शंघाई में भारत : स्वागत है


भारत और पाकिस्तान को सदस्यता देने के साथ ही शंघाई सहयोग संगठन अब आठ देशों वाला महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का मंच बन गया है। भारत को इसकी सदस्यता की जरूरत थी। इसके लिए आवेदन 2006 में किया गया था। पहले उसकी भूमिका एक पर्यवेक्षक की थी। हालांकि भारत के कट्टर दुश्मन पाकिस्तान को भी इसमें जगह दी गई है लेकिन भारत के लिए कई अर्थों में कूटनीतिक और राजनीतिक रूप से यह जरूरी था कि वह अन्तर्राष्ट्रीय रूप से महत्वपूर्ण मंच में शामिल होकर एक निर्णायक नेतृत्व की भूमिका निभाए। चीन के नेतृत्व वाली ओबीओआर (वन बेल्ट वन रोड) बैठक के बहिष्कार के बाद भारत के कूटनीतिज्ञों के आगे यक्ष प्रश्न था कि क्या चीन की वर्चस्वता वाले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा ले या नहीं ले। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछली बार उफा में हुई एसपीओ बैठक में हिस्सा लिया था। इससे पहले भी प्रधानमंत्री के स्तर पर भारतीय प्रतिनिधिमंडल इसमें भाग लेता रहा है। भारतीय राजनीतिज्ञों और कूटनीतिज्ञों ने हर पहलू को ध्यान में रखा और इसमें भारत के भाग लेने का फैसला किया। शंघाई सहयोग संगठन की ओबीओआर के बीच तुलना नहीं की जा सकती। ओबीओआर ने सीधे तौर पर भारत की संप्रभुत्ता वाले मुद्दे को छुआ है लेकिन एससीओ कई देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाने की प्रक्रिया है। यह भी सही है कि एससीओ के अधिकांश देश ओबीओआर का समर्थन करते हैं, जबकि भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह किसी भी सूरत में इसका समर्थन नहीं करता है।

कुछ सवाल अब भी सामने हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शंघाई में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अकेले में मुलाकात की। जाहिर है मतभेद के मुद्दों पर चर्चा भी हुई होगी। सवाल यह उठता है कि क्या एनएसजी में भारत की सदस्यता के लिए चीन तैयार हो जाएगा क्योंकि अब तक वह सीधा विरोध करता रहा है। क्या पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को चीन आतंकवादी मानेगा और क्या आतंक के सवाल पर पाकिस्तान पर दबाव बनाएगा? हालांकि इन सवालों का जवाब भविष्य में मिल ही जाएगा। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद जैसी बुराई के लिए शंघाई सहयोग संगठन के सदस्यों को एकजुट होकर प्रयास करना होगा क्योंकि आतंकवाद मानवता के लिए बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मौजूदगी में कहा कि सदस्य देशों को आर्थिक रिश्ते और सम्पर्क का विस्तार करना चाहिए लेकिन इस तरह के सहयोग में किसी देश की संप्रभुत्ता का ध्यान रखा ही जाना चाहिए।

भारत का शंघाई सहयोग संगठन में शामिल होना इसलिए भी जरूरी था कि कजाकिस्तान मध्य एशिया का बहुत महत्वपूर्ण देश है और पारम्परिक रूप से भारत के साथ उसके रिश्ते काफी अच्छे हैं। वह भारत का स्वाभाविक सहयोगी है। मध्य एशिया में हर कोई कजाकिस्तान की अहमियत को स्वीकार करता है। वर्ष 1996 में रूस, चीन, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान और किॢगस्तान जैसे देश आपसी तालमेल और सहयोग को लेकर सहमत हुए थे और तब इसे शंघाई-5 के नाम से जाना जाता था। अब इसका विस्तार किया गया है। इस संगठन के सदस्य देशों में भारत ऊर्जा खरीदार के तौर पर सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहां भारत-रूस एक बड़ी गैस पाइप लाइन बिछाये जाने की योजना पर काम कर रहे हैं। तापी पाइप लाइन पर काम शुरू हो चुका है। यह पाइप लाइन तजाकिस्तान से चल कर भारत तक आएगी।  शंघाई सहयोग संगठन की सदस्यता मिल जाने से भारत को मध्य एशिया की चुनौतियों, समस्याओं और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका मिलेगा और भारत खुद को एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर प्रोजैक्ट कर पाएगा। यह मार्ग बहुत आसान भी नहीं, इसमें जटिलताएं भी हैं। शंघाई सहयोग संगठन पर चीन का दबदबा है लेकिन उसने यह सब रूस की मदद से शुरू किया है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत प्रखर भूमिका में होगा। पाकिस्तान अगर अपनी हरकतों से बाज नहीं आता तो भारत के पास उस पर दबाव बनाने का बड़ा मौका होगा। एससीओ का सदस्य होने के नाते चीन को भी भारत की भावनाओं का ध्यान रखना ही होगा। भारत को इस बात का फायदा मिलेगा कि उसका मध्य एशियाई देशों में दखल बढ़ जाएगा। वहां के बाजारों में भारत की एंट्री आसान हो जाएगी। भारत की आर्थिक ताकत भी बढ़ेगी।

log in

reset password

Back to
log in
Choose A Format
Poll
Voting to make decisions or determine opinions
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals
List
The Classic Internet Listicles
Video
Youtube, Vimeo or Vine Embeds
Thanks for loving our story. Like our Facebook page to get more stories.

Send this to a friend