नाग-ए-कश्मीर : फन कुचल डालो


यह सच्चाई हर कोई जानता है कि अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रैंस के नाग जम्मू-कश्मीर में विध्वंसक कार्रवाइयों के लिए पाकिस्तान से पैसे लेते हैं। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन के बाद राष्ट्रीय जांच एजैंसी एनआईए ने जांच शुरू की। अब यह खुलासा किया जा रहा है कि हुर्रियत नेताओं ने एनआईए की पूछताछ में इस बात को कबूल किया है कि हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी पाकिस्तान की आईएसआई और लश्कर से पैसे लेते हैं। यह खुलासा कोई चौंकाने वाला नहीं है। यह भी सभी जानते हैं कि कश्मीर में स्कूली बच्चों से लेकर कालेज छात्रों तक और बेरोजगार युवाओं को इसी पैसे के बल पर दिहाड़ीदार पत्थरबाज बना डाला है और कश्मीर की हसीन वादियों में जहर घोला जा रहा है। अगर हम अतीत का सर्वेक्षण करें तो यह बात हर कोई जानता है कि 90 के दशक में जब वादी में आतंकवाद पूरे जुनून पर था तो अन्य क्षेत्रों के साथ शिक्षा पर भी उसने भयानक असर डाला और देखते ही देखते शिक्षित और शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं के हाथों में कलम की जगह ग्रेनेड और पिस्तौल थमा दिए गए। हर दिन गुजरने के साथ मासूम युवाओं के कब्रिस्तान सज गए, जिन्हें देखकर हर इंसान खून के आंसू रोने को मजबूर हुआ। वक्त गुजरता गया, कुछ वर्षों के लिए गाड़ी पटरी पर आई तो हुर्रियत के नागों ने फिर अपना खेल खेला। आज राष्ट्र के हर शख्स को पूर्ववर्ती सरकारों और खासकर कांग्रेस से पूछने का अधिकार है कि जिन सांपों को आपने कश्मीर में दूध पिलाया, जिन सांपों को आपने सुरक्षा कवच दिया, उन्होंने तुम्हें डसने के अलावा कुछ नहीं किया।

भारत की सरकारें हर साल करोड़ों रुपया जम्मू-कश्मीर पर खर्च करती रहीं, जिस धन का कोई हिसाब-किताब नहीं और सरकारें वहां एकता और अखंडता का दिवास्वप्न देखती रहीं और उम्मीद लगाए बैठी रहीं कि शायद नागों की निष्ठा बदल जाए। सारे स्वप्न धरे के धरे रह गए। जिन लोगों की जगह जेलों में होनी चाहिए थी, वे स्वतंत्र घूमते रहे। सारी घाटी को उतना विषाक्त आज किसी ओर ने नहीं किया जितना आंतरिक षड्यंत्रों ने। सबसे ज्यादा फायदा तो खुद को कुलजमाती कहने वाले हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं ने उठाया। कश्मीर में अशांति बनी रहे इसलिए पाकिस्तान और कुछ अरब देश इन्हें लगातार धन भेजते रहे। इन लोगों ने देश-विदेश में अपनी सम्पत्तियां खड़ी कर लीं और घाटी के निर्दोष युवाओं को बहकाने में लगे रहे। एक पत्थरबाज को जीप से क्या बांधा कि मानवाधिकारों की दुहाई देने लगे। हुर्रियत नेताओं ने स्वीकारा है कि करोड़ों रुपए की फंडिंग हाफिज सईद के माध्यम से हो रही है, स्कूल-कालेज फुंकवाए गए, सेना पर पत्थरबाजी करवाई जा रही है और बैंक लूटे जा रहे हैं। यह वही गिलानी है जो घाटी स्थित अपने घर के बाहर एक दीवार पर ‘गो इंडिया गो बैक’ लिखते नजर आए थे। यह वही गिलानी है कि बीते साल बीमार बेटी से सऊदी अरब मिलने जाने के लिए उन्हें पासपोर्ट की जरूरत थी, वह पासपोर्ट के कालम में खुद को भारतीय बताने पर शर्म महसूस कर रहे थे। जब पासपोर्ट न मिलता दिखा तो मजबूरन खुद को भारतीय बताया। जैसे ही पासपोर्ट मिल गया, उसके बाद तुरन्त पलट गए और कहा कि मैं भारतीय नहीं हूं। पाकिस्तान ने अपने आजादी दिवस पर आजादी ट्रेन चलाई थी, इस पर गिलानी ने ट्वीट कर खुशी व्यक्त की थी।

एनआईए की जांच किस मुकाम तक पहुंची है और वह किस हद तक हुर्रियत के नागों पर किस तरह से कानूनी शिकंजा कसती है, यह देखना बाकी है लेकिन मोदी सरकार के कठोर रुख को देखते हुए लगता है कि हुर्रियत नेताओं की दुकानें बंद होने वाली हैं। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर साफ कर दिया है कि वह संविधान में विश्वास नहीं रखने वाले किसी समूह या नेता से बातचीत नहीं करेगी। केन्द्र सरकार हुर्रियत को महत्वहीन बना चुकी है। पाकिस्तान के दलाल नंगे हो चुके हैं। इस बात पर गौर कीजिए कि कश्मीर के अलगाववादियों पर हो रहे खर्च का ज्यादातर हिस्सा केन्द्र सरकार उठाती रही है। 90 फीसदी हिस्सा केन्द्र तो जम्मू-कश्मीर सरकार सिर्फ दस फीसदी खर्चा ही उठाती है। राज्य सरकार के मुताबिक पिछले पांच साल में 309 करोड़ तो सिर्फ अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में लगे जवानों पर खर्च किए गए। साल 2010 से 2016 तक 150 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। पांच साल में इन पर 506 करोड़ का खर्चा आया है जो कि जम्मू-कश्मीर के स्टेट बजट से भी ज्यादा है जबकि सूबे का बजट 484.42 करोड़ है। ऐसे में सवाल तो उठेगा ही कि क्या जलते कश्मीर में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले इन अलगाववादियों को केन्द्र सरकार ने ही छूट दे रखी है जबकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह कई बार कह चुके हैं कि हुर्रियत नेता जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत के खिलाफ हैं। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा सरकार का एजैंडा कुछ भी हो लेकिन राष्ट्र चाहता है कि हुर्रियत के नागों को जेल में बंद कर कड़ी सजा सुनाई जाए, इनकी फंडिंग के सारे रास्ते बंद किए जाएं। ज्यादा से ज्यादा दक्षिण कश्मीर के तीन-चार जिलों में इनके समर्थक थोड़ी बहुत अशांति फैलाएंगे जिनको नियंत्रित करना मुश्किल नहीं होगा। हुर्रियत के नाग निपट गए तो कश्मीर पटरी पर लौट आएगा।

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