मोदी की इस्राइल यात्रा


इस्राइल से भारत के सम्बन्ध ऐतिहासिक रूप से खट्टे-मीठे रहे हैं क्योंकि इस देश का निर्माण पाकिस्तान की तर्ज पर ही मजहब के आधार पर हुआ था मगर भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने सैद्धांतिक मतभेद होने के बावजूद 1950 में इसे मान्यता प्रदान करके 1953 में मुम्बई में इसका वाणिज्य कार्यालय खोलने की इजाजत दे दी थी परन्तु 1992 तक इसके साथ भारत ने पूर्ण राजनयिक सम्बन्ध बीच में (1977 से 1980) गैर कांग्रेसी जनता पार्टी सरकार के काबिज होने के बावजूद नहीं बनाये। हालांकि इस दौरान देश के विदेश मन्त्री की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी ने इस्राइल के रक्षामन्त्री मोशे दायां को गोपनीय तरीके से भारत आने की इजाजत दे दी थी मगर उन्हें दिल्ली हवाई अड्डे को छूकर ही बैरंग वापस लौटना पड़ा था।

यह भी इतिहास का विरोधाभास ही कहा जायेगा कि इस्राइल के साथ पूर्ण राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने का काम कांग्रेसी राज में ही 1992 में स्व. पी.वी. नरसिम्हा राव ने किया। इसके बाद से दोनों देशों के बीच सम्बन्ध धीरे-धीरे प्रगाढ़ होने लगे और कालान्तर में केन्द्र में गैर कांग्रेसी या भाजपानीत एनडीए की सरकार के काबिज रहते 1997 में इसके राष्ट्रपति एजर वीजमैन ने व 2003 में इसके प्रधानमन्त्री एरियल शेरोन ने भारत की यात्रा की मगर 2000 में विदेश मन्त्री की हैसियत से जसवन्त सिंह ने इस्राइल जाकर दोनों देशों के बीच आतंकवाद के विरोध में सहयोग करने की शुरूआत की और सूचना के क्षेत्र में आपसी मेलजोल बढ़ाया। इसके बाद से दोनों देशों के बीच रक्षा सामग्री के क्षेत्र में सम्बन्ध इस प्रकार स्थापित हुए कि आज भारत इस्राइल से रक्षा उपकरण खरीदने वाला दुनिया का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा देश है। दरअसल इस्राइल की उस पुरानी छवि में परिवर्तन आया है कि वह एशिया में अरब देशों के खिलाफ खड़ा किया गया जंगी जहाज है। भारत का समर्थन मूल रूप से उस फिलीस्तीन को रहा जिससे काट कर इस्राइल का निर्माण 1948 के शुरू में किया गया था। फिलीस्तीन के साथ इसका समझौता हो जाने के बाद भारत के नजरिये में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन आया और दुनिया में शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए इससे हाथ मिलाने की तरफ बढऩा शुरू किया मगर पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवाद के भारत में बढऩे के बाद से इस देश के साथ भारत के सम्बन्ध मजबूत होते गये।

इसकी वजह भी रही कि इस्राइल ने खुद आतंकवाद का जमकर मुकाबला किया था परन्तु भारत को अरब की इस्लामी दुनिया के साथ भी अपने मजबूत सम्बन्धों को देखते हुए अपने आर्थिक हितों की रक्षा करनी थी क्योंकि इन सभी देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक तौर पर सांस्कृतिक रिश्ते थे मगर भारत को तब धक्का लगा जब पाकिस्तान की शह पर भारत को इस्लामी संगठन (ओआईसी) से दूर रखा गया जबकि इन देशों में भारत के लाखों नागरिक प्रवासी के तौर पर निवास करते थे और विदेशी मुद्रा की जरूरत में योगदान करते थे। इससे भारत का वह भ्रम टूट गया कि उसे इस्राइल के विरुद्ध इस्लामी देशों के पक्ष में खड़ा हुआ नजर आना ही चाहिए जबकि 1967 में इस्राइल व अरब देशों के बीच हुए जबर्दस्त संघर्ष में भारत की सहानुभूति अरब देशों के साथ ही थी। इस युद्ध में अकेले इस्राइल ने अरब दुनिया को परास्त करके अपना लोहा मनवाया था लेकिन अब यह सब इतिहास बनकर रह गया है क्योंकि 1992 से लेकर अब तक दोनों देशों के सम्बन्धों की गर्माहट में 25 जाड़े निकल चुके हैं और हमने आधुनिक टैक्नोलोजी के हथियारों की सप्लाई के लिए इस्राइल की पहचान कर ली है मगर केवल रक्षा क्षेत्र के सहयोग की ही बात नहीं है क्योंकि इस्राइल ने अपना विकास विकट विपरीत परिस्थितियों में इस प्रकार किया है कि यह कृषि से लेकर विज्ञान तक के क्षेत्र में लगातार तरक्की कर रहा है। भारत के साथ यह सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के लिए शुरू से ही इस कदर आतुर रहा कि जब हमारे राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी 2015 में इस्राइल यात्रा पर गये तो उनसे इस देश ने अपनी संसद ‘नैसे’ को सम्बोधित कराया। गृहमन्त्री राजनाथ सिंह ने जब इस्राइल यात्रा की तो वह केवल इस्राइल ही गये जिससे यह सन्देश चला गया कि केन्द्र की मोदी सरकार आपसी सम्बन्धों को नया आयाम देना चाहती है। अब प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इस्राइल यात्रा पर हैं और वह भी केवल इसी देश में रहेंगे और दोनों देशों के बीच आपसी सम्बन्धों का नया चरण शुरू करेंगे।

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