गौहत्या पर राष्ट्रव्यापी रोक!


केन्द्र की मोदी सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके पूरे देश में पशुओं के वध पर प्रतिबन्ध लगाने का फैसला किया है। इनमें गौवंश के सभी पशुओं के साथ ही दुधारू भैंस व ऊंट भी शामिल हैं। सरकार ने यह आदेश पशुओं के प्रति निर्दयता समाप्त करने के कानून के तहत किया है। यह कानून संविधान की समवर्ती सूची में आता है जिसे देखते हुए केन्द्र कानून बना सकता है। इसकी अनुपालना को लेकर कुछ राज्य सरकारों को इस वजह से ऐतराज है क्योंकि पशुधन पालन राज्यों की सूची का विषय है जो कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। एक जमाना वह भी था जब राज्यों में पृथक पशुपालन मन्त्रालय तक हुआ करता था। सरकार के नये आदेश के तहत अब इन चुनीन्दा पशुओं को वध करने के लिए खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। इन्हें केवल दुग्ध उत्पादन अथवा माल परिवहन के कारोबार हेतु ही खरीदा-बेचा जा सकता है, विशेषकर ऊंट के सन्दर्भ में। अक्सर यह दुहाई दी जाती रही है कि गौहत्या पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबन्ध लगाने का केन्द्र को अधिकार नहीं है क्योंकि यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र कृषि के अन्तर्गत आता है मगर केन्द्र सरकार ने इसका रास्ता निकाला है और गौकशी पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा कर दी है लेकिन संविधान के अनुसार पशुधन के संरक्षण और निस्तारण के सन्दर्भ में राज्यों को भी अलग-अलग कानून बनाने का अधिकार है।

जिन राज्यों को केन्द्र के अनुदेश पर आपत्ति है वे अपना अलग कानून बना सकते हैं मगर इसके लिए राष्ट्रपति की अंतिम स्वीकृति जरूरी होगी। इसका मतलब सीधे तौर पर यह है कि राज्य अपने प्रदेश की परिस्थितियों के अनुसार अपनी विधानसभा में अपना कानून बनाकर उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजेंगे मगर इसका प्रभाव विभिन्न राज्यों में चल रहे वैध बूचडख़ानों पर नहीं पड़ेगा। इनमें अनुदेशित पशुओं के अलावा अन्य चिन्हित पशुओं का वध जारी रहेगा। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि केन्द्र की अधिसूचना में साफ कर दिया गया है कि चुनीन्दा पशुओं का वध किसी धार्मिक परंपरा या रवायत की वजह से भी नहीं किया जा सकता है। भारत के आधे से अधिक राज्यों में पहले से ही गौहत्या पर प्रतिबन्ध वहां की राज्य सरकारों ने लगाया हुआ है मगर कुछ राज्यों में इसकी अनुमति है। अक्सर गौहत्या पर राजनीति गर्मा जाती है और कथित धर्मनिरपेक्ष दल आरोप लगाते हैं कि यह जनसंघ या भाजपा का हिन्दूवादी एजेंडा है जबकि वास्तविकता में यह भारत की मान्यता का प्रश्न है। केन्द्र के नये अनुदेश को भी कुछ पार्टियों ने साम्प्रदायिक एजेंडे की पूर्ति के लिए उठाया गया कदम ही कहा है और इसे भारत के संघीय ढांचे पर आघात करने वाला बताया है। इसमें भी सच नहीं है क्योंकि नई अधिसूचना के बावजूद राज्यों के पास यह हक सुरक्षित रहेगा कि वे अपना अलग से कानून बना सकते हैं। इस मुद्दे पर यदि राजनीति होती है तो उससे सत्ताधारी दल भाजपा भी नहीं बच सकता क्योंकि उत्तर पूर्वी राज्यों और गोवा में गौवध पर प्रतिबन्ध नहीं है। इनमें से अधिक स्थानों पर भाजपा की ही सरकारें हैं। यदि यहां की सरकारें केन्द्र के आदेश की अनुपालना करने में दिक्कत महसूस करती हैं तो हिम्मत करके उन्हें अपना नया कानून बनाना होगा।

केरल भी ऐसा ही राज्य है जहां वामपंथियों का शासन है। इस राज्य के मुख्यमन्त्री पी. विजयन ने केन्द्र के इस कदम की तीखी आलोचना की है और इसके खाद्यमन्त्री ने इस कदम को गैरतार्किक और समय से पीछे ले जाने वाला बताया है। उनका कहना है कि टैक्नोलोजी परिवर्तन के इस दौर में खेती के तौर-तरीके बदल रहे हैं और परिवहन के तरीके भी बदल गये हैं। यह तर्क स्वयं में अपूर्ण है क्योंकि किसी भी दौर में मानवीयता के तौर-तरीके नहीं बदलते हैं, इसी वजह से तो सबसे पहले पशुओं पर निर्ममता न करने का आन्दोलन उन देशों में ही चला जिन्हें हमें आधुनिक या विकसित देश अर्थात यूरोपीय देश कहते हैं। यह कहां की मानवता है कि पशु के जवान व दुधारू रहने तक हम उसका दूध पीते रहें और जब वह बूढ़ा हो जाये तो मार कर खा जायें। इसी प्रकार ऊंट की टांगों में दम रहने तक उसका उपयोग जमकर परिवहन के लिए करें और बूढ़ा होने पर उसे खुद ही समाप्त कर दें। जहां तक गौवंश का सवाल है तो इसका प्रत्येक सदस्य भारतीयों के लिए पूज्य है। वृष या बिजार की भारतीय नन्दी रूप में पूजा करते हैं। गौपुत्र को इस रूप में स्वछन्द विचरण करने की मान्यता गौवंश वृद्धि को ही समर्पित रहती है। प्रकृति को पूजने वाले भारत देश की यही विशेषता है कि इसके ऋषि-मुनियों ने सदियों पहले पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला रख दी थी वरना यह देश क्यों सदियों से नदियों से लेकर पहाड़ों और पशु-पक्षियों से लेकर पेड़ों तक को पूजता आ रहा है?

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