राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी


लोकतन्त्र में सत्ता के निर्भय और निरंकुश होने का अधिकार उसी दिन विपक्षी पार्टियां छीन लेती हैं जिस दिन कोई भी राजनीतिक दल या विभिन्न दलों का समूह संसद में अपने संख्या बल के बूते पर सरकार का गठन करता है। भारत ने जिस संसदीय प्रणाली के तहत अपना सतत विकास किया है उसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें विपक्ष लगातार एक टांग पर खड़े रहकर सत्ताधारी दल को चौकन्ना रखता है जिससे उसका एक भी कदम जन-अपेक्षाओं और जनहित के विरुद्ध न उठ सके।

पिछली मनमोहन सरकार के दौरान यही भूमिका आज की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने बखूबी निभाई थी जिसकी वजह से 2014 में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हुआ जबकि तब की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस इसे विपक्ष का दुष्प्रचार बताने से नहीं थक रही थी मगर इसकी असली वजह देश की आम जनता ही थी जिसने तब की विपक्षी पार्टी के विचारों को तरजीह दी और उन्हें अपने हक में समझा। अत: आज की विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी के अमरीका में दिये गये बयान पर जो बावेला मचाया जा रहा है, उसका विरोध सत्ताधारी पार्टी भाजपा द्वारा किया जाना स्वाभाविक प्रकिया है मगर इसमें तथ्यों की परख करने का विशेषाधिकार देश की आम जनता का ही उसी प्रकार है जिस तरह 2014 में था।

भाजपा का कहना है कि श्री राहुल गांधी को विदेश की धरती पर खड़े होकर अपने देश की और प्रधानमंत्री की आलोचना नहीं करनी चाहिए थी। राहुल गांधी ने मोदी प्रशासन के दौरान भारत में असहनशीलता, हिंसा और गुस्से व साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को नया राजनीतिक एजेंडा बताया। उन्होंने मोदी सरकार की चौतरफा नाकामियों को गिनाकर सिद्ध करने की कोशिश की कि भारत के मूल समावेशी विचार को छिटकाया जा रहा है। असल में भारत की नई पीढ़ी के लिए राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता का वह स्वरूप द्वेष मूलक है जो भारत की पिछली राजनीति से कतई मेल नहीं खाता है।

लोकतंत्र में प्रतिशोध के लिए कोई स्थान नहीं है बल्कि केवल प्रतियोगिता के लिए है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्षी दल के अधिसंख्य दूसरी पंक्ति के नेता बने घूम रहे लोगों को इस देश के महान इतिहास के बारे में अधकचरा ज्ञान है जिसका इस्तेमाल वे सुविधा के हिसाब से अपने-अपने हक में करते हैं। विदेशों में जाकर पक्ष व विपक्ष के नेता तत्कालीन सरकार की नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। इसके साथ ही घरेलू राजनीतिक मुद्दों पर विचार व्यक्त करने से कतराते रहे हैं। इसका पालन सत्ता और विपक्ष दोनों की तरफ से होता रहा है मगर यह परंपरा तोड़ दी गई।

इसकी जिम्मेदारी किसी एक पर डालना उचित नहीं होगा क्योंकि तथ्यों की फेहरिस्त हमारे सामने है। यह बताने की भारत की जनता को जरूरत नहीं है कि कौन राजनीति में परिवारवाद के जरिये आया है और कौन सीधे जनता की आंखों में चढ़कर। यह लोगों का विशेषाधिकार है कि वे किस दौर में किसे अपना सच्चा हितैषी समझते हैं। परिवारवाद से कोई अछूता नहीं मगर राजनीति में वही है जिसे जनता चुनकर भेजती है। समय के साथ-साथ इसमें परिवर्तन हुआ और जब भारत के राजनीतिक पटल पर स्व. चौधरी चरण सिंह के किसान स्वरूप का उदय हुआ तो पुराने सभी राजे-रजवाड़े तो हाशिये पर चले गये मगर लोकतंत्र में राजतंत्र के नियम किसी भी तरह लागू नहीं होते हैं। इस देश की जनता ने यह कमाल करके भी 1971 में दिखाया था जब गिने-चुने रजवाड़ों को छोड़कर सभी राजवंश धराशायी हो गये थे और बड़े-बड़े टाटा, बिड़ला जैसे उद्योगपतियों को भी चुनावी मैदान में दिन में तारे दिखाई पड़ गये थे।

यह कमाल स्व. इन्दिरा गांधी ने किया था मगर उन्हीं इन्दिरा गांधी को इसी देश की जनता ने 1977 में चुनावी मैदान में धूल चटाने में भी हिचक नहीं दिखाई थी। यह समय की आवाज से पैदा हुई राजनीति का कमाल था। मेरा कहने का मतलब इतना सा है कि जो कुछ भी वर्तमान समय में घटित हो रहा है उसकी चश्मदीद गवाह खुद जनता बनी हुई है। अत: उसके दिमाग को पढऩा कम से कम आज के राजनीतिज्ञों के वश की बात तो नहीं लगती क्योंकि इनकी शिक्षा-दीक्षा में ही अवसरवाद एवं चाटुकारिता की घुट्टी मिली हुई है। इनकी समझ में यह तक नहीं आता कि ये किसी को भी प्रधानमन्त्री बनने से नहीं रोक सकते चाहे वह राहुल गांधी ही क्यों न हों। क्या कांग्रेसियों ने 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोक लिया था? अत: भारत की जनता ही महान है!

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