गरीबी को चीर कर चमकती मेधा


दसवीं-बारहवीं से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम एक के बाद एक आने लग रहे हैं। इन सब परीक्षाओं में एक बात सामने आई है कि प्रतिभा का कोई निश्चित दायरा नहीं होता, वह किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। यह भी कहा जाता रहा है कि गरीबी शिक्षा में बाधा बन जाती है और प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं लेकिन छात्र अब यह साबित करने लगे हैं कि गरीबी शिक्षा में बाधक नहीं। अगर मेधा है तो उससे गरीबी को पछाड़ा जा सकता है। अगर शहरों, महानगरों के समृद्ध परिवारों के बच्चे टॉपर बन रहे हैं तो ग्रामीण पृष्ठभूमि में अभावों में पले-बढ़े बच्चे भी बाजी मार रहे हैं। आईआईटी में प्रवेश के लिए जेईई एडवांस में हरियाणा के पंचकूला के सर्वेश मेहतानी, पुणे के अक्षत और दिल्ली के अनन्य ने प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया है वहीं पटना के सुपर 30 में शामिल केवलिन ने भी आईआईटी परीक्षा पास की है। उसके पिता दीपक प्रसाद बेरोजगार हैं। परिवार की माली हालत खराब है, कभी-कभी तो खाने के लाले पड़ जाते हैं। उसी तरह अरबाज आलम के पिता मोहम्मद शकील सड़क के किनारे अंडे बेचते हैं। नालंदा जिले के अर्जुन कुमार के पिता खेतों में मजदूरी करते हैं। उसने भी आईआईटी एडवांस परीक्षा पास की है।

बेंगलुरु के रहने वाले वैभिक शैट्टी मोहन अभ्यास ने जेईई एडवांस में 64वीं रैंक हासिल की है। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में जगह बनाने वाले दूसरे छात्रों और उनमें जो अहम फर्क है, वो ये कि अभ्यास का परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं है। उनके पिता घर पर ही समोसे बनाते हैं और जगह-जगह बेचते हैं। बड़ी मुश्किल से पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। अभ्यास का इरादा वैज्ञानिक बनना है। उत्तर प्रदेश का छोटा सा कस्बा है फतेहपुर जो पिछले दिनों उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा परिणाम के आने के बाद अचानक चर्चा में आ गया। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा में न सिर्फ इस जिले की छात्राओं ने पहला स्थान प्राप्त किया बल्कि टॉपरों की सूची में यहां के ढेरों छात्र-छात्राओं ने अपने नाम दर्ज कराए हैं। परीक्षा परिणामों में किसी रिक्शा वाले का बेटा, कभी किसी गरीब किसान का बेटा टॉपर बन जाता है तो लोग कई बार हैरानी जताते हैं। किसी चाय वाले या सब्जी वाले के बेटे का टॉपर हो जाना दरअसल समाज में बदलाव का प्रतीक है। आर्थिक दिक्कतों और अंधेरे में लालटेन की रोशनी के बीच अगर मेधा चमकती है तो इससे उनके जीवन का अंधकार ही दूर होगा। इस पर समाज को खुश होना चाहिए। प्रतिभाओं की पहचान कहीं न कहीं तो होनी अवश्य है। इसके लिए केवल एक नजर चाहिए। इस वर्ष गत जनवरी माह में अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका कोन्र्स की 2017 के सुपर अचीवर्स की सूची में भारतीय मूल के 3 नवोन्मेषकों व उद्यमियों को स्थान मिला तो पूरे देश ने गर्व किया था।

कोई भी अच्छी शुरूआत जो समाज को बदलने और उसकी बेहतरी की क्षमता रखती हो, समाज के लिए ही कल्याणकारी होती है। कई टॉपर बच्चों ने बताया कि उनके सामने एक ही गोल था कि कितनी भी मेहनत करनी पड़े उन्हें शिक्षा में अग्रणी रहना है। सभी ने मीडिया से अपने-अपने अनुभव सांझा किए हैं। स्वामी विवेकानंद अकेले ऐसे आध्यात्मिक पुरुष हैं, जिन्होंने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया था-उठो! जागो! और तब तक मत रुको जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। यह छोटा सा वाक्य हर बार आपको जोश और ऊर्जा से भर देता है और इसीलिए यह उद्धरण युवाओं में लोकप्रिय है। विवेकानंद भारत की धार्मिक परम्पराओं के उन चुनिंदा महापुरुषों में से एक हैं जो समाज के लिए श्रद्धा के पात्र होने के साथ-साथ युवाओं के लिए रोल मॉडल बन गए। धर्म और परम्परा के बारे में गहरी अंतरदृष्टि रखने वाले स्वामी जी किस तरह अपने समय, परिवेश और पृष्ठभूमि से बहुत दूर बहुत आगे तक सोच सके यह जिज्ञासा का विषय तो है ही, उनकी बेमिसाल मेधा और दूरदृष्टि को भी जाहिर करता है। महान उपलब्धियों का मार्ग सरल नहीं होता इसलिए स्कूली छात्रों को एक नायक बनना है। कड़ी मेहनत और संकल्प से ही सफलता प्राप्त होती है। कई बार सफलता नहीं भी मिलती तो छात्रों को बार-बार प्रयास करना चाहिए न कि कम अंक आने पर आत्महत्या करनी चाहिए। छात्रों को महसूस करना चाहिए कि एक सफल व्यक्ति के काम करने का तरीका अलग होता है, उसका चिंतन लीक से हटकर होता है। वे यह नहीं देखते की किसी दूसरे ने ऐसा किया है तो हम भी ऐसा ही करें। वे खुद बेहतर तरीका खोज लेते हैं। सफल युवा की शिक्षा के प्रति गहरी समझ और समर्पण होता है इसलिए गरीबी बाधा नहीं बनती। परीक्षाओं में टॉपर रहे छात्र अन्य के लिए रोल मॉडल हैं। मेधावी छात्रों की सफलता के पीछे परिवार का समर्थन भी एक मजबूत सोच देता है। परिवारों को चाहिए कि अपने बच्चों को समर्थन दें। जिस दिन शिक्षा में भारत आगे बढ़ गया तो गरीबी अभिशाप नहीं रहेगी।

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