शाही इमाम की ‘हिमाकत’


दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कश्मीर समस्या के बारे में सीधे खत लिखकर भारतीय मुसलमानों को शर्मसार करते हुए उन्हें राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग-थलग दिखाने की हिमाकत को अंजाम दिया है। शाही इमाम की हैसियत दिल्ली की जामा मस्जिद में मजहबी रवायतें पूरी करने से ज्यादा कुछ नहीं है और उन्हें अपनी कार्रवाइयों को यहीं तक महफूज रखना चाहिए। कश्मीर का मसला कोई मजहबी झगड़ा नहीं है कि इमाम साहब अपनी तजवीज पेश करें। यह मसला दो मुल्कों हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच का है जिसे सुलझाने के लिए दोनों मुल्कों की सरकारों का पूरा अमला है मगर इमाम साहब ने अपनी हदें पार करते हुए नवाज शरीफ को लिख डाला कि वह कश्मीर मसले से बावस्ता सभी तंजीमी इदारों (स्टेक होल्डर्स) से बातचीत करके मसले को सुलझाएं जिससे घाटी में खून-खराबा बंद हो सके।

यह पूरी तरह नाकाबिले बर्दाश्त है क्योंकि कश्मीरियों से बात करने का हक सिर्फ हिन्दोस्तान की सरकार को है और इस सूबे के काबिज हुक्मरानों को है मगर इमाम साहब ने भारत की सरकार के रवैये से मुख्तलिफ रुख अख्तियार करते हुए भारतीय मुसलमानों को ही पशोपेश में डालने की हिमाकत कर डाली और यह साबित करने की कोशिश की कि हिन्दोस्तानी मुसलमान कश्मीर के मसले को मुल्क के आइने से बाहर मजहब के चश्मे से देख रहे हैं। यह बहुत बड़ी बेइंसाफी भारतीय मुसलमानों के साथ उन्होंने कर डाली है क्योंकि इस देश का हर मुसलमान पूरे जम्मू-कश्मीर को हिन्दोस्तान का हिस्सा पूरी शिद्दत के साथ मानता है मगर इमाम साहब का बयान इस हकीकत को भी उजागर करता है कि किस तरह आजाद भारत में शुरू से ही कुछ मुल्ला-मौलवी भारतीय मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग खड़ा हुआ दिखाने के लिए उतावले रहे हैं और अपने वजूद का इल्म कराते रहे हैं मगर यह 1947 नहीं है 2017 है जिसमें मुसलमानों की नई पीढ़ी पूरी कौम के साथ हम कदम होकर मुल्क का सिर ऊंचा रखना चाहती है।

मौजूदा इमाम साहब भूल रहे हैं कि किस तरह उनके वालिद अब्दुल्ला बुखारी को इमरजैंसी के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार के वजीरे आजम मोरारजी देसाई ने रामलीला मैदान में हो रही सरकार बनने के जश्न की जनसभा में बीच में ही बोलते हुए रुकवा दिया था क्योंकि वह अपनी हदों को पार करते हुए पूरे मुल्क के मुसलमानों की नुमाइंदगी की तजवीज पेश करने लगे थे और जनता पार्टी को दिए गए अपने समर्थन का मुआवजा तक मांगने लगे थे। जिसे मेरी बात का यकीन न हो वह 1977 में रामलीला मैदान में दी गई अब्दुल्ला बुखारी की वह तकरीर उठा कर पढ़ लें। मौजूदा इमाम भूल रहे हैं कि हिन्दोस्तान के मुसलमानों ने आजादी के बाद से किसी भी मुस्लिम नेता को अपना रहनुमा नहीं माना है। इनके सभी रहनुमा हिन्दू ही हुए हैं। बेशक वे चाहे कांग्रेस के हों या समाजवादी पार्टी के, इससे उनके दिमागी खुलेपन का इजहार होता है मगर बीच-बीच में कट्टरपंथ को हवा देने वाले लोग भी मुसलमानों को बरगलाने की हरकतें करते रहे हालांकि ये सब पानी का बुलबुला ही साबित हुए। यही तो ताकत है हिन्दोस्तान की जिसे पूरी दुनिया हैरत भरी निगाहों से देखती है और इस मुल्क को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र समझती है।

