अपराजेय नरेन्द्र मोदी?


लोकतंत्र में जो ‘लोकशक्ति’ को चुनौती देते हैं और इसका मूल्यांकन व्यक्तिवादी लोकप्रियता के पैमाने में करते हैं वे समय की रफ्तार को ‘स्थिर’ मानने की गलती करते हैं। लोकशाही ‘लोक इच्छा’ पर टिकी होती है और इसका कोई निर्धारित पैमाना नहीं होता। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में ‘अपराजेय’ कहे जा सकते हैं मगर भविष्य के गर्त में क्या छुपा है इसके बारे में वह स्वयं भी कोई गारंटी नहीं कर सकते क्योंकि भारत के सामान्य जन की अपेक्षाएं कौन सा स्वरूप लेंगी इसका उत्तर सिर्फ समय के गर्भ में ही छुपा हुआ है। बेशक राजनीतिक दल लोकतंत्र में ऐसा माहौल बनाते हैं कि उनका कोई दूसरा विकल्प नहीं है मगर भारत की मुफलिस और मजलूम कही जाने वाली जनता ने अक्सर मौका पडऩे पर खुद ही आगे बढ़कर विकल्प भी पैदा किया है। अत: जनता की इच्छा की गारंटी करना लोकतंत्र की ताकत को शिखर राजनीति की जोड़-तोड़ में सीमित करने का संकुचित नजरिया होगा।

बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार की भविष्यवाणी उनके अपने राजनीतिक अस्तित्व को सुरक्षित रखने का एक तरीका हो सकता है क्योंकि वह स्वयं चलकर श्री मोदी व भाजपा की शरण में आए हैं मगर वह इससे सत्ताधारी पार्टी भाजपा को ‘अकर्मण्य’ भाव में नहीं डाल सकते क्योंकि स्वतंत्र भारत का इतिहास जनता के मार्गदर्शन का इतिहास रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण 2014 के लोकसभा चुनाव रहे हैं जिनमें भारत के सामान्य जन ने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के इस निष्कर्ष को झुठला दिया था कि भारत की राजनीति में ‘गठबन्धनों’ का लम्बा दौर चलेगा। इन चुनावों में श्री मोदी ‘महानायक’ बनकर उभरे और उन्होंने सभी आकलनों को गलत साबित कर दिया मगर यह उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिफल था।

ऐसा ही समय पूर्व में भी भारत देख चुका है जब श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती देने की न तो किसी नेता और न ही किसी दल में हिम्मत थी। हालांकि विपक्ष में स्व. मोरारजी देसाई से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी, पीलू मोदी, कामराज, चरण सिंह आदि जैसे दिग्गज मौजूद थे। यह वह दौर था जब इंदिरा जी के नेतृत्व में भारत का पूरी दुनिया में डंका बज रहा था मगर 1973 के करीब जबलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में नीतीश बाबू की पार्टी जद (यू) के ही नेता श्री शरद यादव चुनाव जीत गए थे। यह सीट कांग्रेस के दिग्गज और संविधान सभा के सदस्य रहे सेठ गोविन्द दास की मृत्यु की वजह से खाली हुई थी जो इस पार्टी की कदीमी सीट भी मानी जाती थी। श्री यादव तब एक छात्र नेता भर थे मगर श्री यादव विजयी होकर लोकसभा में आ चुके थे लेकिन तब कांग्रेस के नेताओं ने इसे एक साधारण घटना माना और पूरी कांग्रेस पार्टी इंदिरा गांधी की जय-जयकार में मशगूल रही। इसके सामानान्तर गुजरात से शुरू हुए छात्र आंदोलन ने बिहार की राह पकड़ कर राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया और कल तक ‘दलविहीन’ राजनीति की वकालत करने वाले स्व. जयप्रकाश नारायण ने इसकी कमान संभाल ली। यह समय की गति थी जो राजनीति को अपने आगोश में ले रही थी।

इसके बाद का इतिहास इमरजैंसी का इतिहास है जिसे मैं दोहराना नहीं चाहता हूं। मेरा कहने का आशय सिर्फ इतना सा है कि यदि समय रहते तब इंदिरा गांधी महिमामंडन के उलझाव में न फंसतीं तो समय की गति को देखकर अपना अगला कदम तय करतीं और जन अपेक्षाओं का वैज्ञानिक तरीके से संज्ञान ले पातीं परन्तु उनके चाटुकारों ने उन्हें इस झंझट में फंसने ही नहीं दिया। उलटे उन्होंने श्री जय प्रकाश नारायण पर आरोप लगा दिया कि वह ‘सीआईए’ के एजैंट हैं। संभवत: यह इंदिरा जी की सबसे बड़ी गलती थी कि उन्होंने जय प्रकाश नारायण को इस ‘उपाधि’ से विभूषित कर डाला मगर वर्तमान में श्री मोदी का महिमामंडन करके जिस तरह जन अपेक्षाओं को हाशिये पर डालने की कोशिश कुछ नेता कर रहे हैं वे भाजपा को आम जनता से दूर करने का सामान ही तैयार कर रहे हैं क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की अंतिम ताकत लोगों के हाथ में ही रहती है।

सत्ता के मोह से बंधे ये लोग भूल जाते हैं कि भारत वह देश है कि जहां हमेशा ‘बादशाहों’ से भी बड़ा रुतबा ‘फकीरों’ का रहा है। श्री मोदी को इस देश की जनता एक ‘सियासी फकीर’ के रूप में देखती है जिसकी वजह से 2014 में उसने अपनी हस्ती उन पर न्यौछावर कर दी थी। इस छवि को सत्ता से बांधकर देखना श्री मोदी के साथ अन्याय होगा क्योंकि राजनीति ऐसा विज्ञान है जो स्वयं ही खाली हुई जगह को भरने की क्षमता रखती है। लोकतंत्र में मुद्दे बनाए नहीं जाते बल्कि वे स्वयं जनता के बीच से जन्म लेते हैं और उनकी जिम्मेदारी सत्ताधारी दल पर ही होती है। अत: पहली जिम्मेदारी सत्ताधारी दल के लोगों की यह है कि वे उन जन-अपेक्षाओं को समझें जो जमीन पर जन्म ले रही हैं या ले सकती हैं।

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