लालू : असली सड़क छाप गुंडई


बिहार के नेता एक जमाने में अपनी मीठी भोजपुरी, मगधी और मैथिली बोली के लिए जाने जाते थे। आज वहां लालू प्रसाद जैसे नेता हो रहे हैं जो अपनी बोली और व्यवहार में किसी सड़क छाप गुंडे की तरह पेश आ रहे हैं। लालू यादव ने आज देश की राजधानी की धरती पर दो वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकारों के साथ जैसा व्यवहार किया है उससे समूचा बिहार ही शर्म से लाल हो गया है। यह सनद रहनी चाहिए कि बिहार में एक ऐसा भूतपूर्व मुख्यमन्त्री भी है जो पत्रकार से यह कहने की जुर्रत कर सकता है कि वह उससे सवाल पूछने के बजाय अपने बाप से पूछे। यह भी इतिहास में दर्ज हो जाना चाहिए कि लालू देश के ऐसे एकमात्र राजनीतिज्ञ हैं जो किसी पत्रकार को घूंसे से मारकर जमीन पर नचा सकते हैं। जरा सवाल पूछने पर लालू जी इतना आपे से बाहर हो गये कि वह यह तक भूल बैठे कि हिन्दोस्तान की अदालत ने ही उन्हें चारा घोटाले का मुजरिम साबित किया हुआ है और वह जमानत पर जेल से बाहर हैं। हकीकत यह है कि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो चुका है। इसके बावजूद वह बिहार में अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के सत्ता में शामिल होने की वजह से इतने गरूर में हैं कि अपने परिवार के सदस्यों के कथित भ्रष्टाचार के बारे में पूछे गये सवालों का जवाब देने की बजाय उल्टे पत्रकारों को ही धमकाने की हिमाकत कर रहे हैं। जब ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक हो चुके हैं कि उनके एक बेटे ने बिहार का मन्त्री रहते खुद को बेरोजगार बताकर पेट्रोल पंप लिया और दूसरे ने पटना में एक मॉल बनवाने में घपलेबाजी की और उनकी एक बेटी ने बेनामी जमीनों के सौदे दिल्ली तक में किये जबकि दूसरी को उनके ही घर में काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों ने लाखों रुपए मूल्य की जमीनें भेंट की तो लालू जी को इन दस्तावेजों के गलत होने की कैफियत बयान करनी चाहिए थी मगर उन्होंने ऐसा करने की बजाय पत्रकारों से उल्टे पूछा कि क्या तुम अदालत हो? शायद लालू जी को भारत के लोकतन्त्र की तासीर नहीं मालूम है।

यह तो वह महान लोकतन्त्र है जिसमें यदि एक बार कोई नेता उठाईगीरा साबित हो गया तो फिर कई पुश्तों तक उसके नाम के साथ यह तमगा लगा रहता है। यह बिहार का दुर्भाग्य रहा कि पिछले नब्बे के दशक में मंडल आयोग की वजह से वहां की राजनीति जातिपरक हो गई और लालू जैसे नेताओं की लाटरी इसके बूते पर निकल गई वरना यह तो वह राज्य था जिसके कुशल प्रशासन के लिए कभी कृष्ण सिंह से लेकर के.बी. सहाय जाने जाते थे और सामाजिक समरसता के लिए कर्पूरी ठाकुर जैसे कद्दावर नेताओं का सिक्का चलता था। यही वह राज्य था जहां से इस राज्य के निवासी मधु लिमये से लेकर जार्ज फर्नांडीज तक को जिताया करते थे। राजनीति के ये स्तम्भ विपरीत परिस्थितियों तक में अपना संयम नहीं खोते थे मगर क्या सितम हुआ कि लालू जी एक सड़क छाप गुंडे की तरह थोड़े से तीखे सवालों पर ही ऐसा व्यवहार करने लगे। टीवी पर जिन लोगों ने भी लालू जी के उन शब्दों को सुना है और उनके डांट-डपट व धमकी देने के तेवर देखे हैं उनके मन में यह सवाल उठना वाजिब है कि क्या यही व्यक्ति कभी बिहार का शासन चलाया करता था? मगर इससे इतना लाभ जरूर हुआ है कि पूरे देश की जनता में समझ आ गया है कि लालू जी व उनकी पत्नी के मुख्यमन्त्रित्व काल के शासन को जंगल राज क्यों कहा जाता था। जंगल राज का इससे पुख्ता प्रमाण दूसरा नहीं मिल सकता। अगर राज्यों में सभी क्षेत्रीय नेता लालू जी की तरह होने लगे तो अराजकता को भारत में लाना असंभव नहीं होगा क्योंकि केवल अराजक तत्व ही मीडिया से भागने की फिराक में रहते हैं। लोकतन्त्र में तो सार्वजनिक जीवन में आये प्रत्येक व्यक्ति की पहली जिम्मेदारी यही होती है कि वह अपनी विश्वसनीयता पर उठे सवालों के जवाब देने के लिए हमेशा तत्पर रहे मगर क्या कयामत बरपा कर रहे थे लालू जी पत्रकारों को डांटते हुए और उनसे झगड़ते हुए कि उन पर ही आरोप लगा रहे थे कि उन्होंने मोदी से सुपारी ली हुई है।

स्वतन्त्र पत्रकारिता की तौहीन करने की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है मगर लालू जी को विचार करना चाहिए कि भारत के गांवों में यह कहावत क्यों प्रचलित है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि। इसका सबब यहां की लोक मान्यताओं में आसानी से ढूंढा जा सकता है। इसलिए लालू जी को इस हकीकत का इल्म होना चाहिए कि उनकी जोकरी करने की राजनीति के दिन समाप्त हो चुके हैं। पत्रकारों के साथ चुटकलेबाजी में प्रश्नों के उत्तर देने के दिन हवा होना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने अपने अमाल से साबित कर दिया है कि राजनीति उनके लिए जनता की सेवा करने का जरिया नहीं बल्कि अपने खानदान को मालदार बनाने का मौका है। संयम वही व्यक्ति खो सकता है जिसे अपने झूठ पकड़े जाने का डर हो। लालू जी को याद दिला दूं कि जब 70 के दशक के अन्त में स्व. कर्पूरी ठाकुर पर एक नेपाली लड़की के साथ अनुचित सम्बन्ध रखने का आरोप लगा था तो उनसे दिल्ली में पत्रकारों ने बहुत तीखे सवाल पूछे थे। कर्पूरी बाबू मुस्कराते कहते रहे थे कि आप के सभी सवाल वाजिब हो सकते हैं मगर मेरे नजरिये से इनमें से किसी में भी सच का अंश नहीं है मगर कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े नेता थे। वह जातिगत आधार पर वोट बैंक के जरिये नेता नहीं बने थे बल्कि सिद्धान्तों के बूते पर ‘दीनबन्धु’ बने थे मगर लालू जी ने तो सड़क छाप तेवर अपनाकर सिद्ध कर दिया कि उनमें बड़प्पन तो क्या उसका अंश मात्र भी छूकर नहीं गया है। मुझे हैरानी है कि गांवों के नाम की राजनीति में कमाई करने वाले लालू जी को रहीम का यह दोहा तक याद नहीं रहा,
”छिमा बडऩ को चाहिए छोटन को उत्पात
का रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात।”
दिल्ली के हवाई अड्डे और संसद में तो स्वयं लालू जी लात मारने को तैयार थे। इसलिए दूध का दूध और पानी का पानी हो गया।

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