लालू-नीतीश का ‘प्रेम बन्धन’


बिहार की राजनीति में लालू-नीतीश के बीच की कशमकश ने महागठबन्धन के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। इसकी वजह लालू जी के सुपुत्र तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के वे गंभीर आरोप हैं जिनकी जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है और बाकायदा एफआईआर भी दर्ज कर दी है। तेजस्वी नीतीश बाबू की छत्रछाया में उपमुख्यमन्त्री पद की शोभा बढ़ा रहे हैं। नीतीश बाबू चाहते थे कि लालू जी की तरफ से भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब तथ्यात्मक रूप से प्रत्येक बिन्दू पर आये जिससे उनकी सरकार के उपमुख्यमन्त्री का पक्ष आम जनता के सामने स्पष्ट हो सके मगर जवाब जो भी आया वह पूरी तरह से ‘राजनीतिक’ था और उसका निष्कर्ष यह था कि केन्द्र की भाजपा सरकार ‘बदले की भावनाÓ से अपने नियन्त्रण में चलने वाली जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करके लालू परिवार को फंसा रही है।

जाहिर तौर पर इस जवाब का कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि भारत के बहुदलीय लोकतन्त्र में ऐसे आरोप प्राय: राजनीतिक दल एक-दूसरे पर लगाते रहते हैं, जबकि आरोप वित्तीय घोटाले या भ्रष्टाचार से सम्बन्धित हैं और विभिन्न पुख्ता दस्तावेजों के आधार पर पहली नजर में यह दिखाते हैं कि ‘लालू एंड फैमिली’ के लोगों ने सत्ता का लाभ उठाते हुए जमकर बेनामी सम्पत्ति खड़ी की है तो इनका जवाब भी पुख्ता ‘कागजाती तथ्यों’ के आधार पर ही इन्हें गलत साबित करने के लिए आना चाहिए था, मगर ऐसा कोई दस्तावेज लालू जी की तरफ से नहीं रखा गया जिससे यह लगे कि पूरा मामला फर्जी है। अत: लोकतन्त्र ही यह मांग करता है कि श्री तेजस्वी यादव को मन्त्रिमंडल से इस्तीफा देकर न्यायालय में अपना पक्ष रखकर ‘क्लीन चिट’ लेनी चाहिए और तब तक सरकार से अलग होकर नीतीश बाबू की सरकार की छवि को धुंधलके में नहीं डालना चाहिए मगर लालू जी की दिक्कत यह है कि वह ‘चांद पर दाग’ लगने को प्राकृतिक नियम मानते हैं।
यह बहुत पुरानी बात नहीं है कि जब 2004 में केन्द्र में डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पहली यूपीए सरकार बनी थी तो लालू जी ने इस साझा सरकार में अपनी पार्टी के ऐसे सदस्यों को मन्त्री बनवाया था जो पहले से दागी थे और तब विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा का उस समय बहिष्कार यह कहते हुए किया था कि बेशक मनमोहन सिंह पूरी तरह ईमानदार हैं मगर उनकी सरकार में दागियों के शामिल होने पर वह इसे स्वीकार नहीं करते हैं।

बाद में स्वयं डा. मनमोहन सिंह ने भी स्वीकार किया कि ‘चांद पर धब्बा’ तो लग गया है। नीतीश बाबू इसी स्थिति से बचना चाहते हैं जिसकी वजह से उन्होंने अपनी पूरी सरकार को ही नहीं बल्कि गठबन्धन को भी दांव पर लगा दिया है। इसमें भी कोई दो राय नहीं हैं कि विभिन्न सरकारों में आपराधिक मामलों में चार्जशीटशुदा लोग मन्त्री बने रहे हैं। सबसे बड़ा उदाहरण तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी जिसमें एक नहीं बल्कि तीन-तीन लोगों के खिलाफ सीबीआई ने ही ‘चार्जशीट’ दायर की हुई थी। ये श्री आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी व सुश्री उमा भारती थे, परन्तु फर्क सिर्फ यह था कि चार्जशीट भ्रष्टाचार के आरोपों में न होकर श्रीराम मन्दिर आन्दोलन के तहत अयोध्या का विवादित ढांचा ढहाने में भूमिका को लेकर थी। जाहिर तौर पर यह एक आन्दोलन से जुड़े मामले थे और नीतीश बाबू स्वयं उसी सरकार में एक कैबिनेट मन्त्री भी थे मगर इनका निजी वित्तीय ईमानदारी से कोई लेना-देना नहीं था, पूरा मामला राजनीतिक था लेकिन बिहार में जो फिलहाल संकट पैदा हो रहा है

