भीड़तंत्र और कानून


उत्तर प्रदेश के आगरा में भाजपा नेता की हत्या के बाद भीड़ ने ही दो हमलावरों में से एक को पीट-पीटकर मार डाला। ऐसी घटनाएं देशभर में लगातार हो रही हैं। सभ्य समाज में किसी की भी हत्या किया जाना असहनीय है लेकिन जिस तरह से भीड़तंत्र ने कानून को हाथ में लेकर हमलावर को पुलिस के हवाले करने की बजाय उसे ही पीट-पीटकर मार डाला जो कि इस बात का प्रमाण है कि देश भीड़तंत्र में बदल रहा है। पहले झारखंड में बच्चा चोरी की अफवाहों के चलते क्रुद्ध भीड़ ने 6 लोगों को पीट-पीटकर मार डाला था। यह कहां का न्याय है। हत्या का शिकार कोई एक समाज या धर्म का व्यक्ति नहीं होता बल्कि सभी समुदायों के लोग इसका शिकार हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि अपराधियों और अराजक तत्वों को पुलिस की खाकी वर्दी का कोई खौफ नहीं है। जिस तरह से सीतापुर में बिजनेसमैन के परिवार के 3 सदस्यों की घर की पार्किंग में घुस कर हत्या की गई और जिस तरह से हरियाणा के जींद में सरेराह एक युवक की हत्या की गई उससे स्पष्ट हो जाता है कि शातिर अपराधियों को कानून से कोई डर नहीं लगता। कानून के दुश्मनों के निशाने पर पुलिस वाले भी आ गए हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर होहल्ला मचाया जा रहा है लेकिन कानून व्यवस्था की बदतर हालत तो अन्य कई राज्यों में है।

कहते हैं भीड़ पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। वह आजाद है, कहीं-कहीं उसे संरक्षण मिला हुआ है तो कहीं वह कानून को धत्ता बताते हुए मनमानी करती है। अब उस भीड़ की एक पहचान बन गई है, भले ही उसने कोई भी चोला पहन रखा हो। भीड़ इकट्ठी होती है, किसी को भी मार डालती है। गौरक्षा के नाम पर भीड़ संस्कृति बचाने का ठेका ले लेती है। इनके सामने सभी दलीलें और बातें धरी की धरी रह जाती हैं। भले ही वैध तरीके से पशु खरीदे गए हों, भीड़ कुछ भी मानने को तैयार नहीं होती। उत्तर प्रदेश के एंटी रोमियो स्क्वायड के संबंध में एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन में जो कुछ सामने आया है उससे तो यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि एंटी रोमियो स्क्वायड पुलिस चला रही है या उसने कुछ शोहदों के हाथ में कानून पकड़वा दिया है जो किसी भी दम्पति को रोक कर उनकी पहचान पूछते हैं और उन्हें शर्मिंदा करते हैं। एंटी रोमियो स्क्वायड के नाम पर शोहदे उनसे पैसे हथिया लेते हैं और चेतावनी देकर भगा देते हैं। जिस तरह से भीड़तंत्र का सिलसिला शुरू हुआ उससे तो लगता है कि एक दिन हम सब इसकी जद में होंगे। जब एक पुलिस वाला किसी को भी झूठे केस में फंसाने की तरकीबें स्टिंग आपरेशन में बताएगा कि तीन लाख में किसी को भी कम से कम 5 साल की सजा का प्रबंध किया जा सकता है तो फिर पुलिस वालों का खौफ कहां बचेगा। किसी भी राज्य में अपराधों का ग्राफ तब बढ़ता है जब अपराधियों और पुलिस में सांठगांठ हो जाए। पुलिस का राजनीतिकरण भी एक बड़ी वजह है।

अपराधियों पर नकेल कसना पुलिस का काम है लेकिन जब लोग किसी न किसी विचारधारा से जुड़कर अपनी सेनाएं बना लें, कोई भीम सेना बना ले तो कोई रावण सेना, कोई अपना ही रक्षक दल बना ले, अल्पसंख्यकों की अपनी सेना गठित हो जाए और बहुसंख्यक अपनी सेना बना लें तो फिर देश में अराजकता ही फैलेगी। टकराव भयंकर होता जाएगा। सहारनपुर के दंगे इस बात का प्रमाण हैं कि ये सेनाएं कैसे समाज में विष घोल रही हैं। भीड़तंत्र भेड़तंत्र में बदलता जा रहा है। इस लिहाज से पुलिस को अधिक चुस्त होना पड़ेगा। अगर कानून की रक्षा करने वाले लोग ही अपराधियों से हारने लगेंगे तो फिर देश के सामान्य नागरिकों का क्या होगा? देश बदल रहा है, हम इसे देख भी रहे हैं। एक ऐसा परिवर्तन जिसमें अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं और भीड़ खुद फैसला करने लगी है। सत्ता के करीबी और सत्ता के विरोधी हजारों तर्क देंगे, हजारों बातें करेंगे लेकिन यह दिशा ठीक नहीं है। जब समाज में ऐसा होगा तो तपिश सभी को महसूस होगी।

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