एसवाईएल : बहुत हो चुकी सियासत


सतलुज-यमुना लिंक नहर का विवाद काफी पुराना है और नदी जल बंटवारे पर पंजाब और हरियाणा में झगड़ा तो 50 वर्षों से चला आ रहा है। 50 वर्षों के दौरान हरियाणा लगातार आरोप लगाता रहा है कि उसे मांग के अनुरूप पानी नहीं मिला है जबकि पंजाब लगातार तर्क दे रहा है कि उसके पास पानी है ही नहीं तो वह देगा कैसे? नदी जल विवाद पंजाब और हरियाणा के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस मुद्दे पर जमकर सियासत भी हुई और आज भी हो रही है। पंजाब में अकालियों ने इसी मसले को लेकर कर्पूरी में मोर्चा लगाया था, इसके बाद हिंसा भड़क उठी थी। हिंसा के बाद अकाली आंदोलन कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया था जिस कारण पंजाब को आतंकवाद के काले दिनों का दौर देखना पड़ा था। एक नवम्बर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा एक नये राज्य के रूप में भारत के मानचित्र पर उभरकर सामने आया लेकिन विडम्बना यह रही कि पानी के बंटवारे का मुद्दा अनसुलझा ही रहा।

केन्द्र ने विवाद को खत्म करने के लिए अधिसूचना जारी कर हरियाणा को 3.5 एमएएफ पानी आवंटित किया। इस पानी को लाने के लिए 214 किलोमीटर लम्बी सतलुज-यमुना नहर बनाने का फैसला हुआ था। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की मौजूदगी में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 1990 में पंजाब में नहर परियोजना पर हुई हिंसा के बाद पंजाब में नहर निर्माण का काम रोक दिया गया। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह नहर हरियाणा के लोगों के लिए जीवनरेखा के समान थी, वहीं पंजाब को अपने दिनोंदिन घट रहे जलस्तर की चिन्ता सता रही थी। हरियाणा ने तो अपने हिस्से की 92 किलोमीटर लम्बी नहर का निर्माण सालों पहले पूरा कर लिया था लेकिन पंजाब ने अपने हिस्से का निर्माण पूरा नहीं किया। यह मुद्दा चुनावी मुद्दा बन गया।

जब भी पंजाब और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होते, लगभग सभी राजनीतिक दल खुद को किसानों का मसीहा साबित करने में जुट जाते और इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर एक भावनात्मक लहर पैदा की जाती। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 से 2004 में दो बार पंजाब को अपने हिस्से की नहर का निर्माण पूरा करने के आदेश दिए लेकिन 2004 में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्द्र सिंह की सरकार के दौरान पंजाब विधानसभा ने एक विधेयक पारित कर पंजाब के पानी को लेकर पुराने सभी समझौते रद्द कर दिए। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनावों में भी कैप्टन ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। कैप्टन अमरिन्द्र सिंह पंजाब की सत्ता में वापस लौटे। इस मुद्दे पर सियासत की इतनी परतें चढ़ गईं कि बादल सरकार के दौरान जितनी नहर बनी थी उसे पाट दिया गया। किसानों की अधिग्रहीत भूमि वापस उन्हें लौटाने की घोषणा की गई। पंजाब और हरियाणा के रिश्ते तल्ख होने लगे। सुप्रीम कोर्ट ने फिर फैसला सुनाया कि पंजाब सरकार द्वारा बनाया गया सतलुज-यमुना ङ्क्षलक नहर समझौते को निरस्त करने वाला कानून असंवैधानिक है। इससे सुप्रीम कोर्ट का 2002 और 2004 का आदेश प्रभावी हो गया जिसमें कहा गया था कि केन्द्र सरकार नहर का कब्जा लेकर निर्माण पूरा करे।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला देश के राष्ट्रपति के संदर्भ पर दिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि पंजाब नदी जल बंटवारे के बारे में हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली समेत अन्य राज्यों के साथ हुए समझौते को एकतरफा रद्द नहीं कर सकता। पंजाब अब भी पानी की कमी को लेकर अड़ा हुआ है। पिछले दिनों हरियाणा में विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने में देरी का विरोध करते हुए पंजाब सीमा पर पंजाब के वाहनों को रोक दिया था जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अपनी मंशा साफ कर दी है। उसने पंजाब और हरियाणा को अपने यहां कोई भी आन्दोलन रोकने और शांति बनाए रखने का निर्देश देते हुए केन्द्र सरकार को बातचीत कर मामला सुलझाने के लिए दो माह का अतिरिक्त समय भी दे दिया है। साथ ही उसने पंजाब सरकार को फटकार भी लगाई है कि वह कोर्ट के आदेश के मुताबिक अपने हिस्से की नहर का निर्माण पूरा करे, पानी का मसला बाद में देखा जाएगा।

पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन तो करना ही चाहिए। अगर राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवमानना करती रहीं तो फिर संघीय ढांचे की व्यवस्था ही अव्यवस्था में बदल जाएगी। अब बहुत हो चुकी सियासत। राजनीतिक दल धरने-प्रदर्शन छोड़ें और इस मसले को हल करने के लिए ठोस प्रयास करें। पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य सरकारें मिल-बैठकर बातचीत करें और मसले को हल करने की दिशा में आगे बढ़ें। जल संकट को दूर करने के लिए दोनों राज्यों को अपने जल स्रोतों को पुन: बहाल करना होगा। दुर्भाग्य से हरित क्रांति के बाद जो काम नहीं किया गया उसे अब करना चाहिए। गतिरोध से किसी को लाभ नहीं होने वाला। जल स्रोतों की बहाली, सही रखरखाव, जल संचय से समस्या का हल हो सकता है।

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