वह निजी ईमानदारी को लेकर हो रहा है और सत्ता में रहते हुए अनुचित लाभ उठाने को लेकर हो रहा है अत: दोनों में मूलभूत अन्तर है, देखा जाये तो सुश्री उमा भारती अब भी केन्द्र सरकार में मन्त्री हैं और उन पर सीबीआई कहीं और नहीं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में ही मुकदमा चला रही है, मगर नीतीश बाबू का राजनीतिक जीवन अभी तक पूरी तरह बेदाग है और सार्वजनिक जीवन में उन्होंने शुचिता की मिसाल हर बार कायम की है। यह भी तथ्य है कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में लालू जी की पार्टी ‘राजद’ को भारी सफलता इस हकीकत के बावजूद मिली थी कि लालू जी को ही रांची की अदालत ने चारा घोटाला मामले में मुजरिम करार देते हुए उनके छह साल तक चुनाव लडऩे पर पाबन्दी लगा कर उन्हें सजा सुना दी थी, मगर लालू जी ने जमानत पर जेल से बाहर आकर अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार किया और नीतीश बाबू की पार्टी के साथ गठबन्धन करके चुनाव लड़ा और नीतीश बाबू को गठबन्धन का मुखिया बनाकर ही लड़ा।

लालू की भूमिका सक्रिय राजनीतिज्ञ होने के बावजूद ‘छायाÓ रूप में ही रही। अत: नीतीश बाबू नैतिक रूप से अपना सिर ऊंचा रखे रहे हालांकि तब वह अदालत द्वारा घोषित भ्रष्टाचार के मुजरिम के साथ गले मिलकर सार्वजनिक रूप से उसका समर्थन मांग रहे थे, मगर चुनाव जीतकर जो उन्होंने अपनी सरकार बनाई वह पूरी तरह बेदाग थी और इसी में लालू जी के दोनों नव युवा पुत्र शामिल किये गये मगर अब इन्हीं में से एक पर भ्रष्टाचार का शिकंजा कस गया है जिससे पूरी सरकार की छवि पर दाग लग गया है। राजनीति में ऐसे दाग कभी भी मुखर होकर पूरी सरकार की विश्वसनीयता को अधमरा कर देने में सक्षम होते हैं और सार्वजनिक तौर पर सन्देश देते हैं कि ‘कानून का राज कानून बनाने वाले ही नहीं मानते’ क्योंकि किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध यदि धन की हेराफेरी मामले में पुलिस रिपोर्ट दर्ज हो जाये तो उसे तुरन्त मुअत्तिल कर दिया जाता है। अत: बात बड़ी सीधी-सादी है कि तेजस्वी यादव को सार्वजनिक जीवन की उस मर्यादा का पालन करना चाहिए जिसे ‘लोकलज्जा’ कहा जाता है। बिना शक चुनावी राजनीति में ‘जन अदालतें’ ऐसे आरोपों तक को भी कभी-कभी हवा में उड़ा सकती हैं।

इसका उदाहरण भी खुद लालू जी ही हैं जिन्हें कानूनी अदालत ने तो दोषी करार दे दिया मगर जनता की अदालत में उनकी तूती इस कदर बोली कि उनकी पार्टी के सबसे ज्यादा विधायक चुन कर आये, मगर वह कानून की जद में तो आज भी हैं, साथ ही लालू जी को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि मीडिया के साथ दुव्र्यवहार करने या इससे लड़-झगड़ कर वह अपनी कमजोरी का ही परिचय दे रहे हैं। पिछली बार मैंने इसी विषय पर सम्पादकीय लिख डाला था और सिद्ध कर रहे हैं कि कानूनी नुक्ते से उनका खजाना खाली हो चुका है वरना सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग बुरे से बुरे वक्त में भी मीडिया की सवालों की क्षुधा को शान्त करने से नहीं घबराते बल्कि उल्टे मीडिया के लिए ही कुछ नये सवाल छोड़ देते हैं। एक उदाहरण अटल बिहारी वाजपेयी का देता हूं। इमरजेंसी के बाद जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि विपक्ष के सभी नेताओं के जेल में बन्द हो जाने के बावजूद क्यों नहीं जनता उठ कर खड़ी हुई, तो श्री वाजपेयी ने उत्तर दिया कि मैं यहां सवालों का जवाब देने नहीं आया हूं बल्कि ‘हमला’ करने आया हूं कि क्यों पत्रकार जगत सत्ता के आगे घुटने टेक कर चिरौरियां करने लगा!

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