्पनियां हैं जिनका वार्षिक कारोबार भारत के सालाना बजट से भी कई गुणा अधिक रहता है मगर चीन के इरादे भी हमें समझने होंगे। यह देश किसी भी सूरत में भारत से रंजिश रखते हुए आगे नहीं बढ़ सकता है, अगर 21वीं सदी एशिया की सदी है तो चीन को भारत की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही आपसी सहयोग से आगे बढऩा होगा। बेशक वह एशिया में भारत का प्रतिद्वन्दी है मगर दुश्मनी वह बर्दाश्त नहीं कर पायेगा। उसे सितम्बर 1967 का सिक्किम की सीमा का ही वाकया याद रखना होगा जब नाथूला सीमा पर ही भारत व उसके सैनिकों की मुठभेड़ हो गई थी और इसमें साढ़े 500 चीनी सैनिक हताहत व जख्मी हुए थे जबकि भारत के केवल 65 सैनिक शहीद हुए थे और डेढ़ सौ के लगभग जख्मी हुए थे और पांच दिन बाद ही चीन को संघर्ष रोकना पड़ा था।

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