यह लोकतंत्र ही भारत की सबसे बड़ी तहरीर है जिसका आलमी ताकतें भी लोहा मानती हैं। पाकिस्तान की क्या बिसात हो सकती है कि वह हमारे कश्मीरी लोगों से सीधे बातचीत करने की जुर्रत करे मगर एक सवाल दीगर तौर पर नुमायां होता है कि वह कौन सी वजह है जो कश्मीरियों को हमारी फौज के खिलाफ खड़ा कर रही है। भारत ने उत्तर पूर्व राज्यों के अलगाववादी आंदोलनों और लड़ाइयों को भी देखा है, नागालैंड में चल रही सबसे पुरानी ऐसी ही लड़ाई को हमने काबू में किया है। मिजोरम में हमने शांति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की मगर कभी भी आम नागरिकों ने उग्रवादियों के लिए सुरक्षा कवच का काम नहीं किया। आम जनता आतंकियों के खिलाफ छेड़ी गई कार्रवाइयों से खुद को अलग रखती रही। कश्मीर में तो कुछ जिलों में ही आतंकवाद की समस्या है जिसका मुकाबला हमारी फौजें अपनी जान हथेली पर रखकर कर रही हैं। राज्य में चुनी हुई सरकार होने के बावजूद आम लोगों और सरकार के बीच संवादहीनता के हालात क्यों बने हुए हैं। जाहिर है कि चुनी हुई सरकार का यह कार्य फौज किसी भी सूरत में नहीं कर सकती। इसलिए जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को सोचना होगा कि उनकी हैसियत खाली जगह में (खला में) हुक्मरानी करने वाले हुक्मरान की क्यों बनती जा रही है।

ऐसी चुनी हुई सरकार का क्या रुतबा हो सकता है जिसके जेरे साया खुले तौर पर लोग हिन्दोस्तान के निजाम की अहलकार फौज को ललकारने की जुर्रत करें जबकि अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले से कश्मीरियों ने साबित कर दिया है कि वे ‘हिन्दोस्तानियत’ के पक्के पैरोकार हैं और यात्रियों पर हमला ‘कश्मीरियतÓ पर सीधा हमला था। इसलिए जरूरी यह है कि सूबे की सरकार को अपना वह किरदार अदा करना चाहिए जिसके लिए लोगों ने उसे चुना है। कश्मीर को हम प्रयोगशाला नहीं बना सकते कि हर तरह के प्रयोग करते रहें। इसके साथ ही हम अपनी फौज को भी हमेशा के लिए राजनीतिक मसले में नहीं फंसा सकते। पाकिस्तान के साथ हमारे जो भी मसले हैं वे पुख्ता तौर पर हल होने चाहिएं चाहे इसके लिए फौजी तजवीज का ही सहारा क्यों न लेना पड़े मगर कश्मीर को तो फिर से खूबसूरत नजारों की वादी में बदलना ही होगा।

कश्मीर में हिन्दू-मुसलमान का झगड़ा पाकिस्तान के इशारे पर ही शुरू किया गया था मगर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 2013 में जब पाकिस्तान में ही वहां की राष्ट्रीय असैम्बली के लिए चुनाव हुए थे तो इन चुनावों का सबसे बड़ा मुद्दा भारत के साथ दोस्ताना ताल्लुकात कायम करने का ही था। नवाज शरीफ की पार्टी ने इसके लिए वहां के लोगों से वादा किया था मगर पाकिस्तान की नामुराद फौज ने अपनी रोजी-रोटी को बचाए रखने के लिए कश्मीर को सुलगाने का काम किया। दहशतगर्दी की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी। कश्मीरियों के सामने इस हकीकत को नमूदार करने की जिम्मेदारी वहां की चुनी हुई महबूबा सरकार की है वरना इस बात का क्या मतलब है कि सरकार तो है ‘पीडीपी-भाजपाÓ की महबूबा सरकार की और ‘रिटÓ चले हुर्रियत कांफ्रैंस की।

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