जनरल के बयानों पर सियासत


भारत के लोकतन्त्र की यह विशिष्टता है कि इसमें सेनाओं को भी संसद के माध्यम से आम जनता के प्रति जवाबदेह बनाया गया है। यह कार्य रक्षामन्त्री की मार्फत बहुत खूबसूरती के साथ किया जाता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस शास्त्रीय कशीदाकारी के साथ सेनाओं को पूरी तरह अराजनीतिक बनाये रखने की व्यवस्था की है उसकी मिसाल किसी दूसरे संसदीय लोकतन्त्र में मिलनी मुश्किल है। हमने अपनी फौज को संविधान का मुहाफिज बनाते हुए ऐलान किया कि यह संसद की राजनीतिक उठापटक से दूर रहते हुए अपने कत्र्तव्य का पालन देश के राजनीतिक नेतृत्व के साये में निरपेक्ष भाव से करेगी। हमने सेना को राजनीति से दूर रखने की गरज से ही ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें सेनापतियों की सहभागिता को रक्षामन्त्री के माध्यम से ही देश की जनता जाने। भारतीय लोकतन्त्र की संप्रभुता सभी संस्थानों में निरापद रखने के लिए सभी की अन्तिम जिम्मेदारी केवल चुने हुए प्रतिनिधियों को ही इसलिए दी गई जिससे वे आम जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप सत्ता के सभी प्रतिष्ठानों को चला सकें। अत: भारत में ऐसे मौके बहुत कम आते हैं जब हमारे थल, जल या वायुसेना अध्यक्ष सीधे आम जनता से बात करते हैं। विदेशों से आक्रमण होने या दुश्मन देश के बाजुओं को बेजान करने की गरज से ही हमारे सेनापति युद्ध के समय देशवासियों का विश्वास फौज में बनाये रखने के लिए अपनी फौजों की ताकत का इजहार करते हैं।

ऐसा वे राजनीतिक नेतृत्व की सहमति के साथ ही करते हैं। राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में फौज की जहां भी जरूरत होती है उसकी कमान भी अन्तत: चुनी हुई सरकार के मुखिया के हाथ में ही रहती है। यह बेवजह नहीं है कि जिस राज्य में भी विशेष कानून के तहत फौज की सेवाएं ली जाती हैं वहां मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में संयुक्त कमान (यूनिफाइड कमान) का गठन होता है और फौज के कमांडर मुख्यमन्त्री के निर्देशन में ही काम करते हैं। इस यूनिफाइड कमान के कामों की जवाबदेही का काम मुख्यमन्त्री का ही होता है। बेशक सेना अपना कार्य करने में स्वतन्त्र होती है जिसकी इजाजत उसे विशेष कानून देता है मगर जिम्मेदारी मुख्यमन्त्री की ही होती है। हमने ऐसी व्यवस्था इसलिए लागू की जिससे सेना किसी भी स्तर पर राजनीतिक दांव-पेंचो में न फंस सके। यही वजह है कि जब 1962 में भारत चीन से युद्ध हारा तो सारी जिम्मेदारी तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर डाली गई। सेना की आलोचना करने की किसी भी राजनीतिक दल ने हिम्मत नहीं की। यह हमारे लोकतन्त्र की ही अजीम ताकत का नमूना था। इसी तरह जब हमने 1965 का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा और हमारी सेनाओं ने लाहौर के पास तक जाकर इच्छोगिल नहर पर कुल्ला किया तो सारा श्रेय तत्कालीन प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री को मिला और जब 1971 में हमने बंगलादेश युद्ध जीता तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को इस देश की जनता ने दुर्गा का अवतार कहा परन्तु तीनों ही युद्धों में भारत की सेना के जांबाज रणबांकुरों की गाथाएं घर-घर कहानियां बनकर सुनी-सुनाई जाती रहीं। यही ताकत है इस देश की फौज की जो उसे दूसरे मुल्कों की फौज से अलग रखती है। इसके साथ ही जब 2004 में अंडमान निकोबार में समुद्री सुनामी ने विनाश किया तो हमारी फौज के जवानों ने ही वहां जाकर आम लोगों को राहत देने का काम किया मगर हमारे सेनापतियों ने कभी भी राजनीतिज्ञों के क्षेत्र में प्रवेश करने की चेष्टा नहीं की और अपने काम के मुतल्लिक ही आम जनता को जरूरी जानकारी भर दी मगर कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने वर्तमान थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत के बार-बार बयान देने पर आपत्ति करते हुए जिस शब्द का प्रयोग किया है वह किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने जनरल रावत की तुलना किसी सड़क के गुंडा ( स्ट्रीट ठग) से कर डाली। बेशक जनरल रावत बयानबाजी में कुछ परंपराएं तोड़ रहे हैं मगर उन्हें इस उपमा से नवाजना समस्त भारतीय फौज का अपमान ही होगा क्योंकि वह उसके सेनापति हैं। दूसरे जनरल रावत को भी विचार करना होगा कि उनके दायरे से बाहर जाकर ( आउट आफ टर्न ) बयान देने से देश की जनता में सही सन्देश नहीं जायेगा। भारत के लोग अपनी सेनाओं के कामों को सिर आंखों पर रखते हैं और श्रद्धा से शीश नवाते हैं। सेना का भारत में सम्मान होने की एक बहुत बड़ी वजह यह भी है क्योंकि वह बयान पर नहीं बल्कि चुपचाप रहकर काम पर विश्वास करती है। इसका प्रमाण बंगलादेश युद्ध था। 1971 में जनरल मानेकशा को इन्दिरा गांधी ने उन्हें एक महीने से भी ज्यादा का समय युद्ध जीतने के लिए दिया था मगर उन्होंने यह काम केवल 17 दिन में ही पूरा कर दिया था। संदीप दीक्षित को पहले तो जनरल रावत के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए था मगर उन्होंने जल्दी ही अपनी गलती स्वीकार करते हुए क्षमा याचना कर ली है। क्योंकि जनरल रावत के नेतृत्व में ही पूरी फौज हाजिरी भरती है, किसी भी राजनीतिज्ञ को किसी भी सूरत में फौज को राजनीति का मोहरा बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि फौज के जनरल बदलते रहते हैं मगर भारत की फौज की अस्मिता कभी नहीं बदली जा सकती। यह तो वह फौज है जिसके नग्मे हर हिन्दोस्तानी बड़े शान से गाता है।
”ताकत वतन की हमसे है,
हिम्मत वतन की हमसे है
इज्जत वतन की हमसे है,
इंसान के हम रखवाले।”

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