जिन्ना की जहनियत का तोड़!


अंग्रेजों ने जब 1935 में दूसरा भारत सरकार कानून (गवर्नमेंट आफ इंडिया रूल) बनाया था तो उनके लिए भी यह कल्पना करना आसान नहीं था कि वे इस मुल्क को हिन्दू–मुसलमान आबादी के आधार पर बांट सकते हैं क्योंकि तब ब्रिटिश संसद में पारित इस कानून के तहत भारत को एक संघीय ढांचे का देश कबूल किया गया था और इस हकीकत से इतिहास का हर विद्यार्थी वाकिफ है कि भारत के संविधान की रूपरेखा लिखने का जिम्मा स्व. पं. मोती लाल नेहरू को दिया गया था। 1936 में ब्रिटिश भारत में प्रान्तीय एसेम्बलियों के जो चुनाव हुए थे वे पं. मोती लाल नेहरू द्वारा ही लिखे गये संवैधानिक नियमों के तहत ही चुनीन्दा मताधिकार के आधार पर हुए थे और इन चुनावों में पंजाब में मुस्लिम लीग को अंगुलियों पर गिनने लायक सीटें ही मिली थीं जबकि बंगाल में यह पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और कांग्रेस को बहुत कम सीटें मिली थीं। इसके साथ ही हिन्दू महासभा को यहां अच्छी सफलता मिली थी। बंगाल का चुनाव हिन्दू–मुसलमान मतदाताओं को अलग-अलग वोट बैंक में बांटकर इस तरह हुआ था कि दोनों ही सम्प्रदायों के नेताओं ने एक-दूसरे की गैरत को ललकारने को अपना ईमान बना लिया था मगर इसके बावजूद जब एसेम्बली में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ने कुछ अन्य पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बना ली और हुकूमत को चलाया। तब तक मुहम्मद अली जिन्ना दो साल से ज्यादा वक्त लन्दन में काटकर भारत वापस आ चुके थे और उन्हें एसी उपजाऊ जमीन मिल चुकी थी जिसमें वह पाकिस्तान के ख्वाब को हकीकत में बदलने की तस्वीर बना सकते थे मगर तब महात्मा गांधी जैसे युग पुरुष के रहते कांग्रेस पार्टी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी जंग तेज करने की ठानी और 26 जनवरी के दिन को भारत की आजादी का दिन मनाना शुरू किया और कांग्रेस के अध्यक्ष को राष्ट्रपति के सम्बोधन से पुकार कर देशवासियों को सन्देश दिया कि भारत को मजहब के आधार पर तोड़ने की साजिश को किसी भी तौर पर अंजाम नहीं दिया जा सकता है मगर मुहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजों की साजिश को कामयाब करने की तदबीर बनाये बैठा था और उसने कांग्रेस को हिन्दू पार्टी कहना शुरू कर दिया और मुसलमानों के लिए अलग सियासती तंजीम को यह कहकर लाजिमी बताने की कोशिश की कि हिन्दुओं के राज में मुसलमानों की सियासी अपेक्षाएं पूरी नहीं की जा सकतीं।

