सलाहुद्दीन नहीं पाक भी आतंकी


पाक अधिकृत कश्मीर से दहशतगर्दी को अंजाम देने वाले हिजबुल मुजाहिद्दीन के सरपरस्त सैयद सलाहुद्दीन को अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करके अमरीका ने भारत के इस रुख का परोक्ष रूप से समर्थन किया है कि कश्मीर की तथाकथित आजादी का सशस्त्र आंदोलन चलाने वाली यह तंजीम आतंकवाद का ही चेहरा है। यह असलियत है कि हिजबुल मुजाहिद्दीन की स्थापना 1989 में उग्रवादी मुस्लिम संस्था जमाते इस्लामी के ही कुछ कारकुनों ने की थी। यह वही जमाते इस्लामी है जिसने बंगलादेश में भी कट्टरपंथ को हवा दी थी और मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में स्थापित इस देश को सैनिक शासन के दौरान इस्लामी मुल्क घोषित करने में मदद की थी मगर यह भी हकीकत है कि पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई ने ही हिजबुल को खड़ा करने के लिए इसके सदस्यों को दहशतगर्दी का पाठ पढ़ाने से लेकर वित्तीय मदद मुहैया कराई। इसका खुलासा नामवर लेखक ‘एमएन मर्फी’ ने अपनी किताब ‘दि मेकिंग आफ  टैरेरिज्म इन पाकिस्तान’ में बखूबी किया है।

अत: स्पष्ट है कि सलाहुद्दीन उस पाकिस्तान की सरपरस्ती में हमारे कश्मीर में उस दहशतगर्दी को पनाह दे रहा है जिसे दुनिया से खत्म करने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान को ही अपना सहयोगी बनाया हुआ है। ऐसा नहीं कि अकेले भारत ही हिजबुल को आतंकवादी संगठन  मानता हो, बल्कि  पूरा यूरोप व अमरीका भी इसे एक दहशतगर्द तंजीम मानता है। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि अमरीका ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वाशिंगटन पहुंचने पर ही इसके सरगना सलाहुद्दीन की एक आतंकवादी के रूप में क्यों गिनती की और इसका मतलब क्या निकलता है? अमरीका इससे पहले भी पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हाफिज सईद और दाऊद इब्राहिम को अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर चुका है। हाफिज सईद पर तो उसने दस लाख डालर का ईनाम भी घोषित कर रखा है। इसके बावजूद यह शख्स पाकिस्तान में जलसे कर-करके भारत ही नहीं अमरीका के खिलाफ  भी जहर उगलता रहता है और उसका संगठन ‘जमात-उद-दावा’  खैरात का शबाब हासिल करने वाला माना जाता है जबकि हकीकत यह है कि 2008 में मुम्बई पर हमला होने के बाद ही भारत ने राष्ट्रसंघ में साफ  कर दिया था कि जमात-उद-दावा और कुछ नहीं बल्कि दहशतगर्द तंजीम ‘लश्करे तैयबा’  का ही बदला हुआ नाम है, जिसे अमरीका ने गहशतगर्द तंजीम करार दिया हुआ था। अत: पाठकों की समझ में अब आ जाना चाहिए कि मैं क्या कहना चाहता हूं।

मैं अर्ज करना चाहता हूं कि जब पाकिस्तान के खिलाफ  दहशतगर्दी में शामिल होने के पक्के सबूत अमरीका के पास हैं तो वह इस मुल्क को आतंकवादी देश घोषित करने से क्यों हिचक रहा है बल्कि उलटे वह इसे फौजी इमदाद मौके-बेमौके लगातार फराहम करा रहा है। भारत यह काम खुद इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह खुद स्वीकार कर चुका है कि दहशतगर्दी से अकेले वही नहीं बल्कि उसका पड़ोसी वह पाकिस्तान भी गमजदा है जहां से उसके खिलाफ  ही आतंकवाद को अंजाम दिया जाता है। यह शुभ कार्य 2009 जुलाई महीने में हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने सऊदी अरब के शहर शर्म अल शेख में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ  रजा गिलानी के साथ एक संयुक्त वक्तव्य जारी करके किया था मगर अमरीका पर यह जिम्मेदारी इसके वावजूद रहती है कि वह पाकिस्तान की सरपरस्ती में रह रहे जिन लोगों को भी आतंकवादी घोषित कर रहा है, उन्हें पकड़ कर कानून के हवाले करने को पाकिस्तान की सरकार से कहे मगर इसमें भी पेंच है। प्रत्येक स्वयंभू देश को यह अधिकार है कि वह अपने बाशिन्दों को अपनी नजर से देखे और अपने कानून के तहत उनसे निपटे। इसलिए जाहिर तौर पर यह साफ है कि अमरीका भारत और पाकिस्तान दोनों को ही अपनी बगल में रखना चाहता है।

