ढह गया आईएस का किला लेकिन…


अन्तत: इराक की सेना ने दुनिया को दहलाने के लिए निकले आईएस यानी दाइश के आतंकियों का सफाया कर मोसूल शहर को आजाद करा लिया। 9 माह से चल रहे युद्ध में हजारों लोग मारे गए और लगभग पूरा शहर बर्बाद हो गया। तीन वर्ष पहले जेहादियों ने इस शहर पर कब्जा जमाया था। दुनिया जानती है कि कोई कितना भी क्रूर आतंकी हो, मौत तो उसकी भी एक दिन आनी ही है। हिटलर ने आत्महत्या कर ली थी, रावण भी मारा गया था, लादेन भी मारा गया था। जीत हमेशा सच्चाई की होती है, बुराई हमेशा पराजित होती है। खुद के खलीफा इब्राहिम होने का ऐलान करने वाले आईएस के सरगना अबु बकर अल बगदादी की मौत के बारे में अब भी अटकलबाजियां जारी हैं। कुछ समय पहले रूस ने दावा किया था कि बगदादी हमले में मारा जा चुका है।

बगदादी खुद को पैगम्बर का वारिस मानता रहा है। 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था तो बगदादी ने जेहाद की राह पकड़ ली। वह सुन्नी पीपुल्स ग्रुप के संस्थापकों में रहा और गुट की शरीयत कमेटी का मुखिया भी। 2004 में वह अमेरिकी सेना के हाथ लगा और बगदाद के ही कैम्प बुक्का में रखा गया। जेल ने बगदादी को दुनिया का सबसे क्रूर जेहादी बना दिया। उसने अपनी सजा का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ नफरत और शरीयत को आगे बढ़ाने में किया। उसने जेल में ही अपने इस्लामिक स्टेट का पूरा खाका तैयार कर लिया था। आईएस की संरचना पर नजर डालेंगे तो उसके सारे पदाधिकारी एक मैनेजर की तरह काम करते हैं जिनमें से ज्यादातर सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के अहम लोग ही रहे। फिर शुरू हुए लोगों के दिलों में जहर घोलने के काम।

सवाल यह भी रहा कि आखिर आईएस को इतनी ऊर्जा कहां से मिली कि वह समूची दुनिया में खून की नदियां बहाने पर आमादा हो गया। आईएस की ताकत इतनी बढ़ गई कि उसने पहले सीरिया के रक्का पर कब्जा किया, फिर इराक में मोसूल और उसके बाद सद्दाम हुसैन के शहर टिकरित को फतह किया। फिर आईएस ने ऐसे बर्बर कारनामों को अन्जाम दिया जिससे दुनिया कांप उठी। जिधर से इसके आतंकी गुजरते वहीं लाशों के ढेर लग जाते। महिलाओं और बालिकाओं को गुलाम बनाकर उन्हें यौन प्रताडऩा देते। भागने की कोशिश करतीं तो उन्हें काट दिया जाता। कई देशों के इन्सानों को न केवल जानवरों की तरह काटा गया बल्कि उनकी वीडियो भी बनाकर जारी की जाती रही। 2014 में बगदादी ने खुद को खलीफा इब्राहिम घोषित करते हुए कहा कि लोग उसके हुक्म को अल्लाह और मोहम्मद का पैगाम मानते हुए करें।

बगदादी दुनिया के दर्जन भर देशों पर कब्जा कर एक इस्लामिक देश बनाना चाहता था, जिसका खलीफा वह खुद बनना चाहता था। उसने दुनिया भर के सुन्नी मुसलमानों से अपील की कि वह उसकी जंग में शामिल हों, जैसे ही उसका एक इस्लामिक देश बनने का सपना पूरा होगा, वैसे ही दुनिया भर के मुसलमानों की उनकी इज्जत, मान-सम्मान, अधिकार सब मिल जाएगा। बगदादी का मकसद सिर्फ इराक में खून- खराबा करना नहीं बल्कि वह बगदाद के रास्ते सीरिया होते हुए लेवेंट मुल्कों यानी साइप्रस, इस्राइल, जोर्डन, लेबनान, फिलिस्तीन और तुर्की को मिलाकर एक इस्लामिक अमीरात बनाना चाहता है। उसका सपना पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी अपने कब्जे में करना रहा है। बगदादी अपना साम्राज्य भारत के गुजरात समेत उत्तर पश्चिमी राज्यों तक फैलाना चाहता है। बगदादी का आतंक ऐसी विचारधारा है जिससे प्रभावित होकर दुनिया भर के मुस्लिम युवक आतंकवादी बन रहे हैं। यही नहीं भारत के केरल, तमिलनाडु के कई युवक आईएस में भर्ती होने सीरिया जा चुके हैं। खतरे को भांपते हुए दुनिया इसके खिलाफ एकजुट हुई है क्योंकि अब पश्चिमी राष्ट्रों को भी इससे खतरा होने लगा है। जन्नत और हूरों का सपना दिखाकर युवा पीढ़ी को मरने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

अब जबकि इराक की सेना ने मोसूल को आजाद करा लिया है लेकिन नुक्सान बहुत हो चुका है। मोसूल की अल नूरी मस्जिद को आईएस ने नेस्तनाबूद कर दिया था। शहर के हवाई अड्डे तबाह हो चुके हैं। टिगरिस नदी के किनारे शहर के दो छोरों को मिलाने वाली इमारतें ध्वस्त हो चुकी हैं। सभी पुल ढह चुके हैं। हजारों लोग मारे जा चुके हैं और 8 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं। आईएस के खिलाफ जंग में अमेरिकी नेतृत्व ने भी साथ दिया है। जिन लोगों ने खौफनाक मंजर देखा है वह सदमे से गुजर रहे हैं। अब शुरू हुआ है मानवीय संकट। शहर के पुनर्निर्माण में एक बिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च आएगा। हर विध्वंस के बाद निर्माण ही होता है। मोसूल से पहले सीरिया में भी एक-एक करके आईएस का हर किला ढह चुका है। बगदादी के गुर्गों के लिए अपनी जान बचाना मुश्किल हो रहा है। बगदादी की नापाक साजिश का तिलिस्म टूट चुका है। सवाल यह है कि आईएस मोसूल में तो तबाह हो चुका है, सीरिया में भी उसका अन्त सुनिश्चित है। अहम सवाल यह है कि जेहादी विचारधारा का विध्वंस कैसे हो? इसके लिए दुनिया भर के मुस्लिम संगठनों को एकजुट होना होगा और एक दिशा तय करनी होगी कि क्या वह मोसूल जैसी तबाही चाहते हैं या सुकून भरी जिन्दगी। क्या वह लाशों के ढेर के बीच जिन्दगी जीना चाहते हैं या आराम की जिन्दगी। तो फिर उन्हें अपनी आने वाली नस्लों को बचाने के लिए जेहादी विचारधारा का समूल विध्वंस करना ही होगा।

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