भारत के सरताज थे ‘नेहरू’


आज 14 नवम्बर स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को श्रद्धा से स्मरण करने का ऐसा दिन है जिसे ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। भारत में संसदीय लोकतन्त्र की जड़ें जमाकर उन्होंने पूरी दुनिया के विकासशील और नव स्वतन्त्र तथा अपनी स्वतन्त्रता के लिए लड़ रहे देशों के सामने भारत को जनाधिकार की शक्ति से सम्पन्न राष्ट्र के रूप में पेश करके खुद को विकसित कहे जाने वाले पश्चिमी देशों के सामने चुनौती फैंक दी थी कि विश्व की आर्थिक व राजनीतिक दिशा को वे अपने इशारे पर नहीं घुमा सकते। यह नेहरू का विशाल व्यक्तित्व ही था जिसने ‘गुटनिरपेक्ष’ आन्दोलन को जन्म दिया था और दुनिया के धनी देशों को चेतावनी दी थी कि वे पिछड़े राष्ट्रों को वैश्विक आय स्रोतों से दूर न रखें मगर इसके साथ ही पं. नेहरू ने भारत के विकास के लिए जो ढांचा तैयार किया वह राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रहे सभी विचारों के नेताओं का ‘पंचामृत’ था।

स्वतन्त्र होने पर उन्होंने जो पंचवर्षीय योजना का खाका तैयार किया वह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का वह मूल विचार था जो 1937 में नेताजी ने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए इसके महाधिवेशन में पेश किया था। उन्होंने इस सम्मेलन में भारत के सर्वांगीण विकास के लिए ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ का विचार रखा था। अतः यह भ्रम फैलाना कि नेताजी व नेहरू के व्यक्तित्वों में किसी प्रकार का टकराव था, पूरी तरह सत्य से परे है। यहां तक कि आजादी मिलने पर 15 अगस्त 1947 को जब भारतीय सेना ने राष्ट्रगान की धुन बजाई तो पं. नेहरू ने नेताजी की आजाद हिन्द फौज का ‘कदम–कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा–ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पर लुटाये जा’ गीत भी गवाया और इसे आजाद भारत के सैनिक बैंड की धुन बना दिया।

नेहरू के व्यक्तित्व को जो लोग संकीर्ण नजरिये से देखकर उनके धर्मनिरपेक्षता के वृहद नजरिये की आलोचना करते हैं वे भारत की उस संस्कृति का निरादर करते हैं जिसकी आत्मा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में बसती है और जिसका व्यावहारिक निर्धारण ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ से होता है। बेशक नेहरू जी की पढ़ाई ब्रिटेन में और लालन–पालन राजकुमारों की तरह हुआ था मगर उन्होंने भारत को कभी भी यूरोपीय चश्मे से देखने की कोशिश नहीं की। यदि नेहरू ने एेसा किया होता तो वह आजादी मिलने से पहले ही भारत के लोगों के जननायक न बनते और तब के ‘युवा हृदय सम्राट’ न कहलाते। उनका राष्ट्रवाद उन्हीं की लिखी पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया ( भारत की खोज) में मुखर होकर बोलता है और कहता है कि सोने की चिडि़या कहलाये जाने वाले इस देश ने ज्ञान के क्षेत्र में भी दुनिया में उजाला फैलाया था।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नेहरू ने यह पुस्तक ‘भारत छोड़ो आदोलन’ के तहत अहमद नगर जेल में बन्द रहते हुए लिखी थी और अपनी तरुणी पुत्री इन्दिरा को लिखे खतों के माध्यम से लिखी थी। आज के दौर में यह कल्पना से परे की बात लगती है मगर ऐसा कार्य केवल वही व्यक्ति कर सकता था जिसके दिल में अपने देश और इसके लोगों के लिए उनके अतीत के सच को बाहर लाने की ललक हो। वरना अंग्रेजी दासता में जकड़े हुए भारत को तो सपेरों और बाजीगरों का देश ही दिखाया जाता था। नेहरू की यह पुस्तक भारत की ऐसी महान कृति है जिसने आम भारतीयों में स्वतन्त्र होने की इच्छा को और तेज किया था। नेहरू की भारत के उच्च आदर्शों और इसकी संस्कृति में निष्ठा की कोई सीमा नहीं थी। इसके लिए केवल एक ही उदाहरण काफी है कि जब 1956 में वह चीन की यात्रा करके लौटे तो इलाहाबाद में उनकी एक गोष्ठी सभा हुई। इसमें नेहरू जी ने अपनी चीन यात्रा से जुड़ी एक कहानी बताई कि एक राजा के दो बेटे थे। एक बहुत कुशाग्र और बुद्धिमान था, दूसरा थोड़ा मोटी अक्ल का था। जब राजा से पूछा गया कि उसका उत्तराधिकारी कौन होना चाहिए तो उसने मोटी अक्ल के लड़के का नाम लिया और दूसरे बुद्धिमान व कुशाग्र बेटे के लिए कहा कि यह बड़ा होकर ‘कवि’ बनेगा और दुनिया को रास्ता बतायेगा।