हम भारतीय उपमहाद्वीप को जंग और खून-खराबे का अखाड़ा किसी हालत में नहीं बना सकते। अफगानिस्तान में पिछले दो दशकों से पाकिस्तान में पलने वाले दहशतगर्द तालिबानी अंदाज में जो काम कर रहे हैं, उसने चीन को भी पाकिस्तान के रास्ते से इसमें शरीक कर लिया है। संवैधानिक तौर पर हमारे ही कश्मीर (पाक अधिकृत कश्मीर) से तिजारती कारीडोर बनाने वाले चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान के साथ हमारे सीधे सड़क मार्ग में भारी अवरोध पैदा कर दिया है जिसकी वजह से हमने हवाई कारीडोर का राब्ता कायम किया है। यह काम हमने अपनी ताकत के बूते पर किया है और चीन व पाकिस्तान दोनों को ही सबक सिखाने के लिए किया है मगर हमें सबसे ज्यादा सावधानी  अफगानिस्तान के मोर्चे पर ही बरतनी होगी। अमरीका ने हमसे इस मोर्चे पर सहयोग की दरकार की है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाशिंगटन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बातचीत में इसे स्वीकृति भी प्रदान कर दी है मगर दूरंदेशी यह दिखाई है कि इस मोर्चे पर भारत सैनिक सहयोग से दूर ही रहेगा। अफगानिस्तान के विकास में भारत पिछले दशक से ही मदद कर रहा है किन्तु इस मुल्क में जिस तरह अमरीका समेत नाटो देशों की रणनीति रही है, वह पाकिस्तान के हित में ज्यादा  रही है। यही वजह है कि आज भी इस देश का तीस प्रतिशत इलाका तालिबानी कब्जे में है। इसके साथ ही चीन भी इस इलाके में अब जोर-आजमाइश में लग गया है।

यही वजह है कि इसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच विवाद निपटाने हेतु मध्यस्थता तक करने की पेशकश कर डाली है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि हम वह ‘भारत’ हैं जिसकी हदों को तोड़ते हुए चीन ने 1962 में अपनी सेनाएं असम के तेजपुर तक भेज दी थीं मगर बाद में अन्तर्राष्ट्रीय दबाव पडऩे पर उसने अपनी सेनाएं वापस अपनी हदों में महदूद कर दी थीं। ऐसा केवल भारत की साख के चलते ही संभव हो पाया था हालांकि चीन ने हमारा हजारों वर्ग किलोमीटर सीमान्त पर्वतीय भू-भाग अपने कब्जे में ले लिया था मगर बकौल हमारे आज के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के 2006 में बतौर रक्षामंत्री के बीजिंग की धरती पर खड़े होकर ही दिए गए इस ऐतिहासिक बयान को चीन नहीं भूल सकता कि ‘आज का भारत 1962 का भारत नहीं है’ और  हकीकत यह भी है कि आज का प्रधानमंत्री 2013 का वह प्रधानमंत्री नहीं है जो अमरीका में जाकर वहां के राष्ट्रपति से यह कहे कि ‘हम तो बहुत गरीब देश हैं, हमारी मदद कीजिये।’ आज का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाशिंगटन जाकर डंके की चोट पर ऐलान करता है कि भारत अमरीका में रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करेगा।

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