जिस जिन्ना ने सिर्फ तीन साल पहले ही पाकिस्तान को किसी शायर का ख्वाब कहा था वह अब इस ख्वाब को ताबीर में बदलने की राह पर आगे चल पड़ा था। मुसलमानों के लिए हिन्दोस्तान के भीतर ही एक अलग निजाम का तसव्वुर मशहूर शायर अल्लामा इकबाल ने इलाहाबाद में 1932 के मुस्लिम लीग के इजलास में देखा था जिसकी सदारत उन्हीं ने की थी मगर आजादी के 70 साल बाद भी अगर जिन्ना की जहनियत को हिन्दोस्तान में कोई शख्स जिन्दा करने की हिमाकत करता है तो उसे किस तरह हिन्दोस्तानी कहा जा सकता है? मीडिया में चन्द दिनों के लिए सुर्खियां बटारने वाले एेसे शख्स को हिन्दोस्तान का संविधान मुजरिम करार देता है और वाजिब सजा की मांग करता है। राज्यसभा सांसद विनय कटियार एेसी शख्सियत है जिसने श्रीराम मन्दिर निर्माण आन्दोलन के चलते कल्याण सिंह सरकार के दौरान इस राज्य की बीमार चीनी मिल अपने खानदानियों के नाम कराई है। लोग वह दिन भी नहीं भूले हैं कि किस तरह वाजपेयी शासन के दौरान इस आन्दोलन से जुड़े महारथियों ने थोक के भाव पेट्रोल पंप अपने नाम कराये थे और आ​िखर में घबराकर खुद वाजपेयी जी को सारे पेट्रोल पंपों के लाइसेंस खारिज करने पड़े थे मगर संविधान की कसम लेकर संसद में बैठने वाले विनय कटियार की बेगैरती तो देखिये कि वह भारत की पूरी मुस्लिम आबादी से कह रहा है कि वे पाकिस्तान या बंगलादेश चले जायें क्योंकि उन्होंने अपने धर्म के आधार पर ही 1947 में एक नया मुल्क पाकिस्तान बनवाया था लेकिन इस गफलत में पड़ने की बिल्कुल जरूरत नहीं है कि मुसलमानों की तरफ से असदुद्दीन ओवेसी या आजम खां जो जबानी जमा खर्च कर रहे हैं उसमें मुस्लिम समाज का कोई भला छुपा हुआ है।

दरअसल ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विनय कटियार जिन्ना से भी बड़ा गुनाह कर रहे हैं और एक संयुक्त व संघीय ढांचे के भारत में बसे एक विशेष धर्म को मानने वाले लोगों को पाकिस्तान के साथ ही बंगलादेश जाने की बात कर रहे हैं। शायद इन महाशय को अपने भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास भी मालूम नहीं है। यह भारत ही था जिसने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को बंगलादेश में बदलवा कर सिद्ध कर दिया था कि जिन्ना की मजहबी पाकिस्तान की तदबीर मुसलमानों की तदबीर नहीं थी बल्कि अंग्रेजों की भारत को कमजोर बनाये रखने की साजिश थी। बंगलादेश का बनना उस द्विराष्ट्रवाद की करारी शिकस्त थी जिसे संयुक्त भारत में हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर आगे बढ़ाया था। बंगलादेश के बनने के बाद से भारत की पूर्वी सीमाएं पूरी तरह शान्त हैं मगर यह स्थिति भारत विरोधियों से सहन नहीं हो पाती है और वहां भी जमाते इस्लामी जैसी पार्टियां हिन्दोस्तान के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान की रंजिश में बदल देना चाहती हैं मगर शुक्र है कि इस देश की बंगला संस्कृति ने एेसी ताकतों को हर मुकाम पर मुंहतोड़ जवाब दिया है। इतिहास को बार–बार दोहराने का कोई फायदा नहीं है और हकीकत यह है कि सैकड़ों साल तक मुस्लिम शासकों के साये में रहने के बावजूद न तो हिन्दू संस्कृति का बाल भी बांका हुआ और न ही मुस्लिम रियाया का हिन्दू राजाओं के साये में रहने के बावजूद उनके मजहब पर कोई मुसीबत आई। कयामत है कि टैक्नोलोजी के कुलांचे भरते दौर में इस मुल्क को छह सौ साल पहले के दौर में लौटाने के मंसूबे गढ़े जा रहे हैं। कौन सोच सकता है कि हिन्दोस्तान के कारवां को इसके साथ चलने वाले लोग ही लूटने की साजिशें करेंगे? हिन्दू-मुसलमान दोनों के ही लिए यह पैगाम है, इसे पढि़ये और फिर अपने दिल की आवाज सुनिये।
गौ वहां नहीं पर वहां से निकाले हुए तो हैं,
काबे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की।

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