उस सभा में हिन्दी के महान कवि महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ भी पहुंच गये थे। फक्कड़ और मनमौजी किस्म के निराला को पहलवानी का भी शौक था। वह छह फुट लम्बे-चौड़े बलिष्ठ दिखने वाले व्यक्ति थे। उनके नंगे बदन पर अखाड़े की मिट्टी लगी हुई थी। पूरी कहानी सुनाने के बाद नेहरू जी स्वयं निराला जी के पास आये और अपने गले में पड़ी माला निकाल कर निराला जी के गले में पहना दी। एेसा कार्य प्रधानमन्त्री पद पर रहते हुए वही व्यक्ति कर सकता था जिसे भारत की मिट्टी की पहचान हो। इतना ही नहीं निराला जी के लिए उन्होंने साहित्य अकादमी के माध्यम से मदद देने का भी जुगाड़ किया। नेहरू इलाहाबाद के थे अतः निराला जी के स्वभाव से भी परिचित थे। उन्हें मालूम था कि निराला जी बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हैं। नेहरू जी ने एक बार प्रख्यात सिने अभिनेता स्व. पृथ्वी राज कपूर को भी निराला जी के पास भेजा कि वह अपने मुख से चन्द कविताएं सुना दें जिस पर एक लघु फिल्म बन जाए तथा निराला जी को उसकी रायल्टी मिलती रहे मगर निराला जी ने पृथ्वीराज कपूर को यह कहकर विदा कर दिया कि क्या निराला की आवाज एक–एक आने में सिनेमा घरों में बिकेगी ? हिन्दी के एक कवि के लिए इतनी तड़प क्या भारत को यूरोप के चश्मे से देखने वाला कोई व्यक्ति दिखा सकता था? मगर नेहरू के व्यक्तित्व में छेद निकालने के प्रयास कुछ लोग हमेशा करते रहे हैं क्योंकि आधुनिक भारत के विकास के इतिहास का दूसरा नाम ही नेहरू है।

यह हकीकत है कि 1991 में जिस भारत की अर्थव्यवस्था को विदेशी कम्पनियों के लिए खोलने की हिम्मत स्व. पी.वी. नरसिम्हा राव ने दिखाई थी उसके पीछे नेहरू द्वारा खड़ा किया एेसा मजबूत ढांचा था जिसमें ढलकर भारत शिक्षा से लेकर औद्योगिक व कृषि क्षेत्र तक से होते हुए स्वास्थ्य और परमाणु क्षेत्र तक में बुलंदियों को छूने के काबिल बन सका। अतः यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत में दुनिया के साथ प्रतियोगिता करने की ताकत को नेहरू की ही दूरदृष्टि ने भरा मगर एेसे महान व्यक्तित्व ने कभी भी अपनी खामियों को नहीं छुपाया और 1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद जनसंघ के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी ही सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखने की मंजूरी तब देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को अपनी सहमति दी जबकि विपक्षी दलों के पास इस प्रस्ताव को रखने के लिए आवश्यक सदस्यों की संख्या भी नहीं थी। लोकतन्त्र की जड़ाें को भारत में नेहरू ने जिस प्रकार जमाया उसकी दूसरी मिसाल मिलना कठिन है। उनकी विरासत को स्वतन्त्र भारत में यदि किसी राजनेता ने गहराई से समझने की कोशश की तो निश्चित रूप से वह पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने दिखाई जब राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने यह कहा कि भारत एेसा देश है जिसमें दो सौ से अधिक बोलियां बोली जाती हैं और यह तीन प्रमुख जातीय वर्ग के लोगों द्रविड़, मंगोल व आर्य तथा सात प्रमुख धर्मों के मानने वाले लोगों के समागम से बना। सहिष्णुता इसका प्रमुख गुण रहा है। नेहरू इसी सहिष्णु भारत के प्रणेता थे और इसीलिए वह ‘जननायक’ कहलाए। उनके बिछुड़ने को इस देश के लोगों ने कभी नहीं भुलाया। गांवों से लेकर कस्बों और शहरों तक में उन्हें जिस तरह याद किया गया वह आजाद भारत की खुशबुओं में घुला है। यही वजह है कि सत्तर के दशक तक रामलीलाओं के शुरू होने से पहले यह रिकार्ड बजाया जाता था और लोग उससे भावविह्वल हो जाया करते थे-
हाय जवाहर लाल हमारे, हाय जवाहर लाल हमारे
भारत के सरताज थे नेहरू, हिन्द के हमराज थे नेहरू
उनके गम में सब रोते हैं, ऐसे लीडर कम होते हैं
कहते हैं सब गम के मारे, हाय जवाहर लाल हमारे

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